यह विचार-प्रधान प्रश्न है, अत: अपने विचार कारणों सहित लिखिए। नीचे पूरा नमूना उत्तर दिया गया है, जिसे आप अपने ढंग से बदल सकते हैं।
नमूना उत्तर: मैं इस कथन से सहमत हूँ। हर व्यक्ति को स्वच्छ पेयजल का अधिकार है — पर वह अधिकार तभी पूरा हो सकता है जब किसी ने पहले जल को स्वच्छ और उपलब्ध रखने की जिम्मेदारी उठाई हो। यदि सब अधिकार माँगें और कोई कर्तव्य न निभाए तो कुआँ सूख जाएगा और नदी काली पड़ जाएगी, और तब माँगने के लिए कोई अधिकार बचेगा ही नहीं। अत: जिम्मेदारी पहले आनी चाहिए, और वह हम सबकी है, केवल सरकार की नहीं।
इसके पीछे का तर्क, बिंदुवार:
- अध्याय स्वयं कहता है कि पृथ्वी पर उपलब्ध जल का केवल एक छोटा-सा भाग ही पौधों, जानवरों और मनुष्यों के उपयोग योग्य है। अधिकांश जल महासागरों में है और सीधे प्रयोग नहीं हो सकता।
- जनसंख्या के साथ माँग बढ़ती जा रही है, और विश्व के कई भागों में पहले ही जल की कमी है।
- जल कहीं बनाया नहीं जाता। जल चक्र उसी जल को घुमाता भर है। अत: हम केवल इतना ही नियंत्रित कर सकते हैं कि उसका उपयोग कैसे करें और उसे कितना स्वच्छ रखें।
- एक व्यक्ति जो व्यर्थ करता या प्रदूषित करता है, वह नीचे की ओर बसे किसी दूसरे से छिन जाता है — अत: एक का अधिकार सीधे दूसरे की जिम्मेदारी पर टिका है।
व्यवहार में जिम्मेदारी उठाना कैसा दिखता है:
- दाँत साफ करते या हाथ धोते समय नल बंद रखिए; टपकता नल ठीक कराइए — एक सेकंड में एक बूँद भी दिन भर में कई लीटर बहा देती है।
- शॉवर के स्थान पर बाल्टी का उपयोग कीजिए, और सब्जी धोने का जल पौधों में डालिए।
- तालाबों, नदियों और नालियों में प्लास्टिक, तेल, रंग या कचरा मत डालिए; जलाशयों को प्रदूषण से मुक्त रखिए।
- घर और विद्यालय में वर्षा जल संचयन का समर्थन कीजिए और कुओं व तालाबों को भरने में सहायता कीजिए।
- पौधों को सुबह या शाम की ठंडक में सींचिए, जब वाष्पीकरण से कम जल उड़ता है।
कथन की भाषा इतनी अच्छी क्यों है: "जिम्मेदारी" को "अधिकार" से पहले रखकर यह हमारी सामान्य सोच को उलट देता है। यह याद दिलाता है कि सबकी साझी संपदा तभी बचती है जब हर व्यक्ति उसकी रक्षा करे — और भारत की बावड़ियाँ, जोहड़ और गाँव के तालाब सदियों पहले इसी समझ पर बनाए गए थे।