प्र1.
आवी पूछती है कि “मिट्टी के मटके में जल इतना ठंडा क्यों है? मैंने जल को स्टेनलेस स्टील के बर्तन में कभी ठंडा होते नहीं पाया।” आपके विचार में इसका क्या कारण है?
उत्तर
इसका कारण है वाष्पीकरण और उससे उत्पन्न शीतलन प्रभाव।
- मिट्टी का मटका पकी हुई मिट्टी का बना होता है, जिसमें अत्यंत सूक्ष्म छिद्र होते हैं।
- जल इन छिद्रों से धीरे-धीरे रिसकर बाहरी सतह पर नमी की पतली परत के रूप में आ जाता है — इसीलिए मटका सदा थोड़ा गीला-सा लगता है।
- यह जल की परत वायु में वाष्पित हो जाती है।
- वाष्पित होने के लिए जल को ऊष्मा चाहिए, और वह ऊष्मा वह मटके से तथा भीतर के जल से लेता है।
- ऊष्मा खोकर भीतर का जल ठंडा हो जाता है — और यह क्रम दिन भर चलता रहता है।
स्टेनलेस स्टील का बर्तन ऐसा क्यों नहीं करता: स्टील में छिद्र नहीं होते। कोई जल बाहरी सतह तक पहुँच ही नहीं सकता, अत: वाष्पित होने के लिए कुछ नहीं होता और कोई ऊष्मा नहीं हटती। भीतर का जल कमरे के ताप पर ही बना रहता है।
जल छिद्रों से रिसकर बाहर आता है → वाष्पित होता है → मटके और भीतर के जल से ऊष्मा लेता है → जल ठंडा हो जाता है
मटका शुष्क गरमी में सबसे अच्छा काम क्यों करता है: वाष्पीकरण तब सबसे तेज होता है जब वायु गरम, शुष्क और गतिशील हो। राजस्थान या विदर्भ की ग्रीष्म ऋतु ठीक ऐसी ही होती है, इसीलिए वहाँ मटका जल को कमरे से कई डिग्री ठंडा रख पाता है। आर्द्र मानसून में वही मटका बहुत कम ठंडक देता है, क्योंकि वाष्पीकरण मंद पड़ जाता है।
सुझाव: मटके को छायादार, हवादार स्थान पर रखिए और उस पर गीला कपड़ा लपेटिए। दोनों से बाहरी वाष्पीकरण बढ़ता है और भीतर का जल और अधिक ठंडा होता है। मटके को प्लास्टिक में कभी मत लपेटिए — इससे वाष्पीकरण रुक जाता है और पूरा उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है।