प्र1.
जगदीश हे ! परमेश हे ! सकलेश हे ! भगवन् । जयमङ्गलं परमोज्ज्वलं नो देहि परमात्मन् ॥ ५ ॥ शूरा वयम् ॥ — अस्य श्लोकस्य अन्वयं अर्थं भावं च लिखन्तु ।
उत्तर
गीत का अन्तिम श्लोक प्रार्थना है — यहाँ पाँच सम्बोधन एक साथ आते हैं।
अन्वयः — हे जगदीश ! हे परमेश ! हे सकलेश ! हे भगवन् ! हे परमात्मन् ! नः परमोज्ज्वलं जयमङ्गलं देहि ।
| पदम् | पदच्छेदः / अर्थः | हिन्दी |
|---|---|---|
| जगदीश | जगतः ईश | हे जगत् के स्वामी! |
| परमेश | परमः ईश | हे परम ईश्वर! |
| सकलेश | सर्वेषाम् ईश | हे सबके ईश! |
| जयमङ्गलम् | जयः च मङ्गलं च | विजय और मंगल |
| परमोज्ज्वलम् | परम + उज्ज्वलम् — अत्यन्तं प्रकाशमानम् | परम उज्ज्वल |
| नः | अस्मान् / अस्मभ्यम् | हमें |
| देहि | यच्छ | दीजिए |
हिन्दी अर्थ — हे जगत् के स्वामी! हे परमेश! हे सबके ईश! हे भगवन्! हे परमात्मन्! हमें परम उज्ज्वल विजय और मंगल प्रदान कीजिए।
भावः: चार श्लोक तक गीत अपने बल की बात करता रहा; अन्तिम श्लोक में वही गीत सिर झुका देता है। यही भारतीय परम्परा का ढंग है — पराक्रम अपना, पर विजय का वरदान ईश्वर का। और माँगा भी क्या गया? केवल ‘जय’ नहीं, ‘जयमङ्गलम्’ — ऐसी विजय जिसमें सबका मंगल हो; और वह भी ‘परमोज्ज्वल’, यानी जिसमें कोई कालिख, कोई छल न हो। पृष्ठ 80 का चित्र भी यही दिखाता है — कन्याकुमारी के समुद्र-तट पर विवेकानन्द-शिला के सामने हाथ जोड़े खड़े लोग।
व्याकरण-संकेतः: ‘जगदीश, परमेश, सकलेश, भगवन्, परमात्मन्’ — सर्वाणि सम्बोधन-प्रथमा एकवचनानि (हे …!) । ‘देहि’ इति ‘दा’ धातोः लोट्-लकारे मध्यमपुरुष-एकवचनम् (= दीजिए) । ‘नः’ इति अस्मद्-शब्दस्य संक्षिप्तरूपम् — अस्मान् (द्वितीया) अथवा अस्मभ्यम् (चतुर्थी) इत्यर्थे प्रयुज्यते । ‘जगदीश’ = जगत् + ईश (व्यञ्जनसन्धिः: त् + ई = द् ई) ।