कुतूहल अध्याय 5 पाठ्य प्रश्न

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
पैमाने को रखने की सही विधि क्या है?
उत्तर

पैमाने को वस्तु के संपर्क में, उसकी लंबाई के अनुदिश (साथ-साथ) रखिए — पैमाने का अंकित किनारा वस्तु से सटा हो और शून्यांक ठीक वस्तु के एक सिरे पर हो (चित्र 5.4क)।

0 5 10 15 (क) सही पैमाना वस्तु से सटा है, शून्यांक एक सिरे पर है 0 5 10 15 (ख) गलत वस्तु पैमाने से ऊपर एवं तिरछी है — अतः पाठ्यांक गलत आएगा
पैमाना रखने की विधि (चित्र 5.4 के अनुसार)। (क) में वस्तु पैमाने पर, उसकी लंबाई के अनुदिश, 0 से आरंभ होकर रखी है। (ख) में वह ऊपर एवं तिरछी है, अतः पाठ्यांक अधिक आता है।

तीन नियम:

  1. संपर्क — वस्तु पैमाने से वास्तव में सटी होनी चाहिए। बीच में अंतराल होने पर अंकन तिरछा दिखाई देता है।
  2. लंबाई के अनुदिश — पैमाना वस्तु की दिशा में ही रखा जाए, तिरछा नहीं। तिरछा पैमाना सदैव अधिक लंबाई देता है।
  3. शून्यांक एक सिरे पर — 0 का अंकन वस्तु के एक सिरे से मिलाइए और दूसरे सिरे का पाठ्यांक पढ़िए।
तिरछा रखने पर माप अधिक क्यों आता है: दो सिरों को जोड़ने वाली तिरछी रेखा सीधी रेखा से लंबी होती है, ठीक वैसे ही जैसे खेत को तिरछे पार करना सीधे पार करने से लंबा पड़ता है। अतः हर डिग्री का झुकाव पाठ्यांक में कुछ न कुछ जोड़ देता है।
संकेत: अनेक प्लास्टिक पैमानों में 0 अंकन से पहले पतली सफेद पट्टी होती है। सदैव 0 के अंकन से मापिए, प्लास्टिक के किनारे से नहीं।
प्र2.
पैमाने को पढ़ते समय आँख की सही स्थिति क्या है?
उत्तर

आँख को पढ़े जाने वाले अंकन के ठीक ऊपर होना चाहिए — चित्र 5.5 में स्थिति ‘ख’। तिरछी स्थितियों ‘क’ एवं ‘ग’ से वही पेंसिल की नोंक किसी दूसरे अंकन के सामने दिखाई देती है और पाठ्यांक गलत आ जाता है।

0 5 10 15 cm ‘क’ से लगभग 11.7 cm — अधिक ‘ख’ से 11.0 cm — सही ‘ग’ से लगभग 10.3 cm — कम
आँख की सही स्थिति ‘ख’ है। ‘क’ से नोंक सही अंकन के दाईं ओर तथा ‘ग’ से बाईं ओर दिखाई देती है।

‘क’ एवं ‘ग’ में गड़बड़ी क्यों: पेंसिल अंकनों के तल से थोड़ा ऊपर होती है। तिरछे देखने पर दृष्टि-रेखा नोंक से आगे बढ़कर पैमाने के किसी दूसरे अंकन पर पहुँचती है। इस त्रुटि को लंबन (पैरेलैक्स) त्रुटि कहते हैं।

आँख ‘क’ पर (बाईं ओर) → दृष्टि-रेखा दाईं ओर बढ़ती है → पाठ्यांक अधिक
आँख ‘ख’ पर (ठीक ऊपर) → दृष्टि-रेखा ऊर्ध्वाधर → पाठ्यांक सही
आँख ‘ग’ पर (दाईं ओर) → दृष्टि-रेखा बाईं ओर बढ़ती है → पाठ्यांक कम
केवल ‘ख’ ही सही क्यों: केवल ऊर्ध्वाधर दृष्टि-रेखा ही नोंक को उसके ठीक नीचे वाले अंकन से जोड़ती है। अन्य कोई रेखा नोंक से होकर कहीं और पहुँच जाती है, और जितना अधिक झुकेंगे त्रुटि उतनी बढ़ेगी।
स्वयं जाँचिए: पेंसिल को पैमाने पर रखकर सिर ठीक ऊपर रखकर पाठ्यांक पढ़िए। अब पेंसिल हिलाए बिना सिर को 20 cm बाईं ओर ले जाकर फिर पढ़िए। कुछ छुआ नहीं, फिर भी पाठ्यांक बदल गया — यही लंबन त्रुटि है।
प्र3.
यदि पैमाने के सिरे टूटे हों तो लंबाई का मापन कैसे करें?
उत्तर

