दीपकम् अध्याय 7 वयम् अभ्यासं कुर्मः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
एतत् सम्पूर्णं गीतं सस्वरं गायन्तु, लिखन्तु, कण्ठस्थं च कुर्वन्तु ।
उत्तर

यह करने योग्य कार्य है — गाइए, लिखिए और याद कीजिए। नीचे पूरा गीत एक जगह दिया है ताकि अभ्यास सरल हो।

क्रमःश्लोकः
शूरा वयं धीरा वयं वीरा वयं सुतराम् ।
गुणशालिनो बलशालिनो जयगामिनो नितराम् ॥
शूरा वयम् ॥
दृढमानसा गतलालसाः प्रियसाहसाः सततम् ।
जनसेवका अतिभावुकाः शुभचिन्तका नियतम् ॥
शूरा वयम् ॥
धनकामना सुखवासना न च वञ्चना हृदये ।
ऊर्जस्वला वर्चस्वला अतिनिश्चला विजये ॥
शूरा वयम् ॥
गतभीतयो धृतनीतयो दृढशक्तयो निखिला ।
यामो वयं समराङ्गणं विजयार्थिनो बालाः ॥
शूरा वयम् ॥
जगदीश हे ! परमेश हे ! सकलेश हे ! भगवन् ।
जयमङ्गलं परमोज्ज्वलं नो देहि परमात्मन् ॥
शूरा वयम् ॥
कण्ठस्थ करने का उपाय: हर श्लोक की पहली पंक्ति में तीन-तीन विशेषण हैं और दूसरी पंक्ति में भी तीन। इसी ‘तीन-तीन’ की लय से गीत याद हो जाता है — शूरा/धीरा/वीरा, गुणशालिनो/बलशालिनो/जयगामिनो, दृढमानसा/गतलालसाः/प्रियसाहसाः, जनसेवका/अतिभावुका/शुभचिन्तका। पहले लय पकड़िए, शब्द अपने-आप बैठ जाएँगे।
सस्वर गाने का लाभ: ‘सस्वरम्’ का अर्थ है स्वर के साथ। संस्कृत के छन्द ध्वनि पर टिके हैं — जब आप गाकर पढ़ते हैं तो दीर्घ-ह्रस्व अपने-आप ठीक बैठते हैं और उच्चारण की भूल घट जाती है। कक्षा में मिलकर गाइए, जैसे पाठ के आचार्य ने कहा — ‘एतत् एव सस्वरं मिलित्वा गायामः’।
प्र2.
पाठस्य आधारेण प्रश्नानाम् उत्तराणि एकपदेन लिखन्तु — (क) शूराः के ? (ख) वयं कीदृशमानसाः स्मः ? (ग) वयं कीदृशचिन्तकाः स्मः ? (घ) वयं कुत्र अतिनिश्चलाः स्मः ? (ङ) वयं विजयार्थिनः कुत्र यामः ?
उत्तर

सब उत्तर एक पद में देने हैं — इसलिए पूरा वाक्य नहीं, केवल वही पद लिखिए जो प्रश्न ने माँगा है।

प्रश्नःउत्तरम् (एकपदेन)हिन्दीगीते आधारः
(क) शूराः के ?भारतीयाः (वयम्)भारतीय (हम)वयं भारतीयाः शूराः वीराः च स्मः
(ख) वयं कीदृशमानसाः स्मः ?दृढमानसाःदृढ़ मन वालेदृढमानसा गतलालसाः …
(ग) वयं कीदृशचिन्तकाः स्मः ?शुभचिन्तकाःशुभ सोचने वाले… शुभचिन्तका नियतम्
(घ) वयं कुत्र अतिनिश्चलाः स्मः ?विजयेविजय मेंअतिनिश्चला विजये
(ङ) वयं विजयार्थिनः कुत्र यामः ?समराङ्गणम्रणभूमि की ओरयामो वयं समराङ्गणं
प्रश्नशब्द ही उत्तर की विभक्ति बता देता है:के’ पूछा गया — इसलिए उत्तर प्रथमा बहुवचन में (भारतीयाः)। ‘कीदृशाः’ पूछा गया — इसलिए उत्तर विशेषण (दृढमानसाः, शुभचिन्तकाः)। ‘कुत्र’ पूछा गया — इसलिए उत्तर स्थान बताने वाला पद: (घ) में सप्तमी ‘विजये’, और (ङ) में द्वितीया ‘समराङ्गणम्’, क्योंकि वहाँ जाने की क्रिया (यामः) है और गत्यर्थक धातु का कर्म द्वितीया में आता है।
Check it yourself: (घ) और (ङ) दोनों में ‘कुत्र’ है, फिर भी विभक्ति अलग है। कारण — ‘स्मः’ के साथ स्थिति बताई जा रही है (सप्तमी), ‘यामः’ के साथ गन्तव्य (द्वितीया)।
प्र3.
उदाहरणानुसारम् अधोलिखितानां पदानां वचनपरिवर्तनं कुर्वन्तु — (क) शूराः वयम् = शूरः अहम् ; वीराः वयम् = ……… (ख) ……… = बलशालिनः ; ……… = जयगामिनः (ग) दृढमानसाः = ……… ; प्रियसाहसाः = ……… (घ) ……… = अतिभावुकाः ; शुभचिन्तकाः = ……… (ङ) धनकामना = ……… ; वञ्चना = ……… (च) ……… = वर्चस्स्वलाः ; ……… = अतिनिश्चलाः
उत्तर

