| स्तंभ I | मिलान | स्तंभ II | कारण |
|---|---|---|---|
| (i) पृथ्वी का उपग्रह | (घ) | चंद्रमा | चंद्रमा पृथ्वी का एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह है; यह लगभग 27 दिन में पृथ्वी की एक परिक्रमा करता है। |
| (ii) लाल ग्रह | (ग) | मंगल | मंगल लाल दिखाई देता है क्योंकि उसकी सतह की मृदा का रंग लाल है। |
| (iii) तारा-मंडल | (क) | ओरायन | ओरायन एक तारा-मंडल है, जिसकी कल्पना तीन तारों की पेटी वाले शिकारी के रूप में की जाती है। |
| (iv) एक ग्रह जिसे सामान्यत: सांध्य तारा कहा जाता है | (ख) | शुक्र | शुक्र सूर्यास्त के बाद पश्चिम में चमकता दिखता है— पर यह ग्रह है, तारा नहीं। |
कुतूहल अध्याय 12 आइए, और अधिक सीखें
अद्यतन2026-09-05
(क) पहेली का हल— अक्षर दर अक्षर:
| संकेत | हल | अक्षर |
|---|---|---|
| मंत्रणा में है, यंत्रणा में नहीं | मंत्रणा = म + त्र + णा · यंत्रणा = य + त्र + णा → अंतर का अक्षर | म |
| गगन और सागर दोनों में है | गगन = ग + ग + न · सागर = सा + ग + र → उभयनिष्ठ अक्षर | ग |
| जल में है, जग में नहीं | जल = ज + ल · जग = ज + ग → अंतर का अक्षर | ल |
उत्तर: मंगल— लाल ग्रह, सूर्य से चौथा ग्रह।
(ख) मेरी बनाई दो पहेलियाँ। इन्हें भी इसी विधि से हल कीजिए।
मेरे नाम का पहला अक्षर शक्ति में है, भक्ति में नहीं,
मेरे नाम का दूसरा अक्षर कबूतर और मकान दोनों में है,
मेरे नाम का तीसरा अक्षर रथ में है, पथ में नहीं,
सूर्य और चंद्रमा के बाद मैं आकाश का सबसे चमकीला पिंड हूँ।
उत्तर: शुक्र (श + क + र)
मेरे नाम का पहला अक्षर बल में है, फल में नहीं,
मेरे नाम का दूसरा अक्षर धन और बंधन दोनों में है,
मैं सूर्य के सबसे निकट का ग्रह हूँ।
उत्तर: बुध (ब + ध)
कारण: लुब्धक (सिरियस) एक तारा है— रात्रि-आकाश का सबसे चमकीला तारा— जो कैनिस मेजर तारा-मंडल का अंग है। यह सौर परिवार से बहुत बाहर है और सूर्य की परिक्रमा नहीं करता।
- (ख) क्षुद्रग्रह— सदस्य हैं। छोटे चट्टानी पिंड, जिनमें से अधिकांश मंगल और बृहस्पति के बीच क्षुद्रग्रह पट्टी में हैं।
- (ग) धूमकेतु— सदस्य हैं। बर्फ और चट्टान के पिंड; अनेक धूमकेतु सूर्य की परिक्रमा करते हैं और नियत समय पर लौटते हैं।
- (घ) प्लूटो— सदस्य है। यह वरुण से आगे रहकर सूर्य की परिक्रमा करता है; 2006 से इसे वामन ग्रह कहा जाता है, पर यह सौर परिवार का ही अंग है।
कारण: प्लूटो सूर्य की परिक्रमा तो करता है और वरुण से भी दूर स्थित है, किंतु इसे ग्रह नहीं गिना जाता। यह पृथ्वी के चंद्रमा से भी छोटा है। जब इसके जैसे और अनेक छोटे पिंड खोजे गए तो अंतरराष्ट्रीय खगोलीय संघ (आई.ए.यू.) ने 2006 में ग्रह कहलाने की शर्तों को पुनर्परिभाषित किया। उस परिभाषा के अनुसार प्लूटो और उसके जैसे छोटे पिंड अब वामन ग्रह कहलाते हैं।
बृहस्पति, वरुण और शनि— ये तीनों सूर्य के आठ ग्रहों में से हैं।
- लुब्धक (सिरियस), जो कैनिस मेजर तारा-मंडल में है, संपूर्ण रात्रि-आकाश का सबसे चमकीला तारा है। ओरायन की पेटी की रेखा पूर्व की ओर बढ़ाते ही यह अचूक रूप से मिल जाता है।
- ध्रुव तारा (पोल स्टार) बहुत चमकीला नहीं है। पाठ्यपुस्तक स्वयं कहती है कि इसे पहचानने के लिए ऐसी रात चुनिए जिसमें न चंद्रमा हो न बादल— ठीक इसीलिए कि यह धुँधला है।
