दीपकम् अध्याय 9 अतिथिदेवो भव के लिए एनसीईआरटी समाधान
अद्यतन 2026-09-05
इस अध्याय के बारे में
पाठ का मूल वाक्य उपनिषद् से आया है — ‘अतिथिदेवो भव’ (तैत्तिरीयोपनिषद्, शिक्षावल्ली)। अर्थ है — ‘अतिथि को देवता मानो’। पाठ-प्रवेश बताता है कि भारतीय संस्कृति में अतिथि-सेवा पञ्चमहायज्ञों में गिनी जाती है, और यहाँ केवल मनुष्य ही नहीं, अन्य प्राणी भी अतिथि के रूप में प्रीति के पात्र होते हैं। कहानी बहुत सरल है। राधिका के घर की छत पर एक बिल्ली और उसके चार बच्चे आ गए हैं। राधिका उनके नाम रखती है — तन्वी, मृद्वी, शबलः, भीमः — और हर नाम उनके अपने गुण से जुड़ा है। वह बिल्ली को दूध देती है, शावकों के पास जाती है, और शावक उससे डरते नहीं। पितामही का उपदेश ही पाठ का केन्द्र है। वे कहती हैं — ‘अतिथयः कदा आगच्छन्ति इति न जानीमः, किन्तु यदा ते अत्र आगच्छन्ति तदा तेषाम् एतादृशी सेवा करणीया’ — अर्थात् अतिथि कब आएगा यह पता नहीं, पर जब आए तब उसकी ऐसी ही सेवा करनी चाहिए। पाठ का अन्त बहुत प्यारा है — राधिका दि
अभ्यास
- नवमः पाठः
- नवमः पाठः
- वयं शब्दार्थान् जानीमः
- वयम् अभ्यासं कुर्मः
- वयम् अभ्यासं कुर्मः
- वयम् अभ्यासं कुर्मः
- वयम् अभ्यासं कुर्मः
- योग्यताविस्तरः
- योग्यताविस्तरः
- परियोजनाकार्यम्