टूटे पैमाने का उपयोग भी किया जा सकता है। शून्य कहाँ था, इसका अनुमान मत लगाइए। इसके स्थान पर वस्तु का एक सिरा किसी स्पष्ट पूर्णांक — जैसे 1.0 cm — पर रखिए, दूसरे सिरे का पाठ्यांक पढ़िए और घटा दीजिए।

लंबाई = 9.4 cm 1234 5678 9101112 131415 cm शून्यांक टूटा हुआ पाठ्यांक 1.0 cm पाठ्यांक 10.4 cm
टूटे किनारे वाले पैमाने को रखने की सही विधि (चित्र 5.6 के अनुसार)। वस्तु का एक सिरा 1.0 cm पर तथा दूसरा 10.4 cm पर है।
दूसरे सिरे का पाठ्यांक = 10.4 cm
पहले सिरे का पाठ्यांक = 1.0 cm
वस्तु की लंबाई = 10.4 cm − 1.0 cm = 9.4 cm
मिलीमीटर में: 9.4 cm × 10 mm/cm = 94 mm
घटाने से उत्तर क्यों मिलता है: पैमाने पर लिखी संख्याएँ शून्यांक से नापी गई दूरियाँ हैं। अतः 10.4 cm और 1.0 cm दोनों एक ही आरंभ-बिंदु से दूरियाँ हैं, और उनके बीच का अंतराल केवल उनका अंतर है। टूटा हुआ भाग गणना में आता ही नहीं।
संकेत: सदैव किसी पूर्ण सेंटीमीटर अंकन जैसे 1.0 cm या 2.0 cm से आरंभ कीजिए, 1.3 cm से नहीं। पूर्ण संख्या घटाना तेज़ होता है और उसमें भूल की संभावना बहुत कम रहती है।
प्र4.
दृष्टिबाधित विद्यार्थी लंबाई का मापन कैसे करते हैं?
उत्तर

वे उभरे अंकन बिंदु वाले पैमाने का उपयोग करते हैं, जिन्हें स्पर्श से महसूस किया जा सकता है — अर्थात् अंकन देखने के बजाय अँगुलियों से पहचाने जाते हैं।

  • स्पर्शीय (उभरे) पैमाने — सेंटीमीटर एवं मिलीमीटर की रेखाएँ सतह से ऊपर उठी होती हैं, और उनके पास संख्याएँ ब्रेल में अंकित होती हैं।
  • खाँचेदार धातु पैमाने — प्रत्येक सेंटीमीटर पर छोटा खाँचा या उभार होता है, और हर पाँचवें या दसवें अंकन पर गहरा खाँचा, जिससे अँगुलियाँ शीघ्र गिनती कर सकें।
  • क्लिक करने वाले मापन-फीते — फीता खींचते समय प्रत्येक सेंटीमीटर पर हल्की-सी ‘क्लिक’ सुनाई देती है।
  • बोलने वाले उपकरण — आधुनिक डिजिटल फीते एवं लेज़र दूरी-मापी पाठ्यांक बोलकर बताते हैं।

मात्रक नहीं बदलता। स्पर्शीय पैमाना भी उन्हीं सेंटीमीटर एवं मिलीमीटर में मापता है; केवल पाठ्यांक व्यक्ति तक पहुँचने का ढंग बदलता है — दृष्टि के स्थान पर स्पर्श या ध्वनि।

मूल विचार: किसी भी मापक यंत्र के दो कार्य हैं — नियत अंकन रखना, और वे अंकन उपयोगकर्ता तक पहुँचाना। ब्रेल तथा उभरे अंकन केवल दूसरे कार्य को बदलते हैं, अतः माप की परिशुद्धता ज्यों की त्यों बनी रहती है।
क्या आप जानते हैं? ब्रेल स्वयं उभरे बिंदुओं की प्रणाली है, जिसे लुई ब्रेल ने केवल पंद्रह वर्ष की आयु में विकसित किया था। भारत में विद्यालयों के लिए ब्रेल पैमाने, चाँदा (प्रोट्रैक्टर) एवं ज्यामिति बॉक्स बनाए जाते हैं।
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