दीपकम् अध्याय 9 परियोजनाकार्यम्

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
पाठे मार्जारशावकानां नामानि पश्यन्तु । तेषां नामकरणे राधिकायाः किं चिन्तनम् आसीत् ? तदनुसारं स्वनामधेये किम् उद्देश्यं स्यात् इति विमर्शं कुर्वन्तु ।
उत्तर

राधिका ने नाम यों ही नहीं रख दिए — उसने हर शावक को ध्यान से देखा और जो गुण सबसे पहले दिखा, वही नाम बना दिया। पाठ की एक ही पंक्ति इसका प्रमाण है: ‘तन्वी आकृत्या सुन्दरी, मृद्वी स्पर्शेन अतीव कोमला । शबलः चित्रवर्णः तथा च भीमः किञ्चित् स्थूलः ।’

नामशब्दस्य अर्थःपाठे तस्य गुणःअतः नाम किमर्थम् ?
तन्वीकृशा, सुन्दरी (तनु = पतला, सुडौल)आकृत्या सुन्दरीरूप-आकृति से सुन्दर थी, इसलिए ‘तन्वी’
मृद्वीकोमला (मृदु = मुलायम)स्पर्शेन अतीव कोमलाछूने में बहुत मुलायम थी, इसलिए ‘मृद्वी’
शबलःचित्रवर्णः, कर्बुरः (रंग-बिरंगा)चित्रवर्णःउसका रंग चितकबरा था, इसलिए ‘शबलः’
भीमःविशालः, स्थूलः (हट्टा-कट्टा)किञ्चित् स्थूलःवह कुछ मोटा-तगड़ा था, इसलिए ‘भीमः’

संस्कृतेन उत्तरम् — राधिका शावकानां गुणान् दृष्ट्वा तेषां नामानि अकरोत् । यस्य यः गुणः प्रधानः आसीत्, तदनुसारम् एव तस्य नाम अभवत् । (हिन्दी: राधिका ने बच्चों के गुण देखकर उनके नाम रखे। जिसमें जो गुण प्रमुख था, उसी के अनुसार उसका नाम पड़ा।)

यही भारतीय नामकरण की परम्परा है: संस्कृत में नाम प्रायः अर्थवान् होते हैं — नाम सुनते ही व्यक्ति का गुण, गोत्र, देवता या जन्म-नक्षत्र पता चल जाता है। महाभारत का भीम भी बल के कारण ही ‘भीम’ कहलाया, और द्रौपदी ‘कृष्णा’ अपने वर्ण के कारण। राधिका अनजाने में वही परम्परा निभा रही है।

अपने नाम पर विचार — नमूना उत्तर (जैसा कक्षा में सुनाया जा सकता है):

“मम नाम अनन्या । ‘अनन्या’ इत्यस्य अर्थः — ‘या अन्या न, अद्वितीया’ । मम पितरौ इच्छतः यत् अहं स्वकार्ये अद्वितीया भवेयम् । अतः मम नाम्नः उद्देश्यम् अस्ति — स्वकर्मणि निष्ठा ।” (हिन्दी: मेरा नाम अनन्या है। इसका अर्थ है — जो दूसरी जैसी न हो, अद्वितीय। मेरे माता-पिता चाहते हैं कि मैं अपने काम में अद्वितीय बनूँ। इसलिए मेरे नाम का उद्देश्य है — अपने कर्म में निष्ठा।)

यह कार्य कैसे करें: (१) घर में पूछिए कि आपका नाम किसने और क्यों रखा। (२) शब्दकोश या संस्कृत-शिक्षक से उसका मूल अर्थ जान लीजिए। (३) दो-तीन वाक्यों में लिखिए — नाम, अर्थ, और वह गुण जो नाम आपसे चाहता है। (४) कक्षा में संस्कृत में सुनाइए — ‘मम नाम … । अस्य अर्थः … । मम नाम्नः उद्देश्यम् … ।’ इसी साँचे से हर विद्यार्थी अपना उत्तर बना सकता है।
प्र2.
विद्यालयपरिसरे किम् अस्ति, किं नास्ति इति लिखन्तु कक्षायां च श्रावयन्तु ।
उत्तर

