कुतूहल अध्याय 8 क्रियाकलाप 8.9

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
अवलोकन कर चर्चा करें कि किस प्रकार से गमलों के अंदर शीतलन प्रभाव उत्पन्न होता है।
उत्तर

गमलों का कूलर बड़े पैमाने पर काम करता हुआ मटका ही है। याद कीजिए कि यह कैसे बनता है: एक बड़ा मिट्टी का गमला, उसकी तली में रेत की एक परत, बीच में रखा छोटा गमला, बीच के रिक्त स्थान में और रेत, रेत में डाला गया जल, और ऊपर ढक्कन या जूट की गीली बोरी

शीतलन कैसे होता है — चरणबद्ध रूप से:

  1. गीली रेत बाहरी गमले को सदा नम रखती है।
  2. जल बाहरी गमले के छिद्रों से रिसकर उसकी बाहरी सतह तक पहुँचता है।
  3. वहाँ वह आस-पास की वायु में वाष्पित हो जाता है।
  4. वाष्पीकरण को ऊष्मा चाहिए, और वह ऊष्मा बाहरी गमले, रेत, भीतरी गमले तथा भीतर रखी वस्तुओं से ली जाती है।
  5. अत: छोटे गमले का भीतरी भाग कमरे से कई डिग्री ठंडा हो जाता है, और ऊपर रखी जूट की गीली बोरी मुँह के लिए यही काम करती है।
  6. नियमित रूप से जल डालते रहने से रेत नम रहती है और यह प्रक्रम कभी रुकता नहीं। इसमें कहीं भी विद्युत का उपयोग नहीं होता।
गीली रेत → जल बाहरी सतह तक रिसता है → वाष्पित होता है → भीतर से ऊष्मा लेता है → साग-भाजी और फल ठंडे व ताजे रहते हैं
रेत क्यों डाली जाती है: रेत एक भंडार का काम करती है। वह बहुत सारा जल रोककर बाहरी गमले को लगातार देती रहती है, जिससे वाष्पीकरण कुछ मिनटों में रुकने के बजाय घंटों चलता है। साथ ही वह दोनों गमलों को अलग रखती है, जिससे ठंडा भीतरी गमला सीधे गरम वायु के संपर्क में नहीं आता।
क्या आप जानते हैं? इस रचना को विश्व भर में जीर पॉट (zeer pot) कहा जाता है। बिना बिजली वाले गाँव में यह टमाटर और पत्तेदार साग-भाजी को कई दिन ताजा रख सकता है, और गरम, दूरस्थ क्षेत्रों में दवाइयाँ रखने के लिए भी इसका उपयोग हुआ है।
प्र2.
कूलर में कुछ सब्जियाँ एवं फल रखकर एक सप्ताह तक प्रतिदिन अवलोकन कीजिए। इसमें साग और फलों को कितने दिनों तक ताजा रखा जा सकता है? वह कौन-सी स्थितियाँ होंगी जो इन दिनों की संख्या को प्रभावित कर सकती हैं?
उत्तर

आप लगभग क्या पाएँगे: सामान्य भारतीय ग्रीष्म में अच्छी तरह बनाया गया पॉट-इन-पॉट कूलर अधिकांश साग-भाजी को खुली रसोई की अलमारी से कहीं अधिक समय तक ताजा रखता है।

रखी गई वस्तुखुली अलमारी मेंपॉट-इन-पॉट कूलर में
टमाटर, बैंगन, शिमला मिर्च2–3 दिनलगभग 8–12 दिन
पालक, धनिया और अन्य पत्तेदार सागएक दिन से भी कमलगभग 3–5 दिन
गाजर, फलियाँ, भिंडी2–4 दिनलगभग 7–10 दिन
अमरूद, केला, अंगूर2–3 दिनलगभग 5–8 दिन

दिनों की संख्या को प्रभावित करने वाली स्थितियाँ:

