कुतूहल अध्याय 8 आइए, और अधिक सीखें

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
निम्नलिखित में से कौन संघनन का उत्तम वर्णन करता है? (क) जल का वाष्प के रूप में परिवर्तन। (ख) जल का द्रव से गैसीय अवस्था में परिवर्तन का प्रक्रम। (ग) जल की छोटी बूँदों से बादलों का बनना। (घ) जलवाष्प का उसकी द्रव अवस्था में परिवर्तन।
उत्तर

उत्तर: (घ) जलवाष्प का उसकी द्रव अवस्था में परिवर्तन।

यही अध्याय की अपनी परिभाषा है — जलवाष्प के द्रव अवस्था में परिवर्तन की प्रक्रिया संघनन कहलाती है।

विकल्पयह सही क्यों है या गलत क्यों है
(क) जल का वाष्प के रूप में परिवर्तनगलत — यह वाष्पीकरण है, उलटा प्रक्रम
(ख) जल का द्रव से गैसीय अवस्था में परिवर्तनगलत — यह भी वाष्पीकरण ही है, केवल दूसरे शब्दों में
(ग) जल की छोटी बूँदों से बादलों का बननागलत — यह संघनन का परिणाम है, संघनन नहीं। संघनन ही पहले वे बूँदें बनाता है; बादल तो उन बूँदों का दिखने वाला रूप है
(घ) जलवाष्प का उसकी द्रव अवस्था में परिवर्तनसही — गैस → द्रव, जो तब होता है जब वाष्प किसी ठंडी सतह से मिलती है
विकल्प काटने का सूत्र: परिवर्तन की दिशा पढ़िए। संघनन में परिवर्तन गैस → द्रव होना चाहिए। विकल्प (क) और (ख) दोनों द्रव → गैस की ओर हैं, अत: तुरंत कट जाते हैं। (ग) और (घ) में से वह चुनिए जो प्रक्रम बताता है, उसका परिणाम नहीं।
प्र2.
नीचे की दी गयी प्रक्रियाओं में से किस प्रक्रिया में वाष्पीकरण अति महत्वपूर्ण है— (क) रंग भरना: (i) क्रेयॉन से (ii) पानी के रंगों से (iii) ऐक्रेलिक रंगों से (iv) पेंसिल रंगों से; (ख) कागज पर लिखना: (i) पेंसिल से (ii) स्याही वाले पेन से (iii) बॉल पॉइंट पेन से
उत्तर

(क) रंग भरना — उत्तर है (ii) पानी के रंगों से।

रंग भरने का माध्यमक्या वाष्पीकरण सम्मिलित है?
(i) क्रेयॉन सेनहीं — क्रेयॉन ठोस मोम है जिसे कागज पर रगड़ा जाता है। कुछ सूखना ही नहीं है
(ii) पानी के रंगों सेहाँ, अति महत्वपूर्ण — रंगद्रव्य जल में मिला होता है। चित्र तभी पूरा होता है जब जल वाष्पित होकर रंग को कागज पर छोड़ जाता है
(iii) ऐक्रेलिक रंगों सेजल का वाष्पीकरण होता तो है, पर रंग ऐक्रेलिक के जमने से भी बैठता है। पानी के रंग अधिक स्पष्ट उत्तर हैं
(iv) पेंसिल रंगों सेनहीं — ठोस रंगीन सीसा, कुछ भी गीला नहीं

(ख) कागज पर लिखना — उत्तर है (ii) स्याही वाले पेन से।

लिखने का साधनक्या वाष्पीकरण सम्मिलित है?
(i) पेंसिल सेनहीं — ठोस ग्रैफाइट तुरंत निशान छोड़ देता है, सूखने को कुछ नहीं
(ii) स्याही वाले पेन सेहाँ, अति महत्वपूर्ण — फाउंटेन पेन की स्याही पतला, जल-आधारित द्रव है। जब तक स्याही का जल वाष्पित न हो जाए, लिखावट फैलती रहती है — इसीलिए पहले सोख्ता कागज रखा जाता था
(iii) बॉल पॉइंट पेन सेबहुत कम — बॉल पेन की स्याही गाढ़ी, तैलीय लुगदी होती है जो लगभग तुरंत सूख जाती है और वाष्पीकरण पर बहुत कम निर्भर है
लगाने का नियम: पूछिए कि पदार्थ कागज पर ऐसे द्रव के रूप में रखा जा रहा है जिसे सूखना है या नहीं। यदि हाँ, तो वाष्पीकरण अनिवार्य है; यदि पदार्थ पहले से ठोस है, तो वाष्पीकरण की कोई भूमिका नहीं।
स्वयं जाँचें: एक पंक्ति फाउंटेन पेन से और एक बॉल पेन से लिखिए, और पाँच सेकंड बाद दोनों को छूकर देखिए। फाउंटेन पेन वाली पंक्ति फैल जाती है; बॉल पेन वाली नहीं।
प्र3.
आजकल हमें अनेक स्थानों पर हरे रंग की प्लास्टिक की घास दिखाई देती है। प्राकृतिक घास के आस-पास का स्थान प्लास्टिक की घास के आस-पास के स्थान की तुलना में अधिक ठंडा लगता है। क्या आप पता लगा सकते हैं कि ऐसा क्यों है?
उत्तर