नहीं, चित्र 12.12 में ग्रहों का क्रम ठीक नहीं है। दो जोड़ी ग्रह आपस में बदल गए हैं।
सूर्य से बाहर की ओर चित्र में क्रम इस प्रकार बनाया गया है— बुध, पृथ्वी, शुक्र, मंगल, बृहस्पति, यूरेनस, शनि, वरुण। अब इसकी तुलना सही क्रम से कीजिए—
| बॉक्स | चित्र 12.12 में बना ग्रह | सही ग्रह | |
|---|---|---|---|
| 1 | बुध | बुध | ठीक |
| 2 | पृथ्वी (नीला, बादलों सहित) | शुक्र | बदला हुआ |
| 3 | शुक्र (नारंगी-भूरा) | पृथ्वी | बदला हुआ |
| 4 | मंगल | मंगल | ठीक |
| 5 | बृहस्पति | बृहस्पति | ठीक |
| 6 | यूरेनस (हल्का नीला, पतला खड़ा वलय) | शनि | बदला हुआ |
| 7 | शनि (पीला, चौड़े वलय) | यूरेनस | बदला हुआ |
| 8 | वरुण | वरुण | ठीक |
अतः बॉक्सों में सूर्य से बाहर की ओर यह क्रम लिखा जाना चाहिए—
अपनी पुस्तक के चित्र पर कैसे काम करें:
- चित्र 12.13 के ऊपरी-बाएँ भाग में सात सबसे चमकीले बिंदु ढूँढ़िए। इनमें से चार थोड़ा तिरछा आयत (कप) बनाते हैं और तीन एक कोने से हल्के मोड़ के साथ आगे निकलते हैं (हत्था)। इन्हें जोड़ दीजिए— यही बिग डिपर (सप्तर्षि) है।
- कप के बाहरी किनारे के दो तारे लीजिए— वह किनारा जो हत्थे से दूर है। इनसे होकर एक हल्की सरल रेखा खींचिए, जो कप से दूर जा रही हो।
- इन दोनों तारों के बीच की दूरी नापिए और उसी रेखा पर लगभग पाँच गुनी दूरी आगे जाइए। वहाँ एक अकेला, अपेक्षाकृत धुँधला तारा मिलेगा— उस पर ध्रुव तारा लिखिए।
- उसी तारे से आरंभ करके तीन तारों का छोटा मुड़ा हुआ हत्था और फिर चार तारों का छोटा कप जोड़िए। यह छोटी करछी लिटिल डिपर है। ध्यान दीजिए कि ध्रुव तारा इसी के हत्थे के सिरे पर है।
आपका पूरा किया हुआ चित्र ऐसा दिखना चाहिए—
अपनी पुस्तक के चित्र पर कैसे काम करें:
- चित्र 12.14 के लगभग बीच में तीन अपेक्षाकृत चमकीले बिंदु ढूँढ़िए जो एक छोटी, सीधी पंक्ति में समान दूरी पर बहुत पास-पास हैं। यही ओरायन की पेटी है— सबसे पहले इसी को पहचानिए।
- पेटी के ऊपर दो चमकीले तारे चिह्नित कीजिए, जो शिकारी के कंधे बनाते हैं (इनमें से अधिक चमकीला और लालिमा लिए तारा बीटलजूज है)।
- पेटी के नीचे दो चमकीले तारे चिह्नित कीजिए, जो पैर बनाते हैं (अत्यंत चमकीला तारा राइजल है)।
- दोनों ओर कंधा → पेटी का सिरा → पैर जोड़िए, और ऊपर दोनों कंधों को आपस में जोड़ दीजिए। अब ओरायन की लंबी, कमर से पतली आकृति बन जाएगी।
- अब पेटी के तीनों तारों की रेखा को पूर्व की ओर आगे बढ़ाइए (चित्र में पेटी से नीचे की ओर)। उस रेखा पर मिलने वाला पहला अत्यंत चमकीला तारा लुब्धक है। उसका नाम अंकित कीजिए।
आपका पूरा किया हुआ चित्र ऐसा दिखना चाहिए—
तारे दिन भर चमकते रहते हैं। वे केवल सूर्य के प्रकाश में दब जाते हैं।
- सूर्य के उदय होते ही उसका प्रकाश हमारे ऊपर की वायु पर पड़ता है और वायुमंडल की गैसों तथा धूल-कणों द्वारा चारों ओर बिखेर दिया जाता है। यही बिखरा हुआ प्रकाश दिन के संपूर्ण आकाश को चमकीला और नीला बना देता है।
- किसी भी अन्य तारे से हम तक पहुँचने वाला प्रकाश अत्यंत क्षीण होता है, क्योंकि हर तारा असाधारण रूप से दूर है।
- अत्यंत चमकीली पृष्ठभूमि पर क्षीण प्रकाश अलग नहीं दिखता। इसलिए दिन के चमकते आकाश में तारे अदृश्य हो जाते हैं— अनुपस्थित नहीं होते।
