प्र1.
एतत् सम्पूर्णं गीतं सस्वरं गायन्तु, लिखन्तु, कण्ठस्थं च कुर्वन्तु ।
उत्तर
यह करने योग्य कार्य है — गाइए, लिखिए और याद कीजिए। नीचे पूरा गीत एक जगह दिया है ताकि अभ्यास सरल हो।
| क्रमः | श्लोकः |
|---|---|
| १ | शूरा वयं धीरा वयं वीरा वयं सुतराम् । गुणशालिनो बलशालिनो जयगामिनो नितराम् ॥ शूरा वयम् ॥ |
| २ | दृढमानसा गतलालसाः प्रियसाहसाः सततम् । जनसेवका अतिभावुकाः शुभचिन्तका नियतम् ॥ शूरा वयम् ॥ |
| ३ | धनकामना सुखवासना न च वञ्चना हृदये । ऊर्जस्वला वर्चस्वला अतिनिश्चला विजये ॥ शूरा वयम् ॥ |
| ४ | गतभीतयो धृतनीतयो दृढशक्तयो निखिला । यामो वयं समराङ्गणं विजयार्थिनो बालाः ॥ शूरा वयम् ॥ |
| ५ | जगदीश हे ! परमेश हे ! सकलेश हे ! भगवन् । जयमङ्गलं परमोज्ज्वलं नो देहि परमात्मन् ॥ शूरा वयम् ॥ |
कण्ठस्थ करने का उपाय: हर श्लोक की पहली पंक्ति में तीन-तीन विशेषण हैं और दूसरी पंक्ति में भी तीन। इसी ‘तीन-तीन’ की लय से गीत याद हो जाता है — शूरा/धीरा/वीरा, गुणशालिनो/बलशालिनो/जयगामिनो, दृढमानसा/गतलालसाः/प्रियसाहसाः, जनसेवका/अतिभावुका/शुभचिन्तका। पहले लय पकड़िए, शब्द अपने-आप बैठ जाएँगे।
सस्वर गाने का लाभ: ‘सस्वरम्’ का अर्थ है स्वर के साथ। संस्कृत के छन्द ध्वनि पर टिके हैं — जब आप गाकर पढ़ते हैं तो दीर्घ-ह्रस्व अपने-आप ठीक बैठते हैं और उच्चारण की भूल घट जाती है। कक्षा में मिलकर गाइए, जैसे पाठ के आचार्य ने कहा — ‘एतत् एव सस्वरं मिलित्वा गायामः’।