कुतूहल अध्याय 12 आइए, और अधिक सीखें

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
निम्नलिखित का मिलान कीजिए— स्तंभ I: (i) पृथ्वी का उपग्रह, (ii) लाल ग्रह, (iii) तारा-मंडल, (iv) एक ग्रह जिसे सामान्यत: सांध्य तारा कहा जाता है। स्तंभ II: (क) ओरायन, (ख) शुक्र, (ग) मंगल, (घ) चंद्रमा।
उत्तर
स्तंभ Iमिलानस्तंभ IIकारण
(i) पृथ्वी का उपग्रह(घ)चंद्रमाचंद्रमा पृथ्वी का एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह है; यह लगभग 27 दिन में पृथ्वी की एक परिक्रमा करता है।
(ii) लाल ग्रह(ग)मंगलमंगल लाल दिखाई देता है क्योंकि उसकी सतह की मृदा का रंग लाल है।
(iii) तारा-मंडल(क)ओरायनओरायन एक तारा-मंडल है, जिसकी कल्पना तीन तारों की पेटी वाले शिकारी के रूप में की जाती है।
(iv) एक ग्रह जिसे सामान्यत: सांध्य तारा कहा जाता है(ख)शुक्रशुक्र सूर्यास्त के बाद पश्चिम में चमकता दिखता है— पर यह ग्रह है, तारा नहीं।
(i) → (घ)   (ii) → (ग)   (iii) → (क)   (iv) → (ख)
सुझाव: जब यही शुक्र सूर्योदय से पहले पूर्व में दिखता है तो इसे भोर का तारा कहते हैं। ग्रह वही है, केवल समय अलग है।
प्र2.
(क) निम्नलिखित पहेलियों को हल कीजिए— मेरे नाम का पहला अक्षर मंत्रणा में है यंत्रणा में नहीं, मेरे नाम का दूसरा अक्षर गगन और सागर दोनों में है, मेरे नाम का तीसरा अक्षर जल में है, जग में नहीं, मैं सूर्य की परिक्रमा करने वाला एक ग्रह हूँ। (ख) इस प्रकार की दो पहेलियाँ आप स्वयं बनाइए।
उत्तर

(क) पहेली का हल— अक्षर दर अक्षर:

संकेतहलअक्षर
मंत्रणा में है, यंत्रणा में नहींमंत्रणा = + त्र + णा  ·  यंत्रणा = + त्र + णा  → अंतर का अक्षर
गगन और सागर दोनों में हैगगन = ग + ग + न  ·  सागर = सा + + र  → उभयनिष्ठ अक्षर
जल में है, जग में नहींजल = ज +  ·  जग = ज + ग  → अंतर का अक्षर
म + ग + ल = मंगल
उत्तर: मंगल— लाल ग्रह, सूर्य से चौथा ग्रह।

(ख) मेरी बनाई दो पहेलियाँ। इन्हें भी इसी विधि से हल कीजिए।

पहेली 1
मेरे नाम का पहला अक्षर शक्ति में है, भक्ति में नहीं,
मेरे नाम का दूसरा अक्षर कबूतर और मकान दोनों में है,
मेरे नाम का तीसरा अक्षर रथ में है, पथ में नहीं,
सूर्य और चंद्रमा के बाद मैं आकाश का सबसे चमकीला पिंड हूँ।
उत्तर: शुक्र (श + क + र)
पहेली 2
मेरे नाम का पहला अक्षर बल में है, फल में नहीं,
मेरे नाम का दूसरा अक्षर धन और बंधन दोनों में है,
मैं सूर्य के सबसे निकट का ग्रह हूँ।
उत्तर: बुध (ब + ध)
अपनी पहेली कैसे बनाएँ: पहले उत्तर लिखिए, फिर उसके हर अक्षर के लिए दो छोटे शब्द ढूँढ़िए— एक जिसमें वह अक्षर हो और एक जिसमें न हो, पर बाकी सब मिलता-जुलता हो (जल / जग)। जिस अक्षर को रखना है, उसके लिए ऐसे दो शब्द लीजिए जिनमें केवल वही अक्षर उभयनिष्ठ हो (गगन / सागर)।
प्र3.
निम्नलिखित में से कौन सौर परिवार का सदस्य नहीं है? (क) लुब्धक (ख) क्षुद्रग्रह (ग) धूमकेतु (घ) प्लूटो
उत्तर
उत्तर: (क) लुब्धक