उदाहरण देखिए — शूराः वयम् = शूरः अहम्। यानी बहुवचन को एकवचन में बदलना है (और जहाँ एकवचन दिया हो, वहाँ बहुवचन में)।

क्रमःदत्तम्उत्तरम्वचनपरिवर्तनम्
(क)शूराः वयम् =शूरः अहम् (उदाहरणम्)बहुवचनात् एकवचनम्
(क)वीराः वयम् =वीरः अहम्बहुवचनात् एकवचनम्
(ख)बलशाली =बलशालिनःएकवचनात् बहुवचनम्
(ख)जयगामी =जयगामिनःएकवचनात् बहुवचनम्
(ग)दृढमानसाः =दृढमानसःबहुवचनात् एकवचनम्
(ग)प्रियसाहसाः =प्रियसाहसःबहुवचनात् एकवचनम्
(घ)अतिभावुकः =अतिभावुकाःएकवचनात् बहुवचनम्
(घ)शुभचिन्तकाः =शुभचिन्तकःबहुवचनात् एकवचनम्
(ङ)धनकामना =धनकामनाःएकवचनात् बहुवचनम्
(ङ)वञ्चना =वञ्चनाःएकवचनात् बहुवचनम्
(च)वर्चस्वलः =वर्चस्वलाःएकवचनात् बहुवचनम्
(च)अतिनिश्चलः =अतिनिश्चलाःएकवचनात् बहुवचनम्
(ख) में ‘बलशालिनः’ का एकवचन ‘बलशाली’ क्यों: ‘बलशालिन्’ नकारान्त पुंलिङ्ग शब्द है — इसके रूप ‘गुणिन्’ की तरह चलते हैं: बलशाली, बलशालिनौ, बलशालिनः। यही बात ‘गुणशालिन्’ (गुणशाली) और ‘जयगामिन्’ (जयगामी) पर लागू है। ‘बलशालिनः’ को देखकर एकवचन ‘बलशालिनः’ ही लिख देना सबसे आम भूल है।
पुस्तक की छपाई पर ध्यान: प्रश्न (च) में पुस्तक में ‘वर्चस्स्वलाः’ छपा है, जबकि गीत में तथा पृष्ठ 80 की शब्दार्थ-तालिका में शुद्ध रूप ‘वर्चस्वलाः’ है। उत्तर लिखते समय शुद्ध रूप वर्चस्वलः = वर्चस्वलाः ही लिखिए। साथ ही याद रखिए कि गीत में ये ‘ऊर्जस्वला, वर्चस्वला, अतिनिश्चला’ रूप में मिलते हैं — वहाँ छन्द के कारण विसर्ग लुप्त है।
प्र4.
स्तम्भौ मेलयन्तु उत्तरं च लिखन्तु — (अ) (क) गतभीतयो धृतनीतयो (ख) यामो वयं समराङ्गणं (ग) जगदीश हे ! परमेश हे ! (घ) जयमङ्गलं परमोज्ज्वलं (ङ) जनसेवका अतिभावुकाः (च) ऊर्जस्वला वर्चस्वला ; (ब) शुभचिन्तका नियतम् / सकलेश हे भगवन् ! / विजयार्थिनो बालाः / दृढशक्तयो निखिलाः / नो देहि परमात्मन् ! / अतिनिश्चला विजये
उत्तर

यहाँ गीत की आधी-आधी पंक्तियाँ जोड़नी हैं। उदाहरण पुस्तक में दिया है — (क) का मेल ‘दृढशक्तयो निखिलाः’ से है।

(अ)(ब)उत्तराणि (पूर्णा पङ्क्तिः)
(क) गतभीतयो धृतनीतयोदृढशक्तयो निखिलाःगतभीतयो धृतनीतयो दृढशक्तयो निखिलाः (उदाहरणम्)
(ख) यामो वयं समराङ्गणंविजयार्थिनो बालाःयामो वयं समराङ्गणं विजयार्थिनो बालाः
(ग) जगदीश हे ! परमेश हे !सकलेश हे भगवन् !जगदीश हे ! परमेश हे ! सकलेश हे भगवन् !
(घ) जयमङ्गलं परमोज्ज्वलंनो देहि परमात्मन् !जयमङ्गलं परमोज्ज्वलं नो देहि परमात्मन् !
(ङ) जनसेवका अतिभावुकाःशुभचिन्तका नियतम्जनसेवका अतिभावुकाः शुभचिन्तका नियतम्
(च) ऊर्जस्वला वर्चस्वलाअतिनिश्चला विजयेऊर्जस्वला वर्चस्वला अतिनिश्चला विजये
मिलान करने का पक्का तरीका — तुक (अन्त्यानुप्रास) देखिए: हर श्लोक की दोनों पंक्तियाँ एक ही ध्वनि पर समाप्त होती हैं — निखिलाः/बालाः (श्लोक ४), भगवन्/परमात्मन् (श्लोक ५), सततम्/नियतम् (श्लोक २), हृदये/विजये (श्लोक ३)। जिस विकल्प की तुक मिल जाए, मेल वही है। इस एक युक्ति से सारे छह उत्तर बिना गीत याद किए भी मिल जाते हैं।
Check it yourself: मिलाने के बाद हर पंक्ति को गाकर देखिए — यदि लय टूटती है तो मेल ग़लत है। छन्द स्वयं अपनी जाँच कर लेता है।
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