  • वायु कितनी शुष्क है। गरम, शुष्क वायु में वाष्पीकरण तीव्र होता है और शीतलन सर्वोत्तम। आर्द्र मानसून में कूलर बहुत कम काम करता है।
  • वायु की गति। छायादार, हवादार स्थान पर रखा कूलर बंद कोने की तुलना में कहीं अधिक ठंडा रहता है।
  • धूप। सीधी धूप गमले को उतनी तेजी से गरम कर देती है जितनी तेजी से वाष्पीकरण उसे ठंडा नहीं कर पाता — कूलर सदा छाया में रखिए।
  • आप कितनी नियमितता से जल डालते हैं। रेत सूखते ही शीतलन तुरंत रुक जाता है।
  • गमलों की गुणवत्ता। बिना पॉलिश की, अच्छी तरह पकी मिट्टी सरंध्र होती है और अच्छा काम करती है; पॉलिश किया या रँगा गमला बंद छिद्रों के कारण लगभग कुछ नहीं करता।
  • ढकने की विधि। सूखे ढक्कन से गीली जूट की बोरी बेहतर है, क्योंकि उससे भी वाष्पीकरण होता है।
  • क्या और कितना रखा है। केवल ताजी, सूखी और बिना कटी-फटी उपज ही रखनी चाहिए, और गमला इतना ठसाठस न भरा जाए कि वायु न चल सके।
सुझाव: वैसी ही साग-भाजी का एक समूह कूलर के बाहर नियंत्रण के रूप में रखिए और प्रतिदिन तुलना कीजिए। तुलना के बिना यह दावा नहीं किया जा सकता कि कूलर से कोई अंतर पड़ा।
प्र3.
बेहतर शीतलन के लिए हम रेत के स्थान पर और क्या उपयोग कर सकते हैं?
उत्तर

बीच में भरी सामग्री का केवल एक काम है — अधिक से अधिक जल रोककर बाहरी गमले को गीला रखना। अत: जो भी वस्तु जल अच्छी तरह सोखे और गमले से सटी रहे, वह चलेगी, और कुछ सामग्री रेत से बेहतर काम करती हैं।

सामग्रीकितनी अच्छी
खस (वेटिवर) की जड़ेंउत्कृष्ट — बहुत जल रोकती हैं, वायु आर-पार जाने देती हैं और सुगंध भी देती हैं। परंपरागत कूलरों में यही प्रयुक्त होती हैं
गीला जूट या टाट, परतों में भराबहुत अच्छा — समान भार की रेत से कहीं अधिक जल सोखता है
कॉयर (नारियल की जटा) या कोको-पीटबहुत अच्छा — अपने भार से कई गुना जल रोक लेता है
बुरादा या सूखी पुआलअच्छा, और गाँवों में सहज उपलब्ध
कोयले के टुकड़ेअच्छा — सरंध्र होते हैं, जल रोकते हैं और गंध भी दूर रखते हैं
रेत (सामान्य विकल्प)काम करती है, सस्ती और सुलभ है, पर ऊपर की सामग्री से कम जल रोकती है
चिकनी मिट्टी या रुईखराब — चिकनी मिट्टी ठोस जम जाती है और वायु रोक देती है; रुई गीली पड़ी रहकर सड़ जाती है
अच्छी सामग्री की दो कसौटियाँ: उसे पर्याप्त जल रोकना चाहिए (ताकि आपूर्ति देर तक चले) और वह इतनी ढीली होनी चाहिए कि उसमें से वायु निकल सके (ताकि जल वास्तव में वाष्पित हो सके)। रेत पहली कसौटी पर केवल औसत है, इसीलिए खस की जड़ें और कॉयर उससे बेहतर काम करते हैं।
प्रयास करें: दो छोटे कूलर बनाइए — एक रेत का, एक गीले जूट का — और 5 घंटे बाद प्रयोगशाला तापमापी से दोनों के भीतर का ताप मापिए। दोनों पाठ्यांक °C में लिखिए — इससे आपका मॉडल एक वास्तविक प्रयोग बन जाएगा।
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