यह पूरा कार्य प्रश्न ४ (उत्पीठिका) और प्रश्न ८ (कः कुत्र अस्ति) का ही विस्तार है — बस अब स्थान आपका अपना विद्यालय है। साँचा वही रहेगा:

विद्यालयपरिसरे + वस्तु (प्रथमा) + अस्ति / नास्ति
बहुवचने — विद्यालयपरिसरे + वस्तूनि + सन्ति / न सन्ति

नमूना उत्तर — ‘अस्ति’ इति वाक्यानि:

  • विद्यालयपरिसरे विशालं क्रीडाङ्गणम् अस्ति । (विद्यालय-परिसर में बड़ा खेल का मैदान है।)
  • विद्यालयपरिसरे पुस्तकालयः अस्ति । (पुस्तकालय है।)
  • विद्यालयपरिसरे बहवः वृक्षाः सन्ति । (बहुत-से पेड़ हैं।)
  • विद्यालयपरिसरे लघु वाटिका अस्ति । (छोटी बगिया है।)
  • विद्यालयपरिसरे जलनिकायः (नलः) अस्ति । (पानी का नल है।)
  • विद्यालयपरिसरे विज्ञानप्रयोगशाला अस्ति । (विज्ञान की प्रयोगशाला है।)

नमूना उत्तर — ‘नास्ति’ इति वाक्यानि:

  • विद्यालयपरिसरे तरणतालः नास्ति । (तैरने का तालाब नहीं है।)
  • विद्यालयपरिसरे चलच्चित्रगृहं नास्ति । (सिनेमाघर नहीं है।)
  • विद्यालयपरिसरे आपणः नास्ति । (दुकान नहीं है।)
  • विद्यालयपरिसरे कोलाहलः नास्ति । (शोर-गुल नहीं है।)
अच्छे उत्तर में क्या होना चाहिए: (१) कम-से-कम पाँच ‘अस्ति’ और तीन ‘नास्ति’ वाक्य; (२) एकवचन-बहुवचन का ध्यान — ‘वृक्षाः सन्ति’, ‘वृक्षः अस्ति’ नहीं; (३) जो सचमुच आपके विद्यालय में है वही लिखिए — यह कल्पना नहीं, निरीक्षण का कार्य है; (४) कक्षा में सुनाते समय ठहर-ठहरकर स्पष्ट उच्चारण कीजिए।
व्याकरण-संकेतः: ‘विद्यालयपरिसरे’ इति सप्तमी एकवचनम् (अधिकरणे — ‘…में’) । जिस वस्तु के होने-न-होने की बात है, वह प्रथमा विभक्ति में आएगी — ‘क्रीडाङ्गणम्’, ‘पुस्तकालयः’, ‘वाटिका’ । ‘न + अस्ति’ = नास्ति, किन्तु बहुवचने ‘न सन्ति’ अलग ही लिखा जाता है (‘नसन्ति’ नहीं) ।
प्र3.
बिडालः कुत्र अस्ति ? — चित्राणि दृष्ट्वा अव्ययपदानि अभ्यस्यन्तु । (उपरि, अधः, कोणे, केन्द्रे, समीपे, दूरे, अन्तः, बहिः, पुरतः, पृष्ठतः, दक्षिणतः, वामतः)
उत्तर

पृष्ठ 105 पर बारह छोटे चित्र हैं और हर चित्र के नीचे एक अव्यय। हर चित्र में एक ही बिल्ला है — बस उसकी जगह बदलती जाती है। नीचे हर चित्र का वर्णन और उसका पूरा वाक्य दिया है।