क्योंकि प्राकृतिक घास जल से भरी होती है और वाष्पीकरण द्वारा निरंतर जल खोती रहती है, जबकि प्लास्टिक की घास में जल होता ही नहीं

प्राकृतिक घासप्लास्टिक की घास
जल की उपस्थितिहाँ — पत्तियों में, नीचे की मिट्टी में और उस पर पड़ी ओस मेंबिल्कुल नहीं; नीचे प्राय: बंद चटाई होती है
वाष्पीकरणनिरंतर — पत्तियों और नम मिट्टी से जल निकलता रहता हैकुछ नहीं
ऊष्मा पर प्रभाववाष्पीकरण पत्तियों और वायु से ऊष्मा ले लेता है, दोनों ठंडे रहते हैंअवशोषित सारी ऊष्मा वहीं रहकर वायु को दे दी जाती है
धूप में व्यवहारकाफी ठंडी रहती है; दोपहर में भी नंगे पाँव चला जा सकता हैबहुत गरम हो जाती है — प्लास्टिक धूप सोखकर शीघ्र तप जाता है
एक पंक्ति में विज्ञान: वाष्पीकरण एक शीतलन प्रक्रम है। घास से निकलने वाला हर ग्राम जल अपने साथ ऊष्मा ले जाता है, अत: प्राकृतिक लॉन एक विशाल, मौन, बिना बिजली के चलने वाले कूलर जैसा काम करता है। प्लास्टिक की घास के पास वाष्पित होने को कुछ नहीं, अत: वह केवल धूप सोखकर गरम होती है और अपने ऊपर की वायु को भी गरम कर देती है।
स्वयं जाँचें: धूप वाली दोपहर में प्रयोगशाला तापमापी को पहले असली लॉन के ठीक ऊपर और फिर प्लास्टिक की चटाई के ऊपर दो-दो मिनट रखिए। दोनों पाठ्यांक °C में लिखिए — अंतर प्राय: 10 °C से भी अधिक होता है।
प्र4.
जल के अतिरिक्त अन्य द्रव पदार्थों के उदाहरण दीजिए जो वाष्पित होते हैं।
उत्तर

अनेक द्रव वाष्पित होते हैं, और उनमें से कई जल से कहीं तेजी से।

द्रवकहाँ मिलता हैकितनी तेजी से वाष्पित होता है
स्पिरिट / ऐल्कोहलहैंड सैनिटाइजर, इंजेक्शन से पहले की रुईबहुत तेज — त्वचा तुरंत ठंडी लगती है
ऐसीटोननेल-पॉलिश रिमूवरबहुत तेज, तीव्र गंध के साथ
पेट्रोलपेट्रोल पंप परबहुत तेज — कई मीटर दूर से गंध आ जाती है
मिट्टी का तेल और डीजललालटेन, स्टोव, वाहनतेज
इत्र, डियोडरेंट, अत्तरत्वचा पर लगाया जाने वालातेज — इसीलिए हमें उसकी गंध मिलती है
तारपीन और थिनरतैल रंगों के साथतेज
दूध, छाछ, चायरसोई मेंधीमा — इनका केवल जल वाष्पित होता है, ठोस पीछे रह जाते हैं
सिरका, नींबू का रसखाना पकाने मेंधीमा
नारियल का तेल, सरसों का तेलहर घर मेंबहुत धीमा, पर महीनों में वे भी वाष्पित होते हैं
भिन्न द्रवों की वाष्पन दर भिन्न क्यों है: कुछ द्रवों के कण जल की तुलना में कहीं कम मजबूती से बँधे होते हैं, अत: उसी ताप पर वे अधिक सरलता से निकल भागते हैं। ऐसे द्रवों को वाष्पशील कहते हैं — स्पिरिट, ऐसीटोन और पेट्रोल इसके दैनिक उदाहरण हैं। इसीलिए इनकी बोतलें सदा कसकर बंद और आग से दूर रखनी चाहिए।
प्र5.
पंखे हवा को इधर-उधर घुमाते हैं जिससे ठंडक महसूस होती है। गीले कपड़ों को सुखाने के लिए पंखों का उपयोग विचित्र लग सकता है क्योंकि पंखे की हवा वस्तुओं को ठंडा करती है, गरम नहीं। सामान्यत: जब जल वाष्पित होता है तो उसे ऊष्मा की आवश्यकता होती है, ठंडी वायु की नहीं। आपका इस विषय में क्या सोचना है?
उत्तर