कारण: लुब्धक (सिरियस) एक तारा है— रात्रि-आकाश का सबसे चमकीला तारा— जो कैनिस मेजर तारा-मंडल का अंग है। यह सौर परिवार से बहुत बाहर है और सूर्य की परिक्रमा नहीं करता।

  • (ख) क्षुद्रग्रह— सदस्य हैं। छोटे चट्टानी पिंड, जिनमें से अधिकांश मंगल और बृहस्पति के बीच क्षुद्रग्रह पट्टी में हैं।
  • (ग) धूमकेतु— सदस्य हैं। बर्फ और चट्टान के पिंड; अनेक धूमकेतु सूर्य की परिक्रमा करते हैं और नियत समय पर लौटते हैं।
  • (घ) प्लूटो— सदस्य है। यह वरुण से आगे रहकर सूर्य की परिक्रमा करता है; 2006 से इसे वामन ग्रह कहा जाता है, पर यह सौर परिवार का ही अंग है।
सुझाव: सौर परिवार की सदस्यता की कसौटी सरल है— क्या वह हमारे सूर्य की परिक्रमा करता है? लुब्धक नहीं करता; वह स्वयं एक सूर्य है।
प्र4.
निम्नलिखित में से कौन सूर्य का ग्रह नहीं है? (क) बृहस्पति (ख) वरुण (ग) प्लूटो (घ) शनि
उत्तर
उत्तर: (ग) प्लूटो

कारण: प्लूटो सूर्य की परिक्रमा तो करता है और वरुण से भी दूर स्थित है, किंतु इसे ग्रह नहीं गिना जाता। यह पृथ्वी के चंद्रमा से भी छोटा है। जब इसके जैसे और अनेक छोटे पिंड खोजे गए तो अंतरराष्ट्रीय खगोलीय संघ (आई.ए.यू.) ने 2006 में ग्रह कहलाने की शर्तों को पुनर्परिभाषित किया। उस परिभाषा के अनुसार प्लूटो और उसके जैसे छोटे पिंड अब वामन ग्रह कहलाते हैं।

बृहस्पति, वरुण और शनि— ये तीनों सूर्य के आठ ग्रहों में से हैं।

क्या आप जानते हैं? प्लूटो 1930 में खोजा गया था और 76 वर्ष तक उसे नौवाँ ग्रह कहा जाता रहा। नए प्रमाण मिलने पर विज्ञान ने अपना मत बदल दिया— विज्ञान को ऐसा ही होना चाहिए।
प्र5.
ध्रुव तारा और लुब्धक में से कौन अधिक चमकदार तारा है?
उत्तर
लुब्धक अधिक चमकदार तारा है।
  • लुब्धक (सिरियस), जो कैनिस मेजर तारा-मंडल में है, संपूर्ण रात्रि-आकाश का सबसे चमकीला तारा है। ओरायन की पेटी की रेखा पूर्व की ओर बढ़ाते ही यह अचूक रूप से मिल जाता है।
  • ध्रुव तारा (पोल स्टार) बहुत चमकीला नहीं है। पाठ्यपुस्तक स्वयं कहती है कि इसे पहचानने के लिए ऐसी रात चुनिए जिसमें न चंद्रमा हो न बादल— ठीक इसीलिए कि यह धुँधला है।
फिर भी ध्रुव तारा अधिक उपयोगी क्यों है: आकाश में किसी तारे का महत्त्व उसकी चमक से तय नहीं होता। ध्रुव तारा इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि वही एक तारा पूरी रात और पूरे वर्ष उत्तर दिशा में लगभग अचल रहता है, इसलिए उससे दिशा ज्ञात की जा सकती है। लुब्धक चाहे कितना ही चमकीला हो, वह अन्य तारों की तरह आकाश में चलता रहता है।
प्र6.
सौर परिवार का किसी चित्रकार द्वारा बनाया गया चित्र 12.12 में दर्शाया गया है। क्या इसमें ग्रहों का क्रम ठीक है? यदि ठीक नहीं है तो चित्र के नीचे दिए गए बॉक्स में उनका सही क्रम लिखिए।
उत्तर

