गणित प्रकाश अध्याय 2 पाठ्य प्रश्न

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
अन्य उदाहरण लेकर जाँचिए कि घटाने को इस प्रकार जोड़ने से बदलने पर व्यंजक का मान नहीं बदलता है।
उत्तर

कुछ उदाहरण लेकर दोनों रूपों के मानों की तुलना कीजिए।

घटाव का रूपयोग का रूपमान
18 – 1018 + (–10)8
83 – 1483 + (–14)69
40 – 5540 + (–55)–15
–7 – 6–7 + (–6)–13
100 – 100100 + (–100)0

प्रत्येक स्थिति में दोनों रूपों का मान समान है।

ऐसा क्यों होता है: 14 घटाना और –14 जोड़ना — दोनों का काम एक ही है; दोनों संख्या रेखा पर 14 कदम बाईं ओर ले जाते हैं। अत: a – b = a + (–b) सदैव सत्य है।
सुझाव: इसी कारण हर घटाव को योग के रूप में लिखा जा सकता है। जब व्यंजक केवल योग बन जाता है, तब उसके भाग ही उसके पद होते हैं और उन्हें किसी भी क्रम में जोड़ा जा सकता है।
प्र2.
क्या आप कक्षा 6 की गणित की पाठ्यपुस्तक में पढ़े गए पूर्णांकों के टोकन मॉडल का उपयोग करके व्याख्या कर सकते हैं कि क्यों किसी संख्या को घटाना उसके प्रतिलोम को जोड़ने के समान है?
उत्तर

टोकन मॉडल में एक धनात्मक टोकन (+1) और एक ऋणात्मक टोकन (–1) मिलकर शून्य बनाते हैं। ऐसा युग्म कभी भी जोड़ा या हटाया जा सकता है, मान नहीं बदलता।

5 – 3 लीजिए। 5 धनात्मक टोकन रखिए और उनमें से 3 हटा दीजिए —

+ + + + + → 3 धनात्मक हटाइए → + + = 2

अब 5 + (–3) लीजिए। 5 धनात्मक टोकन रखिए और उनमें 3 ऋणात्मक टोकन मिलाइए। प्रत्येक ऋणात्मक एक धनात्मक को काट देता है —

+ + + + + तथा – – –
(+ –) (+ –) (+ –) शून्य बन जाते हैं, शेष + + = 2

दोनों स्थितियों में वही 2 धनात्मक टोकन बचते हैं, अत: 5 – 3 = 5 + (–3)।

ऐसा क्यों होता है: धनात्मक टोकन हटाने और ऋणात्मक टोकन जोड़ने का कुल पर प्रभाव समान होता है। यदि हटाने के लिए पर्याप्त धनात्मक टोकन न हों तो पहले उतने ही शून्य-युग्म रख लीजिए — मान नहीं बदलता — और फिर हटाइए। प्रतिलोम जोड़ना ठीक यही करता है।
स्वयं जाँचिए: 3 – 7 को टोकनों से कीजिए। पहले चार शून्य-युग्म रखिए, फिर 7 धनात्मक हटाइए; शेष 4 ऋणात्मक टोकन अर्थात –4 बचते हैं — ठीक 3 + (–7) के समान।
प्र3.
नीचे दी गई सारणी में कुछ व्यंजक दिए गए हैं। सारणी को पूरा कीजिए। (व्यंजक: 13 – 2 + 6; 5 + 6 × 3; 4 + 15 – 9; 23 – 2 × 4 + 16; 28 + 19 – 8)
उत्तर

पहले हर घटाव को “प्रतिलोम जोड़ना” बनाइए, फिर पद पहचानिए।

व्यंजकपदों के योग के रूप में व्यंजकपद
13 – 2 + 613 + (–2) + 613, –2, 6
5 + 6 × 35 + (6 × 3)5, 6 × 3
4 + 15 – 94 + 15 + (–9)4, 15, –9
23 – 2 × 4 + 1623 + (–2 × 4) + 1623, –2 × 4, 16
28 + 19 – 828 + 19 + (–8)28, 19, –8

इनके मान क्रमश: 17, 23, 10, 31 और 39 हैं।

ऐसा क्यों होता है: पद वह भाग है जो ‘+’ के चिह्न से अलग होता है। × या ÷ की श्रृंखला में कोई ‘+’ नहीं होता, इसलिए 6 × 3 और 2 × 4 एकल पद बने रहते हैं। पद के आगे लगा ऋण चिह्न उसी पद का भाग होता है।
सुझाव: पुनः लिखने के बाद ‘+’ के चिह्न गिनिए। पदों की संख्या = ‘+’ चिह्नों की संख्या + 1.
प्र4.
क्या पदों के योग के क्रम को परिवर्तित करने से अलग मान प्राप्त होता है?
उत्तर

नहीं। पदों का क्रम बदलने पर भी मान वही रहता है।

14 + 10 + (–5) = 24 + (–5) = 19
(–5) + 10 + 14 = 5 + 14 = 19
10 + (–5) + 14 = 5 + 14 = 19
ऐसा क्यों होता है: जोड़ना वस्तुओं को एक ढेर में इकट्ठा करने जैसा है। पहले कौन-सी वस्तु डाली गई, इससे ढेर नहीं बदलता। गणित में इसे जोड़ का क्रमविनिमेयता गुण कहते हैं।
सुझाव: यह तभी लागू होता है जब हर घटाव को “ऋणात्मक पद जोड़ना” बना दिया गया हो। 10 – 4, 4 – 10 के समान नहीं है, किंतु 10 + (–4), (–4) + 10 के समान अवश्य है।
प्र5.
क्या तब भी ऐसा ही होगा जब पदों में ऋणात्मक संख्याएँ भी हों? कुछ अन्य व्यंजक लीजिए और जाँच कीजिए।
उत्तर

हाँ। पद ऋणात्मक होने पर भी अदला-बदली से योग नहीं बदलता।

व्यंजकपदों की अदला-बदलीमान
6 + (–4)(–4) + 62
(–4) + (–2)(–2) + (–4)–6
(–6) + (–8)(–8) + (–6)–14
(–15) + 99 + (–15)–6
25 + (–25)(–25) + 250
ऐसा क्यों होता है: संख्या रेखा पर दोनों स्थितियों में वही दो छलाँगें लगती हैं — एक दाईं ओर और एक बाईं ओर। पहले बाईं छलाँग लगाइए या पहले दाईं, अंत में आप उसी बिंदु पर पहुँचते हैं।
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