दीपकम् अध्याय 9 नवमः पाठः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
तन्वी आकृत्या सुन्दरी, मृद्वी स्पर्शेन अतीव कोमला । शबलः चित्रवर्णः तथा च भीमः किञ्चित् स्थूलः । मार्जारी कदा गच्छति, कदा आगच्छति एतत् सर्वम् अपि राधिका जानाति । सा मार्जार्यै क्षीरं ददाति । मार्जारी पिबति । अनन्तरं सा सधन्यवादं राधिकां पश्यति । किन्तु शावकानां समीपं राधिका गच्छति चेत् मन्दं मन्दं पृष्ठतः आगच्छति । राधिकां दृष्ट्वा शावकाः भीताः न भवन्ति । पितामही राधिकायाः कार्यकलापान् दृष्ट्वा हसति । — अस्य अनुच्छेदस्य हिन्दी-अनुवादं कुर्वन्तु ।
उत्तर

यहाँ चारों शावकों का परिचय है और यह भी कि राधिका उनकी दिनचर्या तक जानती है।

संस्कृतम्हिन्दी अनुवादः
तन्वी आकृत्या सुन्दरी, मृद्वी स्पर्शेन अतीव कोमला ।तन्वी आकृति (रूप) से सुन्दर है, मृद्वी छूने में बहुत कोमल है।
शबलः चित्रवर्णः तथा च भीमः किञ्चित् स्थूलः ।शबल रंग-बिरंगा है और भीम कुछ मोटा है।
मार्जारी कदा गच्छति, कदा आगच्छति एतत् सर्वम् अपि राधिका जानाति ।बिल्ली कब जाती है, कब आती है — यह सब भी राधिका जानती है।
सा मार्जार्यै क्षीरं ददाति । मार्जारी पिबति ।वह बिल्ली को दूध देती है। बिल्ली पीती है।
अनन्तरं सा सधन्यवादं राधिकां पश्यति ।उसके बाद वह धन्यवाद के भाव से राधिका को देखती है।
किन्तु शावकानां समीपं राधिका गच्छति चेत् मन्दं मन्दं पृष्ठतः आगच्छति ।किन्तु यदि राधिका बच्चों के पास जाती है, तो (बिल्ली) धीरे-धीरे पीछे-पीछे आ जाती है।
राधिकां दृष्ट्वा शावकाः भीताः न भवन्ति ।राधिका को देखकर बच्चे डरते नहीं हैं।
पितामही राधिकायाः कार्यकलापान् दृष्ट्वा हसति ।दादी राधिका की ये सब हरकतें देखकर हँसती हैं।
बिल्ली का पीछे-पीछे आना क्यों ? वह राधिका पर अविश्वास नहीं करती — दूध पीकर वह ‘सधन्यवादं’ देखती है। पर हर माँ की तरह वह अपने बच्चों के पास किसी के जाने पर सतर्क हो जाती है। इसीलिए वह रोकती नहीं, बस ‘मन्दं मन्दं पृष्ठतः’ चली आती है। दूसरी ओर शावक ‘भीताः न भवन्ति’ — इससे सिद्ध होता है कि राधिका ने उन्हें कभी सताया नहीं।
व्याकरण-संकेतः: ‘मार्जार्यै क्षीरं ददाति’ — देने के अर्थ में जिसे दिया जाए वह चतुर्थी विभक्ति में आता है; ‘मार्जारी’ (ङीप्-अन्त स्त्रीलिङ्ग) का चतुर्थी एकवचन मार्जार्यै । ‘आकृत्या, स्पर्शेन’ इति तृतीया एकवचनम् (‘…की दृष्टि से’) । ‘दृष्ट्वा’ इति क्त्वा-प्रत्ययान्तम् अव्ययम् (= देखकर) । ‘चेत्’ अव्ययम् = यदि ।
प्र2.
सा राधिकां वदति – राधिके ! अतिथयः कदा आगच्छन्ति इति न जानीमः । किन्तु यदा ते अत्र आगच्छन्ति तदा तेषाम् एतादृशी सेवा करणीया । राधिका पितामह्याः कण्ठं परितः मालाम् इव हस्तौ स्थापयन्ती पृच्छति – अस्तु, करोमि । किन्तु किमर्थम् ? पितामही वदति – ‘अतिथिदेवो भव’ । अर्थात् अतिथिः अस्माकं देवः अस्ति इति चिन्तयतु । तस्य आदरेण सेवां करोतु । राधिका आदिनं मन्त्रम् इव वारं वारं वदति – ‘अतिथिदेवो भव’, ‘अतिथिदेवो भव’ । अनन्तरं सा तन्वीं मृद्वीं शबलं भीमं च वात्सल्येन वदति – जानन्ति किम् ‘अतिथिदेवो भव’ ? भवन्तः अपि वदन्तु – ‘अतिथिदेवो भव’ । — अस्य अनुच्छेदस्य हिन्दी-अनुवादं कुर्वन्तु ।
उत्तर

