दीपकम् अध्याय 7 गीतम्

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
शूरा वयं धीरा वयं वीरा वयं सुतराम् । गुणशालिनो बलशालिनो जयगामिनो नितराम् ॥१॥ शूरा वयम् ॥ — अस्य श्लोकस्य अन्वयं अर्थं भावं च लिखन्तु ।
उत्तर

यह गीत का मुखड़ा है — पूरा श्लोक ‘वयम्’ के विशेषणों की माला है।

अन्वयः — वयं सुतरां शूराः (स्मः), वयं धीराः (स्मः), वयं वीराः (स्मः) । वयं नितरां गुणशालिनः बलशालिनः जयगामिनः (स्मः) ।

पदम्अर्थः (संस्कृते)हिन्दी
शूराःवीराःपराक्रमी
धीराःधैर्यशालिनःधीरज रखने वाले
सुतराम् / नितराम्अत्यधिकम्अत्यधिक रूप से, पूरी तरह
गुणशालिनःगुणयुक्ताःगुणों वाले
बलशालिनःबलयुक्ताःबलवान
जयगामिनःजयं गच्छन्तःविजय की ओर बढ़ने वाले

हिन्दी अर्थ — हम शूर हैं, हम धीर हैं, हम अत्यन्त वीर हैं। हम पूरी तरह गुणवान हैं, बलवान हैं और विजय की ओर बढ़ने वाले हैं। (टेक — शूरा वयम्॥ = हम शूर हैं!)

भावः: कवि पहले ही श्लोक में भारतीयों का परिचय तीन जोड़ों में देता है — शूर-धीर-वीर (स्वभाव), गुणशाली-बलशाली (योग्यता), जयगामी (लक्ष्य)। ध्यान दीजिए कि बल अकेला नहीं आया — उससे पहले गुण आया है। कवि कहना चाहता है कि बल तभी सराहनीय है जब उसके साथ गुण हो; गुणहीन बल विजय नहीं, उपद्रव बनता है।
व्याकरण-संकेतः: गीते ‘शूरा’, ‘धीरा’, ‘वीरा’ इति विसर्गरहितानि दृश्यन्ते — छन्दोऽनुरोधात् । वस्तुतः एतानि शूराः, धीराः, वीराः इति प्रथमा विभक्तेः बहुवचनानि सन्ति । ‘गुणशालिनः, बलशालिनः, जयगामिनः’ इति नकारान्तानां शब्दानां (गुणशालिन्, बलशालिन्, जयगामिन्) प्रथमा बहुवचनम्; एतेषाम् एकवचनं भवति गुणशाली, बलशाली, जयगामी ।
प्र2.
दृढमानसा गतलालसाः प्रियसाहसाः सततम् । जनसेवका अतिभावुकाः शुभचिन्तका नियतम् ॥२॥ शूरा वयम् ॥ — अस्य श्लोकस्य अन्वयं अर्थं भावं च लिखन्तु ।
उत्तर

पहला श्लोक शक्ति बताता था, यह दूसरा श्लोक स्वभाव बताता है।

अन्वयः — वयं सततं दृढमानसाः गतलालसाः प्रियसाहसाः (स्मः) । वयं नियतं जनसेवकाः अतिभावुकाः शुभचिन्तकाः (स्मः) ।

पदम्पदच्छेदः / अर्थःहिन्दी
दृढमानसाःदृढं मानसं येषां ते — दृढचित्ताःदृढ़ मन वाले
गतलालसाःगता लालसा येषां ते — लोभरहिताःलालच रहित
प्रियसाहसाःप्रियं साहसं येषां ते — साहसयुक्ताःजिन्हें साहस प्रिय है, साहसी
सततम् / नियतम्निरन्तरम् / निश्चितम्सदा / निश्चय ही
जनसेवकाःजनानां सेवकाःलोगों की सेवा करने वाले
अतिभावुकाःअतीव भावयुक्ताःअत्यन्त संवेदनशील
शुभचिन्तकाःशुभं चिन्तयन्ति ये तेसबका भला चाहने वाले

हिन्दी अर्थ — हम सदा दृढ़ मन वाले, लोभरहित और साहसप्रिय हैं। हम निश्चय ही जनसेवक, अत्यन्त संवेदनशील और सबका शुभ सोचने वाले हैं।

भावः: यहाँ कवि वीरता की परिभाषा बदल देता है। वीर वही नहीं जो लड़ सके — वीर वह है जिसका मन दृढ़ हो, जिसमें लालच न हो, और जो दूसरों की सेवा करे। ‘अतिभावुकाः’ शब्द विशेष है: वीर होने का अर्थ कठोर होना नहीं, दूसरों का दुःख अनुभव कर सकना भी है। पृष्ठ 78 का नीचे वाला चित्र यही दिखाता है — बाढ़ के पानी में युवक बुज़ुर्गों को कन्धे और गोद में उठाकर पार करा रहे हैं।
व्याकरण-संकेतः: ‘दृढमानसाः, गतलालसाः, प्रियसाहसाः, शुभचिन्तकाः’ — सर्वे बहुव्रीहि-समासः, प्रथमा बहुवचनम्, पुंलिङ्गम् । ‘सततम्’ तथा ‘नियतम्’ इति अव्ययपदे (क्रियाविशेषणे) — अतः एतयोः रूपं कदापि न परिवर्तते ।
प्र3.
पृष्ठे 78 द्वे चित्रे स्तः । चित्रयोः किं दृश्यते ? गीतस्य काभिः पङ्क्तिभिः सह एते चित्रे सम्बद्धे ? (चित्र-आधारितः पाठ्य-प्रश्नः)
उत्तर

दोनों चित्र गीत के दो अलग-अलग भावों को दिखाते हैं।

चित्रम्किं दृश्यतेसम्बद्धा पङ्क्तिः
प्रथमम् (उपरि)भारतमातुः प्रतिमा, त्रिवर्णध्वजः, भारतस्य मानचित्रं, शस्त्रधारी सैनिकः चशूरा वयं धीरा वयं वीरा वयं सुतराम् — रक्षा और पराक्रम का भाव
द्वितीयम् (अधः)जलप्लावने (बाढ़ में) युवकाः वृद्धां महिलां वृद्धं पुरुषं च रक्षन्तःजनसेवका अतिभावुकाः शुभचिन्तका नियतम् — सेवा और करुणा का भाव

संस्कृतेन उत्तरम् — प्रथमे चित्रे भारतमाता ध्वजः सैनिकः च सन्ति । एतत् चित्रं शौर्यं वीरतां च सूचयति । द्वितीये चित्रे युवकाः जलप्लावने वृद्धान् जनान् रक्षन्ति । एतत् चित्रं जनसेवां शुभचिन्तनं च सूचयति । (हिन्दी: पहले चित्र में भारतमाता, ध्वज और सैनिक हैं — यह चित्र शौर्य और वीरता बताता है। दूसरे चित्र में युवक बाढ़ में बुज़ुर्गों को बचा रहे हैं — यह चित्र जनसेवा और शुभचिन्तन बताता है।)

दोनों चित्र साथ क्यों रखे गए: पुस्तक जान-बूझकर सैनिक के ठीक नीचे बाढ़-राहत का चित्र देती है। सन्देश यह है कि वीरता केवल सीमा पर नहीं होती — मुसीबत में पड़ोसी को बचाना भी उतनी ही बड़ी वीरता है। गीत की दोनों पंक्तियाँ — ‘वीरा वयं’ और ‘जनसेवका अतिभावुकाः’ — एक ही व्यक्ति के दो रूप हैं।
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