कुतूहल अध्याय 12 पाठ्य प्रश्न

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
क्या आपने रात्रि-आकाश में तारों को देखकर उन्हें उसी प्रकार काल्पनिक रेखाओं द्वारा जोड़ने की कोशिश की है जैसे हम बिंदुओं और रेखाओं को जोड़कर चित्र बनाते हैं?
उत्तर

हाँ— और संसार भर में तारा-मंडल इसी प्रकार बने हैं। किसी साफ, अँधेरी रात में तारे काले कागज़ पर बिखरे चमकीले बिंदुओं जैसे दिखाई देते हैं। यदि कुछ चमकीले बिंदुओं को काल्पनिक रेखाओं से जोड़ दिया जाए तो एक आकृति उभर आती है।

  • उत्तरी आकाश के सात चमकीले तारे मिलकर एक बड़ी करछी जैसी आकृति बनाते हैं। भारत में इसे सप्तर्षि कहते हैं; अंग्रेज़ी में बिग डिपर
  • शीत ऋतु के आकाश में एक छोटी सरल रेखा में समान दूरी पर स्थित तीन तारे शिकारी ओरायन की पेटी बनाते हैं।
  • तारों का एक छोटा-सा धुँधला समूह अंगूर के गुच्छे जैसा दिखता है— यही कृत्तिका (प्लायोडिज) है।
हमारा मन ऐसा क्यों करता है: मनुष्य का मस्तिष्क पैटर्न पहचानने में बहुत कुशल है। बिखरे हुए बिंदुओं में भी वह कोई जानी-पहचानी आकृति ढूँढ़ ही लेता है। ये रेखाएँ आकाश में वास्तव में हैं ही नहीं, और एक पैटर्न के तारे हमसे बिल्कुल अलग-अलग दूरियों पर हो सकते हैं— वे केवल एक ही दिशा में होने के कारण पास-पास दिखाई देते हैं।
यह कीजिए: अगली अमावस्या के आस-पास किसी बड़े के साथ छत पर जाइए, उत्तर दिशा में देखिए और सप्तर्षि की करछी जैसी आकृति ढूँढ़िए। उसे पेंसिल से अपनी कॉपी में उतार लीजिए— यही आपका पहला तारा-मानचित्र होगा।
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