प्र1.
अवलोकन कर चर्चा करें कि किस प्रकार से गमलों के अंदर शीतलन प्रभाव उत्पन्न होता है।
उत्तर
गमलों का कूलर बड़े पैमाने पर काम करता हुआ मटका ही है। याद कीजिए कि यह कैसे बनता है: एक बड़ा मिट्टी का गमला, उसकी तली में रेत की एक परत, बीच में रखा छोटा गमला, बीच के रिक्त स्थान में और रेत, रेत में डाला गया जल, और ऊपर ढक्कन या जूट की गीली बोरी।
शीतलन कैसे होता है — चरणबद्ध रूप से:
- गीली रेत बाहरी गमले को सदा नम रखती है।
- जल बाहरी गमले के छिद्रों से रिसकर उसकी बाहरी सतह तक पहुँचता है।
- वहाँ वह आस-पास की वायु में वाष्पित हो जाता है।
- वाष्पीकरण को ऊष्मा चाहिए, और वह ऊष्मा बाहरी गमले, रेत, भीतरी गमले तथा भीतर रखी वस्तुओं से ली जाती है।
- अत: छोटे गमले का भीतरी भाग कमरे से कई डिग्री ठंडा हो जाता है, और ऊपर रखी जूट की गीली बोरी मुँह के लिए यही काम करती है।
- नियमित रूप से जल डालते रहने से रेत नम रहती है और यह प्रक्रम कभी रुकता नहीं। इसमें कहीं भी विद्युत का उपयोग नहीं होता।
गीली रेत → जल बाहरी सतह तक रिसता है → वाष्पित होता है → भीतर से ऊष्मा लेता है → साग-भाजी और फल ठंडे व ताजे रहते हैं
रेत क्यों डाली जाती है: रेत एक भंडार का काम करती है। वह बहुत सारा जल रोककर बाहरी गमले को लगातार देती रहती है, जिससे वाष्पीकरण कुछ मिनटों में रुकने के बजाय घंटों चलता है। साथ ही वह दोनों गमलों को अलग रखती है, जिससे ठंडा भीतरी गमला सीधे गरम वायु के संपर्क में नहीं आता।
क्या आप जानते हैं? इस रचना को विश्व भर में जीर पॉट (zeer pot) कहा जाता है। बिना बिजली वाले गाँव में यह टमाटर और पत्तेदार साग-भाजी को कई दिन ताजा रख सकता है, और गरम, दूरस्थ क्षेत्रों में दवाइयाँ रखने के लिए भी इसका उपयोग हुआ है।