प्र1.
आवी वर्षा का आनंद लेती है और एक कविता रचती है। आप भी इस कविता को पूरा कर अपनी कक्षा में प्रस्तुत कर सकते हैं। (जल की बूँदें असमान में फिरें … अब सोचो, समझो और करो विचार / किस पथ पर चले जल इस बार)
उत्तर
दोनों रिक्त पंक्तियों में वही लय और तुक रहनी चाहिए, और उनमें जल की यात्रा का एक और चरण जुड़ना चाहिए। नीचे पूरी की हुई कविता दी गई है, जिसे आप अपने ढंग से बदल सकते हैं।
जल की बूँदें असमान में फिरें
सोचें धरती से कैसे मिलें?
वाष्प बन वायु में घूमें
बादल बन आसमान में झूमें
पर बने बर्फ या बारिश की धार
जल कैसे निर्णय ले इस बार
कहीं गिरे तो हिम कहलाए
कहीं वर्षा की धार बन जाए
कहीं नदी बन खेत सिंचाए
कहीं सागर में जा समाए
अब सोचो, समझो और करो विचार
किस पथ पर चले जल इस बार
सोचें धरती से कैसे मिलें?
वाष्प बन वायु में घूमें
बादल बन आसमान में झूमें
पर बने बर्फ या बारिश की धार
जल कैसे निर्णय ले इस बार
कहीं गिरे तो हिम कहलाए
कहीं वर्षा की धार बन जाए
कहीं नदी बन खेत सिंचाए
कहीं सागर में जा समाए
अब सोचो, समझो और करो विचार
किस पथ पर चले जल इस बार
इनके स्थान पर ये पंक्तियाँ भी उतनी ही अच्छी रहेंगी:
- "कहीं ओस बन पत्ती पर छाए / कहीं भू-जल बन गहरे समाए"
- "कहीं मटके को शीतल कर जाए / कहीं गमले के पौधे हरियाए"
- "कहीं कुएँ में चुपके उतर जाए / कहीं बादल बन फिर लौट आए"
अच्छी पूर्ति की पहचान: यह कविता जल चक्र के विषय में प्रश्नों और संभावनाओं की शृंखला है, तथ्यों की सूची नहीं। हर जोड़ी पंक्ति जल की यात्रा का एक पड़ाव बताती है — हिम, वर्षा, वाष्पीकरण, संघनन, नदी का सागर में मिलना — और तुक के साथ समाप्त होती है। जिज्ञासा का स्वर बनाए रखिए, क्योंकि पूरा अध्याय उत्तर खोजने से पहले प्रश्न पूछने पर ही आधारित है।
प्रस्तुति के लिए सुझाव: चार मित्रों के साथ मिलकर पढ़िए, हर एक जल चक्र का एक चरण ले और अपनी पंक्ति के समय उस चरण का सरल चित्र — सागर, बादल, वर्षा, नदी — ऊपर उठाकर दिखाए। तब कक्षा जल चक्र सुनेगी भी और देखेगी भी।