- संध्याकाल में सूर्य क्षितिज के नीचे चला जाता है, बिखरा हुआ प्रकाश घटता जाता है, आकाश की पृष्ठभूमि गहराती जाती है और एक-एक करके चमकीले तारे दिखने लगते हैं। उषाकाल में इसका उल्टा होता है और वे लुप्त हो जाते हैं।
प्रेक्षण: हाँ, सप्तर्षि गति करता हुआ प्रतीत होता है— किंतु ध्रुव तारा नहीं।
- रात भर संपूर्ण सप्तर्षि ध्रुव तारे के चारों ओर एक वृत्त में घूमता प्रतीत होता है, और उत्तर की ओर मुँह करने पर यह घूमना वामावर्त (एंटी-क्लॉकवाइज़) दिखता है।
- पैटर्न का आकार कभी नहीं बदलता; केवल उसका झुकाव बदलता है। किसी समय वह सीधा खड़ा दिखता है तो कुछ घंटों बाद लगभग लेटा हुआ।
- प्रत्येक तारे की ध्रुव तारे से दूरी भी वही बनी रहती है— पूरा पैटर्न बस उसी एक बिंदु के चारों ओर घूम जाता है।
- ध्रुव तारा पूरी रात एक ही स्थान पर, उत्तर दिशा में, क्षितिज से उतनी ही ऊँचाई पर बना रहता है।
→ लगभग 15° प्रति घंटा
→ 2 से 3 घंटे के अंतराल में लगभग 30° से 45°
कच्चा रेखाचित्र (3 घंटे के अंतर पर तीन प्रेक्षण):
यह आपकी अपनी सृजनात्मक रचना है, इसलिए इसका कोई एक सही उत्तर नहीं है। अच्छी रचना में वही बातें आनी चाहिए जो आपने इस अध्याय में सीखी हैं— सप्तर्षि, ध्रुव तारा, ओरायन की पेटी, लुब्धक, आकाश गंगा, धूमकेतु, चंद्रमा के गर्त— न कि केवल "टिमटिमाते हीरे" जैसे गोल-मोल शब्द।
अच्छे उत्तर में क्या होना चाहिए:
- रात्रि-आकाश के एक-दो वास्तविक पिंड, सही नाम के साथ।
- उनके बारे में कोई सच्ची बात (ध्रुव तारा उत्तर में अचल रहता है; लुब्धक सबसे चमकीला तारा है; धूमकेतु सूर्य के पास आकर पूँछ बना लेता है)।
- कोई भाव— विस्मय, जिज्ञासा, या कोई प्रश्न जिसका उत्तर आप जानना चाहते हैं।
वह दीपक जो कभी नहीं हिलता
सात ऋषि लेकर चलते हैं उजियारी करछी,
धीरे-धीरे घूमे रात की ऊँची छत पर।
वे झुकते हैं, मुड़ते हैं, चलते ही जाते हैं,
पर उत्तर में एक छोटा दीपक टँगा रह जाता है।
न वह सबसे चमकीला है, न सबसे सुंदर,
फिर भी नाविकों ने सबसे अधिक उसी पर भरोसा किया।
ओरायन चलता रहे, लुब्धक जलता रहे—
ध्रुव अकेला है जो कभी भटकता नहीं।
और उसी दीपक के नीचे, लद्दाख की ठंडी रात में,
आकाश गंगा प्रकाश से छलक पड़ती है—
तारों की वह नदी जो किसी बाल्टी में नहीं समाती,
और मैं एक सुनहरे ग्रह पर बैठा नन्हा-सा कण हूँ।
यांग्डोल को नींद नहीं आ रही थी। उसने अपना गोंचा लपेटा, छत पर चढ़ी और ठंडे पत्थर पर लेट गई। दोरजे भी दादा जी का पुराना पीतल का दिक्सूचक लेकर ऊपर आ गया।
"देख," उसने कहा, "करछी खिसक गई है।" नौ बजे सप्तर्षि पहाड़ी के ऊपर सीधा खड़ा था; अब आधी रात के बाद वह तिरछा लेटा हुआ था।
"वह नहीं खिसकी," यांग्डोल बोली। "हम खिसके हैं। पृथ्वी हमारे नीचे घूम गई।" उसने उँगली से दोनों संकेतक तारे जोड़े, पाँच गुनी दूरी गिनी और एक धुँधले, अकेले तारे पर रुक गई। दोरजे ने दिक्सूचक खोला। सुई और तारा दोनों एक ही बात कह रहे थे— उत्तर।
उनके ऊपर आकाश गंगा एक पहाड़ से दूसरे पहाड़ तक फैली थी। यांग्डोल ने सोचा— उस प्रकाश की पट्टी में कहीं कोई तारा होगा, उसका कोई ग्रह होगा, और शायद उस ग्रह पर भी कोई छत पर लेटा हमें ही देख रहा होगा। यही सोचते-सोचते वह सो गई।