प्र1.
वाष्पित जल को पृथ्वी की सतह पर पुन: लाने के प्रक्रम में संघनन एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह कैसे होता है?
उत्तर
यह पाँच चरणों में होता है — और यह सब आकाश के पैमाने पर वाष्पीकरण के बाद संघनन ही है।
- जल ऊपर जाता है। महासागरों, नदियों, झीलों, गीली मिट्टी, पौधों और गीले कपड़ों से जल वाष्पित होकर अदृश्य जलवाष्प के रूप में वायु के साथ ऊपर उठता है।
- ऊपर उठती वायु ठंडी होती जाती है। पुस्तक कहती है — जैसे-जैसे वायु धरती की सतह से ऊपर उठती है तो यह ठंडी होती जाती है।
- संघनन। एक निश्चित ऊँचाई पर वायु इतनी ठंडी हो जाती है कि उसमें उपस्थित वाष्प छोटी-छोटी जलकणिकाओं में बदल जाती है। ये कणिकाएँ आमतौर पर धूल के कणों के आस-पास बनती हैं।
- बादल। ये छोटी जलकणिकाएँ इतनी हल्की होती हैं कि वायु में तैरती रहती हैं, और असंख्य कणिकाएँ मिलकर बादल के रूप में दिखाई देती हैं।
- वर्षा। बहुत-सी कणिकाएँ मिलकर बड़ी बूँदें बनाती हैं। कुछ बूँदें इतनी भारी हो जाती हैं कि वायु उन्हें रोक नहीं पाती और वे गिरने लगती हैं — इन गिरती बूँदों को ही हम वर्षा कहते हैं। विशेष परिस्थितियों में ये ओले या हिम के रूप में भी गिरती हैं।
वाष्पीकरण → ऊपर उठती, ठंडी होती वायु → धूल के कणों पर संघनन → तैरती कणिकाएँ = बादल → कणिकाएँ मिलती हैं → भारी होकर वर्षा, ओले या हिम
धूल के कण क्यों आवश्यक हैं: बिल्कुल स्वच्छ वायु में वाष्प के लिए बूँद बनाना कठिन होता है। धूल, नमक या धुएँ का एक कण उसे जमने के लिए सतह दे देता है। क्रियाकलाप 8.10 इसे सुंदर ढंग से सिद्ध करता है — बोतल तब तक साफ रहती है जब तक जले हुए समाचार-पत्र का धुआँ न डाला जाए, और तभी धुँधलापन दिखता है।
क्या आप जानते हैं? जलवाष्प युक्त वायु वायुमंडल में ऊपर क्यों जाती है? हल्की गैसों से भरे गुब्बारे वायु में ऊपर जाते हैं। इसी प्रकार, जलवाष्प वायु से हल्की होती है जिसके कारण यह ऊपर उठती है। गरम, आर्द्र वायु अपने आस-पास की ठंडी शुष्क वायु से हल्की होती है, अत: वह ऊपर तैर जाती है — और वायुमंडल पृथ्वी के आस-पास हवा की पतली परत है।