यहाँ कोई विरोधाभास है ही नहीं। उलझन तब मिट जाती है जब हम समझ लें कि पंखा वाष्पीकरण के लिए ऊष्मा नहीं देता, और उसे देने की आवश्यकता भी नहीं

दोनों बातों को अलग-अलग देखिए:

  1. ऊष्मा कहाँ से आती है? पंखे से नहीं। वाष्पीकरण के लिए आवश्यक ऊष्मा गीले कपड़े और आस-पास की वायु से ली जाती है, जो पहले से ही कमरे के ताप पर हैं — मान लीजिए 30 °C या उससे अधिक। यह पर्याप्त से भी अधिक है; वाष्पीकरण को 100 °C पर उबलने की आवश्यकता नहीं होती।
  2. पंखा वास्तव में करता क्या है? जल वाष्पित होते ही कपड़े से सटी अत्यंत आर्द्र वायु की परत जम जाती है और आगे के वाष्पीकरण को रोक देती है। पंखा इस भरी हुई परत को निरंतर हटाकर ताजी, शुष्क वायु सतह तक लाता है। अत: वाष्पीकरण रुकने के बजाय पूरी गति से चलता रहता है।
  3. तो पंखा हमें ठंडा क्यों लगता है? ठीक इसी कारण। वह शरीर के पसीने को तेजी से वाष्पित कराता है, और वाष्पित होता पसीना हमारी त्वचा से ऊष्मा ले जाता है। पंखे की हवा ठंडी होती ही नहीं — पंखे के सामने रखा तापमापी कमरे का ही ताप दिखाता है।
पंखा → आर्द्र वायु की परत हटती है → तीव्र वाष्पीकरण
कपड़े से तीव्र वाष्पीकरण → कपड़े जल्दी सूखते हैं
त्वचा से तीव्र वाष्पीकरण → शरीर से ऊष्मा जाती है → हमें ठंडक लगती है
दोनों के पीछे एक ही विचार: पंखा केवल वाष्पीकरण तेज करता है, और कुछ नहीं। वह "सुखाना" दिखे या "ठंडक", यह केवल इस पर निर्भर है कि जल किस वस्तु से वाष्पित हो रहा है — कमीज से या आपकी त्वचा से।
स्वयं जाँचें: एक गीला रूमाल पंखे के सामने और वैसा ही दूसरा उसी कमरे के शांत कोने में टाँगिए। पंखे वाला पहले सूखता है, यद्यपि उस पर पड़ने वाली हवा अधिक गरम नहीं है।
प्र6.
प्राय: जब नालियों से कीचड़ निकाला जाता है तो नाली के समीप में उसका ढेर बनाकर तीन से चार दिनों के लिए छोड़ दिया जाता है। इसके पश्चात इसे उद्यान या खेत में ले जाया जाता है जहाँ इसका उपयोग खाद के रूप में कर सकते हैं। यह विधि कीचड़ को दूसरे स्थान पर ले जाने की लागत कम करती है और इसके साथ ही काम करने वाले व्यक्तियों की सुरक्षा बढ़ाती है। इस पर विचार करें और बताएँ कि ऐसा क्यों है?
उत्तर

पूरा लाभ इन तीन-चार दिनों में कीचड़ के जल के वाष्पित हो जाने से मिलता है।

ढुलाई की लागत कैसे घटती है:

  • ताजा कीचड़ मुख्यत: जल होता है — प्राय: उसके भार का तीन-चौथाई।
  • खुले में ढेर बनाकर छोड़ने पर वह धूप और हवा के संपर्क में रहता है और उसका बहुत सारा जल वाष्पित हो जाता है।
  • ढेर हल्का और आयतन में छोटा हो जाता है।
  • अत: उतना ही उपयोगी ठोस पदार्थ कम फेरों में, छोटे वाहन से, कम ईंधन में ले जाया जा सकता है — यह सीधी बचत है। खेत को जल की आवश्यकता न हो तो जल ढोना केवल व्यर्थ का खर्च है।