नहीं, चित्र 12.12 में ग्रहों का क्रम ठीक नहीं है। दो जोड़ी ग्रह आपस में बदल गए हैं।

सूर्य से बाहर की ओर चित्र में क्रम इस प्रकार बनाया गया है— बुध, पृथ्वी, शुक्र, मंगल, बृहस्पति, यूरेनस, शनि, वरुण। अब इसकी तुलना सही क्रम से कीजिए—

बॉक्सचित्र 12.12 में बना ग्रहसही ग्रह 
1बुधबुधठीक
2पृथ्वी (नीला, बादलों सहित)शुक्रबदला हुआ
3शुक्र (नारंगी-भूरा)पृथ्वीबदला हुआ
4मंगलमंगलठीक
5बृहस्पतिबृहस्पतिठीक
6यूरेनस (हल्का नीला, पतला खड़ा वलय)शनिबदला हुआ
7शनि (पीला, चौड़े वलय)यूरेनसबदला हुआ
8वरुणवरुणठीक

अतः बॉक्सों में सूर्य से बाहर की ओर यह क्रम लिखा जाना चाहिए—

बुध → शुक्र → पृथ्वी → मंगल → बृहस्पति → शनि → यूरेनस → वरुण
सूर्य से बढ़ती हुई दूरी सूर्य क्षुद्रग्रह पट्टी 1 2 3 4 5 6 7 8 बुध शुक्र पृथ्वी मंगल बृहस्पति शनि यूरेनस वरुण
सूर्य से बाहर की ओर आठ ग्रहों का सही क्रम। चित्र में आकार और दूरियाँ किसी स्केल के अनुसार नहीं हैं।
सुझाव— क्रम याद रखने का वाक्य: बुशुक्र पृथ्वी मंगल बृहस्पति नि यूरेनस रुण → "बुशु पृमं बृश यूव"— इसे एक साँस में दोहराइए, क्रम पक्का हो जाएगा।
चित्र में गलती स्वयं कैसे पकड़ें: पृथ्वी नीली-सफेद होती है (जल और बादल); शुक्र सादा पीला-भूरा; शनि के चौड़े और स्पष्ट वलय लगभग सपाट पड़े होते हैं; यूरेनस छोटा, हल्का नीला-हरा गोला है जिसका पतला वलय लगभग खड़ा दिखता है। चित्र 12.12 में नीली-सफेद गेंद दूसरे स्थान पर और चौड़े वलय वाला पीला विशाल ग्रह सातवें स्थान पर है— दोनों अपने स्थान से एक-एक कदम खिसके हुए हैं।
प्र7.
रात्रि-आकाश का एक भाग चित्र 12.13 में दर्शाया गया है। बिग डिपर एवं लिटिल डिपर के तारों को सरल रेखाओं द्वारा जोड़िए। ध्रुव तारे को पहचानिए और चित्र में इसका नाम लिखिए।
उत्तर

अपनी पुस्तक के चित्र पर कैसे काम करें:

  1. चित्र 12.13 के ऊपरी-बाएँ भाग में सात सबसे चमकीले बिंदु ढूँढ़िए। इनमें से चार थोड़ा तिरछा आयत (कप) बनाते हैं और तीन एक कोने से हल्के मोड़ के साथ आगे निकलते हैं (हत्था)। इन्हें जोड़ दीजिए— यही बिग डिपर (सप्तर्षि) है।
  2. कप के बाहरी किनारे के दो तारे लीजिए— वह किनारा जो हत्थे से दूर है। इनसे होकर एक हल्की सरल रेखा खींचिए, जो कप से दूर जा रही हो।
  3. इन दोनों तारों के बीच की दूरी नापिए और उसी रेखा पर लगभग पाँच गुनी दूरी आगे जाइए। वहाँ एक अकेला, अपेक्षाकृत धुँधला तारा मिलेगा— उस पर ध्रुव तारा लिखिए।
  4. उसी तारे से आरंभ करके तीन तारों का छोटा मुड़ा हुआ हत्था और फिर चार तारों का छोटा कप जोड़िए। यह छोटी करछी लिटिल डिपर है। ध्यान दीजिए कि ध्रुव तारा इसी के हत्थे के सिरे पर है।