यही पाठ का सबसे सुन्दर भाग है — पितामही का उपदेश और राधिका का उसे तुरन्त आगे बढ़ा देना।

संस्कृतम्हिन्दी अनुवादः
सा राधिकां वदति – राधिके ! अतिथयः कदा आगच्छन्ति इति न जानीमः ।वे (दादी) राधिका से कहती हैं — राधिका ! अतिथि कब आते हैं, यह हम नहीं जानते।
किन्तु यदा ते अत्र आगच्छन्ति तदा तेषाम् एतादृशी सेवा करणीया ।परन्तु जब वे यहाँ आ जाएँ, तब उनकी ऐसी ही सेवा करनी चाहिए।
राधिका पितामह्याः कण्ठं परितः मालाम् इव हस्तौ स्थापयन्ती पृच्छति – अस्तु, करोमि । किन्तु किमर्थम् ?राधिका दादी के गले के चारों ओर माला की तरह अपने दोनों हाथ डालती हुई पूछती है — ठीक है, करूँगी। पर किसलिए ?
पितामही वदति – ‘अतिथिदेवो भव’ । अर्थात् अतिथिः अस्माकं देवः अस्ति इति चिन्तयतु ।दादी कहती हैं — ‘अतिथिदेवो भव’। अर्थात् यह सोचो कि अतिथि हमारा देवता है।
तस्य आदरेण सेवां करोतु ।उसकी आदर के साथ सेवा करो।
राधिका आदिनं मन्त्रम् इव वारं वारं वदति – ‘अतिथिदेवो भव’, ‘अतिथिदेवो भव’ ।राधिका दिन भर मन्त्र की तरह बार-बार कहती है — ‘अतिथिदेवो भव’, ‘अतिथिदेवो भव’।
अनन्तरं सा तन्वीं मृद्वीं शबलं भीमं च वात्सल्येन वदति – जानन्ति किम् ‘अतिथिदेवो भव’ ?उसके बाद वह तन्वी, मृद्वी, शबल और भीम से स्नेह के साथ कहती है — क्या आप जानते हैं ‘अतिथिदेवो भव’ ?
भवन्तः अपि वदन्तु – ‘अतिथिदेवो भव’ ।आप भी कहिए — ‘अतिथिदेवो भव’।
‘मालाम् इव हस्तौ स्थापयन्ती’ — एक चित्र-सा उपमा: राधिका दादी के गले में हाथ डालती है, और लेखक कहता है मानो माला पहना रही हो। यह उपमा अलङ्कार है (इव = की तरह)। इससे दो बातें एक साथ कही गईं — पोती का स्नेह, और दादी के प्रति आदर, क्योंकि माला आदरणीय को ही पहनाई जाती है।
अन्त की पंक्ति सबसे प्यारी है: राधिका जो सीखी, उसे तुरन्त बिल्ली के बच्चों को सिखाने लगती है — और वह भी ‘भवन्तः’ कहकर, यानी आदर-सूचक बहुवचन से! जिन्हें उसने अतिथि माना है, उन्हें वह ‘तुम’ नहीं, ‘आप’ कहती है। पूरा उपदेश इस एक शब्द में उतर आया है।
व्याकरण-संकेतः: ‘राधिके !’ इति आकारान्त-स्त्रीलिङ्गस्य सम्बोधन-एकवचनम् (राधिका → हे राधिके !) । ‘करणीया’ इति अनीयर्-प्रत्ययान्तं कृत्य-रूपम् (= करनी चाहिए) — कर्मणि प्रयोगः, अतः ‘सेवा’ (स्त्रीलिङ्गम्) के अनुसार ‘करणीया’ । ‘चिन्तयतु, करोतु, वदन्तु’ इति लोट्-लकारः आदरार्थे । ‘कण्ठं परितः’ — ‘परितः’ इति अव्ययस्य योगे द्वितीया विभक्तिः भवति ।
प्र3.
अस्तु, करोमि । किन्तु किमर्थम् ? (पाठ्य-प्रश्नः, पृष्ठ 99)
उत्तर

