गणित प्रकाश अध्याय 5 पता लगाइए

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
नीचे दिए गए चिह्नित कोणों को ज्ञात कीजिए — (चित्र 5.30 : a, b, c, d, e, f, g, h, i तथा j)
उत्तर

हर भाग संगत, एकांतर या अंत: कोणों का एक-एक चरण है। कई भागों में एक अतिरिक्त कोण छपा है जिसकी आवश्यकता नहीं है।

कोणमानकारण
a48°48° को तिर्यक रेखा के सहारे दूसरी समांतर रेखा तक ले जाइए — वह संगत कोण भी 48° है, और a° उसका शीर्षाभिमुख कोण है
b52°b और 52° दोनों समांतर रेखाओं के एकांतर अंत: कोण हैं
c81°c और 99° एक ही ओर के अंत: कोण हैं: c = 180° – 99°
d99°d और 81° एक ही ओर के अंत: कोण हैं: d = 180° – 81°
e69°e और 69° एकांतर अंत: कोण हैं (97° तथा 83° दूसरी तिर्यक रेखा के हैं और आवश्यक नहीं)
f48°f और 132° एक ही ओर के अंत: कोण हैं: f = 180° – 132°
g122°g और दूसरी ऊर्ध्वाधर रेखा पर बना 122° संगत कोण हैं
h75°h और 75° एकांतर अंत: कोण हैं (120° की आवश्यकता नहीं)
i54°तीर से चिह्नित दोनों किरणें समांतर हैं, अतः बाईं ओर का आधार कोण 56° है। त्रिभुज में i = 180° – 70° – 56°
j97°j और 97° पहली व तीसरी समांतर रेखा के एकांतर अंत: कोण हैं (27° और 124° की आवश्यकता नहीं)

दो लंबे भाग पूरे विस्तार से:

भाग i: त्रिभुज के आधार कोण
दायाँ आधार कोण = 70°
बायाँ आधार कोण = 56° (दाईं ओर के 56° का संगत कोण, क्योंकि दोनों किरणें समांतर हैं)
i = 180° – 70° – 56° = 54°
दाएँ पाद पर जाँच: 70° + 54° + 56° = 180° ✔

भाग c: ऊपरी रेखा पर 99° + 81° = 180° ✔
c + 99° = 180° → c = 81°
ऐसा क्यों होता है: जब तिर्यक रेखा समांतर रेखाओं को काटती है तो केवल दो माप बनते हैं और उनका योग 180° होता है। इसलिए हर उत्तर या तो किसी छपे कोण की प्रतिलिपि है या 180° में से उसे घटाने पर मिलता है। सारा काम यही तय करने का है कि कौन-सा।
संकेत: गणना से पहले तीर के चिह्न देखिए। जिस रेखा-युग्म पर तीर नहीं हैं उस पर ये नियम लगाए ही नहीं जा सकते — इसीलिए भाग e, h और j में अतिरिक्त संख्याएँ दी गई हैं।
प्र2.
नीचे दी गई आकृतियों में संकेत a द्वारा निर्देशित कोणों का मान ज्ञात कीजिए — (चित्र 5.31)
उत्तर
आकृतिaहल
(i) दो समांतर रेखाएँ, 42° और 100° अंकित138°निचली रेखा पर 42° का संगत कोण 42° है; a उसका रैखिक युग्म है, अतः a = 180° – 42°
(ii) समांतर रेखाओं के दो युग्मों का जाल, 62° अंकित118°62° निचली रेखा तक और फिर दूसरी तिरछी रेखा तक जाता है; a उसका रैखिक युग्म है, अतः a = 180° – 62°
(iii) तीन समांतर रेखाएँ, 110° और 35° अंकित105°110° बीच की रेखा तक जाता है; दोनों तिरछी रेखाओं के बीच का 35° घटाने पर 110° – 35° = 75° बचता है; a = 180° – 75°
(iv) दो समांतर तिरछी रेखाएँ, 67° और एक समकोण23°समकोण त्रिभुज में: a = 180° – 90° – 67°
(i) a = 180° – 42° = 138°
(ii) a = 180° – 62° = 118°
(iii) खड़ी रेखा का बीच वाली रेखा के साथ कोण = 110° – 35° = 75°
a = 180° – 75° = 105°
(iv) a = 180° – 90° – 67° = 23°
ऐसा क्यों होता है: (iii) में दोनों तिरछी रेखाएँ बीच वाली रेखा के एक ही बिंदु से निकलती हैं, इसलिए ऊपरी रेखा से लाए गए 110° में से 35° को सीधे घटाया जा सकता है। (iv) में दूसरी तिरछी रेखा पहली के समांतर है, अतः वह भी आधार से 67° बनाती है और त्रिभुज के तीनों कोणों का योग 180° होता है।
स्वयं जाँचिए: (i) में 100° का कोण दूसरी तिर्यक रेखा का है और उसकी आवश्यकता नहीं — यह याद दिलाता है कि हर छपा कोण किन रेखाओं के बीच है, यह देखना कितना ज़रूरी है।
प्र3.
नीचे दिए गए चित्रों में कोण x और y के क्या मान हैं? (चित्र 5.32)
उत्तर