आपका पूरा किया हुआ चित्र ऐसा दिखना चाहिए—

ध्रुव तारा संकेतक तारे इस दूरी का लगभग 5 गुना बिग डिपर (सप्तर्षि) लिटिल डिपर
चित्र 12.13 का पूरा किया हुआ उत्तर— बिग डिपर, लिटिल डिपर और लिटिल डिपर के हत्थे के सिरे पर ध्रुव तारा।
सुझाव: पेंसिल और स्केल का उपयोग कीजिए और हल्का दबाव दीजिए, ताकि मिटाकर दोबारा प्रयास किया जा सके। पैटर्न में केवल चमकीले बिंदु आते हैं; बीच में बिखरे धुँधले बिंदुओं को छोड़ दीजिए।
प्र8.
रात्रि-आकाश का एक भाग चित्र 12.14 में दर्शाया गया है। इसमें ओरायन तारा-मंडल के तारों को सरल रेखाओं द्वारा जोड़िए। तारे लुब्धक का नाम अंकित कीजिए। इसके लिए आप चित्र 12.3 की सहायता ले सकते हैं।
उत्तर

अपनी पुस्तक के चित्र पर कैसे काम करें:

  1. चित्र 12.14 के लगभग बीच में तीन अपेक्षाकृत चमकीले बिंदु ढूँढ़िए जो एक छोटी, सीधी पंक्ति में समान दूरी पर बहुत पास-पास हैं। यही ओरायन की पेटी है— सबसे पहले इसी को पहचानिए।
  2. पेटी के ऊपर दो चमकीले तारे चिह्नित कीजिए, जो शिकारी के कंधे बनाते हैं (इनमें से अधिक चमकीला और लालिमा लिए तारा बीटलजूज है)।
  3. पेटी के नीचे दो चमकीले तारे चिह्नित कीजिए, जो पैर बनाते हैं (अत्यंत चमकीला तारा राइजल है)।
  4. दोनों ओर कंधा → पेटी का सिरा → पैर जोड़िए, और ऊपर दोनों कंधों को आपस में जोड़ दीजिए। अब ओरायन की लंबी, कमर से पतली आकृति बन जाएगी।
  5. अब पेटी के तीनों तारों की रेखा को पूर्व की ओर आगे बढ़ाइए (चित्र में पेटी से नीचे की ओर)। उस रेखा पर मिलने वाला पहला अत्यंत चमकीला तारा लुब्धक है। उसका नाम अंकित कीजिए।

आपका पूरा किया हुआ चित्र ऐसा दिखना चाहिए—

बीटलजूज ओरायन पेटी (3 तारे) राइजल लुब्धक पेटी की रेखा आगे बढ़ाइए
चित्र 12.14 का पूरा किया हुआ उत्तर— ओरायन जुड़ा हुआ, और पेटी की रेखा बढ़ाकर खोजा गया लुब्धक तारा।
पेटी ही कुंजी क्यों है: लगभग समान चमक वाले तीन तारे, लगभग समान दूरी पर, लगभग पूर्ण सरल रेखा में— ऐसा दृश्य पूरे आकाश में और कहीं नहीं है। पेटी मिल जाने पर ओरायन का हर दूसरा तारा उसी के सापेक्ष निश्चित हो जाता है— और लुब्धक भी।
प्र9.
पृथ्वी से आप उषाकाल में तारों को लुप्त होते तथा संध्याकाल में प्रकट होते देख सकते हैं। दिन के समय आप तारों को नहीं देख पाते हैं। ऐसा क्यों होता है? व्याख्या कीजिए।
उत्तर

