कुतूहल अध्याय 8 पाठ्य प्रश्न

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
आवी पूछती है कि “मिट्टी के मटके में जल इतना ठंडा क्यों है? मैंने जल को स्टेनलेस स्टील के बर्तन में कभी ठंडा होते नहीं पाया।” आपके विचार में इसका क्या कारण है?
उत्तर

इसका कारण है वाष्पीकरण और उससे उत्पन्न शीतलन प्रभाव

  1. मिट्टी का मटका पकी हुई मिट्टी का बना होता है, जिसमें अत्यंत सूक्ष्म छिद्र होते हैं।
  2. जल इन छिद्रों से धीरे-धीरे रिसकर बाहरी सतह पर नमी की पतली परत के रूप में आ जाता है — इसीलिए मटका सदा थोड़ा गीला-सा लगता है।
  3. यह जल की परत वायु में वाष्पित हो जाती है।
  4. वाष्पित होने के लिए जल को ऊष्मा चाहिए, और वह ऊष्मा वह मटके से तथा भीतर के जल से लेता है।
  5. ऊष्मा खोकर भीतर का जल ठंडा हो जाता है — और यह क्रम दिन भर चलता रहता है।

स्टेनलेस स्टील का बर्तन ऐसा क्यों नहीं करता: स्टील में छिद्र नहीं होते। कोई जल बाहरी सतह तक पहुँच ही नहीं सकता, अत: वाष्पित होने के लिए कुछ नहीं होता और कोई ऊष्मा नहीं हटती। भीतर का जल कमरे के ताप पर ही बना रहता है।

जल छिद्रों से रिसकर बाहर आता है → वाष्पित होता है → मटके और भीतर के जल से ऊष्मा लेता है → जल ठंडा हो जाता है
मटका शुष्क गरमी में सबसे अच्छा काम क्यों करता है: वाष्पीकरण तब सबसे तेज होता है जब वायु गरम, शुष्क और गतिशील हो। राजस्थान या विदर्भ की ग्रीष्म ऋतु ठीक ऐसी ही होती है, इसीलिए वहाँ मटका जल को कमरे से कई डिग्री ठंडा रख पाता है। आर्द्र मानसून में वही मटका बहुत कम ठंडक देता है, क्योंकि वाष्पीकरण मंद पड़ जाता है।
सुझाव: मटके को छायादार, हवादार स्थान पर रखिए और उस पर गीला कपड़ा लपेटिए। दोनों से बाहरी वाष्पीकरण बढ़ता है और भीतर का जल और अधिक ठंडा होता है। मटके को प्लास्टिक में कभी मत लपेटिए — इससे वाष्पीकरण रुक जाता है और पूरा उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है।
प्र2.
शीतलन प्रभाव के अन्य उदाहरण क्या हैं?
उत्तर

जहाँ भी जल वाष्पित होता है, वहाँ ठंडक आती है। अध्याय स्वयं ग्रीष्मकाल में फर्श और छत पर जल छिड़कने का उदाहरण देता है। कुछ और:

उदाहरणक्या वाष्पित होता है और क्या ठंडा होता है
पसीना आनापसीना त्वचा से वाष्पित होकर शरीर से ऊष्मा ले जाता है — शरीर इसी से अपना ताप नियंत्रित करता है
पंखे के नीचे बैठनाबहती वायु पसीने को तेजी से वाष्पित कराती है, अत: पंखा ठंडक न देते हुए भी हमें ठंडा लगता है
मटका और सुराहीमिट्टी से रिसकर आया जल वाष्पित होकर भीतर के जल को ठंडा करता है
फर्श या छत पर जल का छिड़कावजल वाष्पित होकर फर्श और उसके ऊपर की वायु को ठंडा करता है
द्वार पर गीले खस या जूट के पर्देपर्दे का जल वाष्पित होते ही उससे होकर आती वायु ठंडी हो जाती है
डेजर्ट कूलरवायु गीली पट्टियों से खींची जाती है; जल वाष्पित होता है और वायु ठंडी होकर बाहर आती है
त्वचा पर सैनिटाइजर या स्पिरिटऐल्कोहल बहुत तेजी से वाष्पित होता है और हथेली ठंडी लगती है
ज्वर में माथे पर गीली पट्टीपट्टी से वाष्पित होता जल सिर से ऊष्मा ले जाता है
कुत्ते का हाँफना; भैंस का तालाब में बैठनाजीभ या गीली त्वचा से वाष्पित होता जल पशु को ठंडक देता है
इन सबके पीछे एक ही नियम: वाष्पीकरण एक शीतलन प्रक्रम है। कोई द्रव बिना ऊष्मा लिए वाष्प नहीं बन सकता, और वह ऊष्मा वह उसी से लेता है जिसके संपर्क में है — त्वचा, मिट्टी, फर्श या वायु।
प्र3.
जब आप अपने हाथों पर सैनिटाइजर लगाते हैं तब आपको कैसा महसूस होता है?
उत्तर

हथेली स्पष्ट रूप से ठंडी लगती है, और ठंडक तब सबसे अधिक होती है जब सैनिटाइजर गायब हो रहा होता है। हाथ पर फूँक मारने से वह और भी ठंडी लगती है।

कारण:

  • सैनिटाइजर मुख्यत: ऐल्कोहल होता है, जो सामान्य ताप पर बहुत तेजी से वाष्पित होता है।
  • मलने से वह पतली परत में फैल जाता है, अत: अनावृत्त क्षेत्र बड़ा होता है और वाष्पीकरण बहुत तीव्र होता है।
  • वाष्पित होता द्रव आवश्यक ऊष्मा आपकी त्वचा से लेता है, अत: त्वचा ऊष्मा खोकर ठंडी लगती है।
  • फूँक मारने से वायु की गति जुड़ जाती है, जिससे वाष्पीकरण और तेज हो जाता है — इसीलिए ठंडक और बढ़ जाती है।
आवी का निष्कर्ष: अब मैं समझ सकती हूँ कि पंखे के नीचे बैठने से हमें ठंडक क्यों अनुभव होती है। पंखे की हवा पसीने को वाष्पित करती है और हमें ठंडा अनुभव करने में मदद करती है। हथेली पर सैनिटाइजर और शरीर पर पसीना ठीक एक ही ढंग से काम करते हैं — पंखा ठंडी हवा नहीं फेंकता, वह केवल द्रव को वाष्पित होने में सहायता करता है।
प्रयास करें — यह "और भी सीखें" का पहला कार्य भी है: एक हाथ गीला कीजिए और दूसरा सूखा छोड़िए, फिर दोनों पर फूँक मारिए। केवल गीला हाथ ठंडा लगता है, जिससे सिद्ध होता है कि ठंडक वाष्पित होते जल से आती है, वायु के ठंडे होने से नहीं।
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