काम करने वालों की सुरक्षा कैसे बढ़ती है:

  • सूखा कीचड़ फिसलनदार, टपकते घोल के बजाय ठोस और भुरभुरा होता है। उसे फावड़े से उठाया जा सकता है और वह त्वचा, आँखों या कपड़ों पर नहीं छपकता।
  • रास्ते में ठेले से छलकने या रिसने को बहुत कम द्रव बचता है।
  • धूप में सूखने से बहुत सारे रोगाणु नष्ट हो जाते हैं, और गीला, सड़ता पदार्थ सूखने पर दुर्गंध बहुत कम हो जाती है।
  • हल्का भार अर्थात् कम शारीरिक श्रम और दुर्घटना की कम संभावना।
एक पंक्ति में विज्ञान: सूर्य और हवा यह सुखाने का काम बिना किसी खर्च के, केवल वाष्पीकरण से कर देते हैं। कुछ दिनों की प्रतीक्षा ईंधन, धन और जोखिम तीनों की जगह ले लेती है — यही विचार अनाज, पापड़, मिर्च और उपलों को धूप में सुखाने के पीछे भी है।
सुझाव: ढेरों को पीने के जल के स्रोतों से दूर रखना चाहिए और वर्षा से पहले ढक देना चाहिए — अन्यथा वर्षा उन्हें फिर भिगो देगी और सारा सुखाना व्यर्थ हो जाएगा।
प्र7.
एक दिन के लिए अपने घर की गतिविधियों का अवलोकन करें। उन गतिविधियों की पहचान करें जिनमें वाष्पीकरण सम्मिलित है? वाष्पीकरण के प्रक्रम को समझने से हमें अपनी दैनिक गतिविधियों में कैसे सहायता मिलती है?
उत्तर

सामान्य भारतीय घर की वे गतिविधियाँ जिनमें वाष्पीकरण सम्मिलित है:

समयगतिविधिक्या वाष्पित हो रहा है
सुबहस्नान के बाद गीले बाल और तौलिया सूखनाबालों और कपड़े से जल
सुबहफर्श पर पोंछा लगाना; फर्श का सूखनाफर्श से जल
सुबहबर्तन धोकर रैक पर रखनास्टील पर लगा जल
सुबहधुले कपड़े तार पर टाँगनाकपड़ों से जल
दोपहरखीर या खोया बनाने के लिए दूध औटानादूध का जल
दोपहरछत पर पापड़, मिर्च, आम की फाँकें या अनाज सुखानाखाद्य पदार्थ के भीतर का जल
दोपहरमटके का जल ठंडा रहना; उसका स्तर धीरे-धीरे घटनामिट्टी के छिद्रों से रिसता जल
दिन मेंआँगन या छत पर जल का छिड़कावफर्श से जल
कभी भीपसीना आने पर पंखे के नीचे बैठना; सैनिटाइजर लगानात्वचा से पसीना और ऐल्कोहल
शामरँगी या पुती दीवारों का सूखना; कॉपी पर स्याही का सूखनारंग और स्याही का जल

वाष्पीकरण समझने से हमें क्या सहायता मिलती है:

  • हम कपड़े बेहतर सुखाते हैं — फैलाकर, हवा में, धूप में; कभी बंद स्नानघर में सिमटाकर नहीं।
  • हम बिना बिजली के जल ठंडा रखते हैं — मटका, सुराही, या बोतल के चारों ओर गीला कपड़ा लपेटकर।
  • हम कमरा ठंडा करते हैं — फर्श पर जल छिड़ककर या खस के गीले पर्दे लगाकर; और हम समझते हैं कि डेजर्ट कूलर मानसून में कम क्यों चलता है।
  • हम भोजन सुरक्षित रखते हैं — सुखाकर। सूखी मछली, पापड़, बड़ी और सूखी सब्जियाँ महीनों चलती हैं क्योंकि जल के बिना रोगाणु नहीं पनप सकते।
  • हम द्रवों को ठीक से रखते हैं — पेट्रोल, स्पिरिट और इत्र को कसकर बंद रखते हैं ताकि वे उड़ न जाएँ।
  • हम आराम और सुरक्षा पाते हैं — हम जानते हैं कि पसीना क्यों आता है, गरमी में ढीले सूती कपड़े क्यों अच्छे लगते हैं, और उसी ताप पर आर्द्र दिन शुष्क दिन से अधिक कष्टकर क्यों लगता है।
बड़ी बात: किसी प्रक्रम को समझ लेने पर हम उसे चाहें तो तेज कर सकते हैं और चाहें तो धीमा। यह केवल उसका नाम जान लेने से कहीं अधिक उपयोगी है।
प्र8.
प्रकृति में जल ठोस अवस्था में किस प्रकार विद्यमान है?
उत्तर