तारे दिन भर चमकते रहते हैं। वे केवल सूर्य के प्रकाश में दब जाते हैं।

  • सूर्य के उदय होते ही उसका प्रकाश हमारे ऊपर की वायु पर पड़ता है और वायुमंडल की गैसों तथा धूल-कणों द्वारा चारों ओर बिखेर दिया जाता है। यही बिखरा हुआ प्रकाश दिन के संपूर्ण आकाश को चमकीला और नीला बना देता है।
  • किसी भी अन्य तारे से हम तक पहुँचने वाला प्रकाश अत्यंत क्षीण होता है, क्योंकि हर तारा असाधारण रूप से दूर है।
  • अत्यंत चमकीली पृष्ठभूमि पर क्षीण प्रकाश अलग नहीं दिखता। इसलिए दिन के चमकते आकाश में तारे अदृश्य हो जाते हैं— अनुपस्थित नहीं होते।
  • संध्याकाल में सूर्य क्षितिज के नीचे चला जाता है, बिखरा हुआ प्रकाश घटता जाता है, आकाश की पृष्ठभूमि गहराती जाती है और एक-एक करके चमकीले तारे दिखने लगते हैं। उषाकाल में इसका उल्टा होता है और वे लुप्त हो जाते हैं।
रोज़ का उदाहरण: अँधेरे कमरे में मोबाइल की टॉर्च चौंधिया देती है। उसी टॉर्च को दोपहर की तेज़ धूप में जलाइए— पता ही नहीं चलता कि वह जल रही है। टॉर्च नहीं बदली— पृष्ठभूमि बदल गई।
क्या आप जानते हैं? चंद्रमा पर वायुमंडल न के बराबर है, इसलिए वहाँ सूर्य के प्रकाश को बिखेरने वाला कुछ नहीं है। वहाँ का आकाश दिन में भी काला रहता है और अंतरिक्ष यात्री तेज़ धूप में खड़ा होकर भी तारे देख सकता है। इससे सिद्ध होता है कि तारों को हमसे हमारी वायु छिपाती है, स्वयं सूर्य नहीं।
प्र10.
रात में जब आकाश साफ हो तो बिग डिपर (सप्तर्षि) के अवलोकन का प्रयास 2–3 घंटे के समय अंतराल पर 3–4 बार कीजिए। प्रत्येक बार ध्रुव तारे की स्थिति देखने का प्रयास भी कीजिए। क्या सप्तर्षि गति करते हुए प्रतीत होता है? प्रत्येक प्रेक्षण का समय बताते हुए एक कच्चा रेखाचित्र बनाइए।
उत्तर

प्रेक्षण: हाँ, सप्तर्षि गति करता हुआ प्रतीत होता है— किंतु ध्रुव तारा नहीं।

  • रात भर संपूर्ण सप्तर्षि ध्रुव तारे के चारों ओर एक वृत्त में घूमता प्रतीत होता है, और उत्तर की ओर मुँह करने पर यह घूमना वामावर्त (एंटी-क्लॉकवाइज़) दिखता है।
  • पैटर्न का आकार कभी नहीं बदलता; केवल उसका झुकाव बदलता है। किसी समय वह सीधा खड़ा दिखता है तो कुछ घंटों बाद लगभग लेटा हुआ।
  • प्रत्येक तारे की ध्रुव तारे से दूरी भी वही बनी रहती है— पूरा पैटर्न बस उसी एक बिंदु के चारों ओर घूम जाता है।
  • ध्रुव तारा पूरी रात एक ही स्थान पर, उत्तर दिशा में, क्षितिज से उतनी ही ऊँचाई पर बना रहता है।
आकाश लगभग 24 घंटे में 360° घूमता है
→ लगभग 15° प्रति घंटा
→ 2 से 3 घंटे के अंतराल में लगभग 30° से 45°

कच्चा रेखाचित्र (3 घंटे के अंतर पर तीन प्रेक्षण):

ध्रुव तारा— अचल रहता है रात 9 बजे रात 12 बजे प्रात: 3 बजे पूरा पैटर्न ध्रुव तारे के चारों ओर वामावर्त घूमता प्रतीत होता है
वही सप्तर्षि रात 9 बजे, 12 बजे और प्रात: 3 बजे। आकृति वही है; केवल अचल ध्रुव तारे के चारों ओर उसकी स्थिति हर तीन घंटे में लगभग 45° घूम गई है।
ऐसा क्यों होता है: तारे वास्तव में हमारे आकाश में चल नहीं रहे— पृथ्वी अपने अक्ष पर घूम रही है, लगभग 24 घंटे में एक बार। घूमती पृथ्वी पर खड़े होकर हमें संपूर्ण आकाश उल्टी दिशा में घूमता प्रतीत होता है। ध्रुव तारा पृथ्वी के अक्ष की सीध में है, इसलिए वही एक बिंदु है जो घूमता नहीं दिखता और शेष सभी तारे उसी के चारों ओर चक्कर लगाते प्रतीत होते हैं।
स्वयं जाँचिए: हर प्रेक्षण में कॉपी को एक ही दिशा में पकड़िए और सप्तर्षि के साथ क्षितिज तथा ध्रुव तारा भी बनाइए। हर चित्र के पास समय लिखिए। तीन चित्रों के बाद यह घूमना स्पष्ट दिखने लगेगा।
प्र11.
रात्रि-आकाश के बारे में चिंतन कीजिए और इसके संबंध में कोई कविता अथवा कहानी लिखिए।
उत्तर