यह राधिका का प्रश्न है — ‘सेवा तो कर दूँगी, पर करूँ क्यों ?’ पितामही का उत्तर ही पाठ का सार है।

संस्कृतेन उत्तरम् — ‘अतिथिदेवो भव’ इति उपनिषदः वचनम् । अर्थात् अतिथिः अस्माकं देवः अस्ति इति चिन्तनीयम् । अतः तस्य आदरेण सेवा करणीया । (हिन्दी: ‘अतिथिदेवो भव’ उपनिषद् का वचन है। अर्थात् यह सोचना चाहिए कि अतिथि हमारा देवता है। इसीलिए उसकी आदर के साथ सेवा करनी चाहिए।)

राधिका का ‘किमर्थम् ?’ पूछना ग़लत नहीं, अच्छा है: वह आज्ञा मान भी रही है (‘अस्तु, करोमि’) और कारण भी जानना चाहती है। पितामही डाँटती नहीं — कारण बता देती हैं। जो काम कारण समझकर किया जाए, वही आदत बनता है — इसीलिए राधिका दिन भर वही वाक्य दोहराती रह जाती है।
व्याकरण-संकेतः: ‘किमर्थम्’ = किं निमित्तम् = किसलिए, क्यों — यह अव्ययपदम् है, इसके रूप कभी नहीं बदलते । ‘अस्तु’ इति ‘अस्’ धातोः लोट्-लकारे प्रथमपुरुषे एकवचनम् (= हो जाए, ठीक है) ।
प्र4.
जानन्ति किम् ‘अतिथिदेवो भव’ ? भवन्तः अपि वदन्तु – ‘अतिथिदेवो भव’ । (पाठ्य-प्रश्नः, पृष्ठ 99)
उत्तर

यह प्रश्न राधिका शावकों से पूछती है — और सचमुच पुस्तक के पाठक से भी।

संस्कृतेन उत्तरम् — आम्, वयं जानीमः । ‘अतिथिदेवो भव’ इत्यस्य अर्थः — अतिथिः देवः इति मत्वा तस्य आदरेण सेवां कुरु । (हिन्दी: हाँ, हम जानते हैं। ‘अतिथिदेवो भव’ का अर्थ है — अतिथि को देवता मानकर आदरपूर्वक उसकी सेवा करो।)

व्याकरण-संकेतः — ‘भवन्तः’ बहुत काम का शब्द है: ‘भवत्’ शब्द आदरार्थक (आप) है और क्रिया सदा प्रथमपुरुष में लगती है, मध्यमपुरुष में नहीं। इसीलिए ‘भवन्तः वदन्ति’ (आप कहते हैं), ‘भवन्तः जानन्ति किम् ?’ (क्या आप जानते हैं ?) । एकवचने ‘भवान् वदति’ (पुं.), ‘भवती वदति’ (स्त्री.) ।
Try This: इसी साँचे से अपने वाक्य बनाइए — भवन्तः अपि पठन्तु । (आप भी पढ़िए।) भवान् अत्र उपविशतु । (आप यहाँ बैठिए।) भवती किं जानाति ? (आप क्या जानती हैं ?)
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