अव्ययम्हिन्दीचित्रे किम् दृश्यते ?वाक्यम्
उपरिऊपरबिल्ला मेज़ के ऊपर बैठा हैबिडालः उत्पीठिकायाः उपरि अस्ति ।
अधःनीचेबिल्ला मेज़ के नीचे लेटा हैबिडालः उत्पीठिकायाः अधः अस्ति ।
कोणेकोने मेंबिल्ला मेज़ के एक कोने पर बैठा हैबिडालः उत्पीठिकायाः कोणे अस्ति ।
केन्द्रेबीच मेंबिल्ला गोल दरी के ठीक बीच में बैठा हैबिडालः आस्तरणस्य केन्द्रे अस्ति ।
समीपेपास मेंबिल्ला डिब्बे के बिलकुल पास बैठा हैबिडालः मञ्जूषायाः समीपे अस्ति ।
दूरेदूरबिल्ला डिब्बे से दूर बैठा हैबिडालः मञ्जूषायाः दूरे अस्ति ।
अन्तःअन्दरबिल्ला डिब्बे के भीतर बैठा हैबिडालः मञ्जूषायाः अन्तः अस्ति ।
बहिःबाहरबिल्ला डिब्बे से बाहर निकल रहा हैबिडालः मञ्जूषायाः बहिः अस्ति ।
पुरतःआगेगेंद पीछे है, बिल्ला उसके आगे हैबिडालः कन्दुकस्य पुरतः अस्ति ।
पृष्ठतःपीछेगेंद आगे है, बिल्ला उसके पीछे हैबिडालः कन्दुकस्य पृष्ठतः अस्ति ।
दक्षिणतःदाहिनी ओरबालक बैठा है और बिल्ला उसके दाहिनी ओर हैबिडालः बालकस्य दक्षिणतः अस्ति ।
वामतःबाईं ओरबालक बैठा है और बिल्ला उसके बाईं ओर हैबिडालः बालकस्य वामतः अस्ति ।
ये बारह शब्द जोड़ों में याद कीजिए: उपरि–अधः (ऊपर–नीचे), अन्तः–बहिः (अन्दर–बाहर), समीपे–दूरे (पास–दूर), पुरतः–पृष्ठतः (आगे–पीछे), दक्षिणतः–वामतः (दाएँ–बाएँ), और कोणे–केन्द्रे (कोने में–बीच में)। विपरीत जोड़े बनाकर याद करने से बारह शब्द छह में सिमट जाते हैं।
व्याकरण-संकेतः — इनके साथ कौन-सी विभक्ति ? ‘उपरि, अधः, अन्तः, समीपे, दूरे, पुरतः, पृष्ठतः, दक्षिणतः, वामतः’ के योग में जिसका ऊपर/नीचे/पास हो वह पद षष्ठी विभक्ति में आता है — ‘उत्पीठिकाया उपरि’, ‘कन्दुकस् पुरतः’ । केवल ‘बहिः’ के साथ प्रायः पञ्चमी भी दिखती है — ‘गृहात् बहिः’ (प्रश्न ७ का वाक्य) ।
Tip: ‘कोणे, केन्द्रे, समीपे, दूरे’ मूलतः सप्तमी विभक्ति के रूप हैं (कोणः → कोणे), अव्यय नहीं; किन्तु ये सदा इसी एक रूप में स्थान बताने के लिए आते हैं, इसीलिए पुस्तक ने इन्हें भी इसी चित्रावली में रख दिया है। परीक्षा में यदि ‘अव्ययपदं चिनुत’ पूछा जाए तो उपरि, अधः, अन्तः, बहिः, पुरतः, पृष्ठतः, दक्षिणतः, वामतः — ये ही चुनिए।
Try This: अपनी कक्षा में खड़े होकर पाँच वाक्य बोलिए — अध्यापकः मम पुरतः अस्ति । मित्रं मम वामतः अस्ति । कन्दुकः उत्पीठिकायाः अधः अस्ति । स्यूतः मञ्जूषायाः अन्तः अस्ति । क्रीडाङ्गणं विद्यालयस्य बहिः अस्ति ।
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