यह आपकी अपनी सृजनात्मक रचना है, इसलिए इसका कोई एक सही उत्तर नहीं है। अच्छी रचना में वही बातें आनी चाहिए जो आपने इस अध्याय में सीखी हैं— सप्तर्षि, ध्रुव तारा, ओरायन की पेटी, लुब्धक, आकाश गंगा, धूमकेतु, चंद्रमा के गर्त— न कि केवल "टिमटिमाते हीरे" जैसे गोल-मोल शब्द।

अच्छे उत्तर में क्या होना चाहिए:

  • रात्रि-आकाश के एक-दो वास्तविक पिंड, सही नाम के साथ।
  • उनके बारे में कोई सच्ची बात (ध्रुव तारा उत्तर में अचल रहता है; लुब्धक सबसे चमकीला तारा है; धूमकेतु सूर्य के पास आकर पूँछ बना लेता है)।
  • कोई भाव— विस्मय, जिज्ञासा, या कोई प्रश्न जिसका उत्तर आप जानना चाहते हैं।
नमूना उत्तर— कविता
वह दीपक जो कभी नहीं हिलता

सात ऋषि लेकर चलते हैं उजियारी करछी,
धीरे-धीरे घूमे रात की ऊँची छत पर।
वे झुकते हैं, मुड़ते हैं, चलते ही जाते हैं,
पर उत्तर में एक छोटा दीपक टँगा रह जाता है।

न वह सबसे चमकीला है, न सबसे सुंदर,
फिर भी नाविकों ने सबसे अधिक उसी पर भरोसा किया।
ओरायन चलता रहे, लुब्धक जलता रहे—
ध्रुव अकेला है जो कभी भटकता नहीं।

और उसी दीपक के नीचे, लद्दाख की ठंडी रात में,
आकाश गंगा प्रकाश से छलक पड़ती है—
तारों की वह नदी जो किसी बाल्टी में नहीं समाती,
और मैं एक सुनहरे ग्रह पर बैठा नन्हा-सा कण हूँ।
नमूना उत्तर— कहानी (संक्षेप में)
यांग्डोल को नींद नहीं आ रही थी। उसने अपना गोंचा लपेटा, छत पर चढ़ी और ठंडे पत्थर पर लेट गई। दोरजे भी दादा जी का पुराना पीतल का दिक्सूचक लेकर ऊपर आ गया।
"देख," उसने कहा, "करछी खिसक गई है।" नौ बजे सप्तर्षि पहाड़ी के ऊपर सीधा खड़ा था; अब आधी रात के बाद वह तिरछा लेटा हुआ था।
"वह नहीं खिसकी," यांग्डोल बोली। "हम खिसके हैं। पृथ्वी हमारे नीचे घूम गई।" उसने उँगली से दोनों संकेतक तारे जोड़े, पाँच गुनी दूरी गिनी और एक धुँधले, अकेले तारे पर रुक गई। दोरजे ने दिक्सूचक खोला। सुई और तारा दोनों एक ही बात कह रहे थे— उत्तर।
उनके ऊपर आकाश गंगा एक पहाड़ से दूसरे पहाड़ तक फैली थी। यांग्डोल ने सोचा— उस प्रकाश की पट्टी में कहीं कोई तारा होगा, उसका कोई ग्रह होगा, और शायद उस ग्रह पर भी कोई छत पर लेटा हमें ही देख रहा होगा। यही सोचते-सोचते वह सो गई।
अपनी रचना के लिए सुझाव: आरंभ किसी ऐसी बात से कीजिए जो आपने सचमुच देखी हो— नीम के पेड़ के पीछे से निकलता चंद्रमा, कोई टूटता तारा, बिजली जाने पर छत से दिखा आकाश। सच्चा प्रेक्षण गढ़ी हुई पंक्ति से सदा बेहतर आरंभ देता है।
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