प्रकृति में जल बर्फ के रूप में ठोस अवस्था में वहाँ मिलता है जहाँ ताप 0 °C तक या उससे नीचे चला जाता है।

रूपयह कैसे बनता हैभारत में कहाँ मिलता है
हिम (बर्फबारी)ऊँचाई पर जलवाष्प सीधे बर्फ के क्रिस्टल में जमकर गिरती हैहिमालय — कश्मीर, हिमाचल, उत्तराखंड, सिक्किम, लद्दाख
ओलेवर्षा की बूँदें बहुत ठंडे बादलों में ऊपर उठकर बर्फ के ढेलों में जम जाती हैंमैदानों में गरज-चमक के साथ, विशेषकर वसंत में
हिमनद (ग्लेशियर)सदियों तक जमती बर्फ दबकर धीरे बहती बर्फ की नदी बन जाती हैगंगोत्री और सियाचिन हिमनद — गंगा तथा अन्य नदियों के उद्गम
ध्रुवीय हिम-टोपियाँ और हिमशैलबर्फ की विशाल स्थायी चादरें; टूटे टुकड़े समुद्र में तैरते हैंआर्कटिक और अंटार्कटिका, जहाँ भारत के अनुसंधान केंद्र हैं
तुषार (पाला)जाड़े की अत्यंत ठंडी रातों में जलवाष्प सीधे ठंडी सतहों पर जम जाती हैदिसंबर-जनवरी में उत्तर भारत की घास और फसलों पर
जमी हुई झीलें और नदियाँवायु का ताप लगातार 0 °C से नीचे रहने पर सतह का जल जम जाता हैलद्दाख की पैंगोंग त्सो और जांस्कर नदी, जिस पर चादर ट्रेक होता है
हिमाच्छादित चोटियाँबहुत अधिक ऊँचाई पर इतनी ठंड रहती है कि बर्फ कभी पूरी तरह नहीं पिघलतीकंचनजंगा, नंदा देवी और अन्य ऊँची चोटियाँ, वर्ष भर
ठोस जल हमारे लिए क्यों महत्वपूर्ण है: हिमालय की बर्फ और हिमनद मीठे जल का प्राकृतिक भंडार हैं। वे वसंत और ग्रीष्म में धीरे-धीरे पिघलकर गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र और सिंधु को वर्षा न होने पर भी बहती रखते हैं। इसीलिए हिमनदों का पिघलना इतनी गंभीर चिंता का विषय है।
क्या आप जानते हैं? बर्फ जल पर तैरती है क्योंकि वह उतने ही आयतन के जल से हल्की होती है। यह बहुत असामान्य है, और अच्छा भी — झील केवल ऊपर से जमती है और नीचे के द्रव जल में मछलियाँ जीवित रह पाती हैं।
प्र9.
“जल हमारे अधिकार से पहले हमारी जिम्मेदारी है” इस कथन पर विचार करें। अपने विचार साझा करें।
उत्तर

यह विचार-प्रधान प्रश्न है, अत: अपने विचार कारणों सहित लिखिए। नीचे पूरा नमूना उत्तर दिया गया है, जिसे आप अपने ढंग से बदल सकते हैं।

नमूना उत्तर: मैं इस कथन से सहमत हूँ। हर व्यक्ति को स्वच्छ पेयजल का अधिकार है — पर वह अधिकार तभी पूरा हो सकता है जब किसी ने पहले जल को स्वच्छ और उपलब्ध रखने की जिम्मेदारी उठाई हो। यदि सब अधिकार माँगें और कोई कर्तव्य न निभाए तो कुआँ सूख जाएगा और नदी काली पड़ जाएगी, और तब माँगने के लिए कोई अधिकार बचेगा ही नहीं। अत: जिम्मेदारी पहले आनी चाहिए, और वह हम सबकी है, केवल सरकार की नहीं।

इसके पीछे का तर्क, बिंदुवार:

  • अध्याय स्वयं कहता है कि पृथ्वी पर उपलब्ध जल का केवल एक छोटा-सा भाग ही पौधों, जानवरों और मनुष्यों के उपयोग योग्य है। अधिकांश जल महासागरों में है और सीधे प्रयोग नहीं हो सकता।
  • जनसंख्या के साथ माँग बढ़ती जा रही है, और विश्व के कई भागों में पहले ही जल की कमी है।
  • जल कहीं बनाया नहीं जाता। जल चक्र उसी जल को घुमाता भर है। अत: हम केवल इतना ही नियंत्रित कर सकते हैं कि उसका उपयोग कैसे करें और उसे कितना स्वच्छ रखें।
  • एक व्यक्ति जो व्यर्थ करता या प्रदूषित करता है, वह नीचे की ओर बसे किसी दूसरे से छिन जाता है — अत: एक का अधिकार सीधे दूसरे की जिम्मेदारी पर टिका है।

व्यवहार में जिम्मेदारी उठाना कैसा दिखता है:

  • दाँत साफ करते या हाथ धोते समय नल बंद रखिए; टपकता नल ठीक कराइए — एक सेकंड में एक बूँद भी दिन भर में कई लीटर बहा देती है।
  • शॉवर के स्थान पर बाल्टी का उपयोग कीजिए, और सब्जी धोने का जल पौधों में डालिए।
  • तालाबों, नदियों और नालियों में प्लास्टिक, तेल, रंग या कचरा मत डालिए; जलाशयों को प्रदूषण से मुक्त रखिए।
  • घर और विद्यालय में वर्षा जल संचयन का समर्थन कीजिए और कुओं व तालाबों को भरने में सहायता कीजिए।
  • पौधों को सुबह या शाम की ठंडक में सींचिए, जब वाष्पीकरण से कम जल उड़ता है।
कथन की भाषा इतनी अच्छी क्यों है: "जिम्मेदारी" को "अधिकार" से पहले रखकर यह हमारी सामान्य सोच को उलट देता है। यह याद दिलाता है कि सबकी साझी संपदा तभी बचती है जब हर व्यक्ति उसकी रक्षा करे — और भारत की बावड़ियाँ, जोहड़ और गाँव के तालाब सदियों पहले इसी समझ पर बनाए गए थे।
प्र10.
धूप में खड़े दुपहिया वाहन की सीट गरम हो जाती है। आप उसे ठंडा कैसे करेंगे?
उत्तर

सबसे तेज उपाय है वाष्पीकरण का उपयोग — सीट को गीला कीजिए और जल को वाष्पित होने दीजिए, वह अपने साथ ऊष्मा ले जाएगा।

क्या करेंयह क्यों काम करता हैकितनी जल्दी
सीट पर थोड़ा जल छिड़ककर सूखने दीजिएजल वाष्पित होकर सीट से ऊष्मा ले लेता है — शीतलन प्रभावकुछ ही मिनटों में
गीले कपड़े से पोंछिए, या गीला कपड़ा उस पर बिछा दीजिएवही कारण, और सीट टपकती हुई भी नहीं रहतीकुछ मिनट
गीली सीट पर हवा कीजिए, या वाहन को हवादार जगह पर ले जाइएबहती वायु जल को और तेजी से वाष्पित कराती हैसबसे तेज
वाहन को छाया में खड़ा करके प्रतीक्षा कीजिएसीट धूप सोखना बंद कर देती है और धीरे-धीरे अपनी ऊष्मा वायु को दे देती हैधीमा — 10 से 20 मिनट
खड़ा करने से पहले ही सीट पर गीला तौलिया या अखबार डाल दीजिए (रोकथाम)धूप काली सीट तक पहुँचती ही नहींसर्वोत्तम — सीट कभी गरम होती ही नहीं
सीट इतनी गरम होती ही क्यों है: सीट का कवर प्राय: काला होता है, और गहरे रंग की सतहें उन पर पड़ने वाली लगभग सारी धूप सोखकर ऊष्मा में बदल देती हैं। प्लास्टिक और फोम फिर उस ऊष्मा को रोके रखते हैं। तेज गरमी में ऐसी सीट 60 °C से भी ऊपर पहुँच सकती है — इतनी कि त्वचा जल जाए।
सुझाव: पूरे वाहन पर ढेर सारा जल मत डालिए। सीट पर हल्का छिड़काव पर्याप्त है और उससे जल फोम के भीतर या विद्युत पुर्जों तक नहीं पहुँचता।
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