पहला चित्र: x = 25°, y = 155°। दूसरा चित्र: x = 25°।

पहला चित्र
ऊर्ध्वाधर रेखा ऊपरी रेखा पर लम्ब है तथा दोनों क्षैतिज रेखाएँ समांतर हैं
⟹ ऊर्ध्वाधर रेखा निचली रेखा पर भी लम्ब है
ऊर्ध्वाधर रेखा और निचली रेखा के बीच कोण = 90°
इसमें से 65° तिरछी रेखा ने ले लिया है
शेष भाग = 90° – 65° = 25°
x = 25° (उसी का शीर्षाभिमुख कोण)

y ऊपरी रेखा पर, x के रैखिक युग्म की स्थिति में है
y = 180° – 25° = 155°
दूसरा चित्र
निचली रेखा पर पहली तिर्यक रेखा 53° और दूसरी 78° बनाती है
दोनों क्षैतिज रेखाएँ समांतर हैं, अतः ये कोण ऊपरी रेखा पर भी वही रहते हैं
दोनों तिर्यक रेखाएँ ऊपरी रेखा पर मिलती हैं
x = 78° – 53° = 25°
ऐसा क्यों होता है: दूसरे चित्र में x दोनों तिर्यक रेखाओं के बीच का कोण है। हर तिर्यक रेखा अपना झुकाव निचली रेखा से ऊपरी रेखा तक ज्यों का त्यों ले जाती है, इसलिए उनके बीच का कोण दोनों झुकावों का अंतर ही होता है।
क्या आप जानते हैं? दो तिर्यक रेखाओं के बीच का कोण कहीं भी मापें, वही रहता है — इसी कारण दोनों चित्रों का उत्तर एक ही, 25°, आता है।
प्र4.
चित्र 5.33 में ∠ABC = 45° और ∠IKJ = 78° है। ∠GEH, ∠HEF और ∠FED ज्ञात कीजिए।
उत्तर

दोनों क्षैतिज रेखाओं पर तीर के चिह्न हैं, अतः वे समांतर हैं। J–K–E–F एक सरल रेखा है और C–B–E–H दूसरी, और दोनों E से होकर जाती हैं।

∠GEH
∠ABC = 45° (दिया है, ऊपरी रेखा पर B पर)
∠GEH, E पर ∠DEB का शीर्षाभिमुख कोण है
∠DEB = ∠ABC = 45° (समांतर रेखाओं के कारण)
∠GEH = 45°

∠FED
∠IKJ = 78° (दिया है, ऊपरी रेखा पर K पर)
∠AKE = 78° (∠IKJ का शीर्षाभिमुख कोण)
∠FED = 78° (E पर उसी स्थिति का कोण)
∠FED = 78°

∠HEF
∠GEH + ∠HEF + ∠FED = 180° (सरल रेखा GED)
45° + ∠HEF + 78° = 180°
∠HEF = 180° – 123° = 57°

अतः ∠GEH = 45°, ∠HEF = 57°, ∠FED = 78°।

ऐसा क्यों होता है: किरणें EH और EF वही दोनों दी गई रेखाएँ हैं जो E के आगे बढ़ी हैं। हर रेखा अपना झुकाव नीचे तक बनाए रखती है, इसलिए ऊपरी रेखा के साथ बना कोण निचली रेखा पर फिर से प्रकट होता है। E के नीचे के तीनों कोण मिलकर सरल रेखा GD को भरते हैं, इसीलिए उनका योग 180° होना ही चाहिए।
स्वयं जाँचिए: 45 + 57 + 78 = 180 ✔ साथ ही E के ऊपर दोनों रेखाओं के बीच का कोण ∠BEK भी 57° है — यह ∠HEF का शीर्षाभिमुख कोण है।
प्र5.
चित्र 5.34 में AB, CD के समांतर है एवं CD, EF के समांतर है। साथ ही EA, AB पर लम्ब है। यदि ∠BEF = 55° हो तो x और y के मान ज्ञात कीजिए।
उत्तर

x = 125° तथा y = 125°।

AB ∥ CD ∥ EF, और BE तीनों की तिर्यक रेखा है

∠BEF = 55° (दिया है, E पर EB और EF के बीच)
D पर: DB और CD के नीचे वाले भाग के बीच कोण = 55° (संगत कोण)
y और यह कोण तिर्यक रेखा पर रैखिक युग्म बनाते हैं
y = 180° – 55° = 125°

B पर: AB के नीचे वाले भाग और BE के बीच का कोण
x = 180° – 55° = 125° (तीसरी समांतर रेखा पर वही तर्क)

अतः x = y = 125°।

ऐसा क्यों होता है: तीनों रेखाएँ AB, CD और EF एक ही दिशा में झुकी हैं, इसलिए अकेली तिर्यक रेखा BE हर एक पर कोणों का वही समूह बनाती है। यही कारण है कि x और y समान निकलते हैं और दोनों 180° – 55° के बराबर हैं।
संकेत: "EA, AB पर लम्ब है" से पता चलता है कि A, C और E तीनों समांतर रेखाओं पर लम्ब एक ही रेखा पर हैं — यह एक उपयोगी पुष्टि है, यद्यपि x और y का मान इस पर निर्भर नहीं करता।
प्र6.
चित्र 5.35 में कोण ∠NOP का माप क्या है? (संकेत — बिंदुओं N और O से होकर जाती हुई LM व PQ के समांतर रेखाएँ खींचिए।)
उत्तर

∠NOP = 108°।

LM और PQ पर एक जैसा तीर का चिह्न है, अतः LM ∥ PQ। अब N से होकर LM के समांतर एक बिंदुदार रेखा और O से होकर PQ के समांतर दूसरी बिंदुदार रेखा खींचिए। इससे चारों रेखाएँ आपस में समांतर हो जाती हैं।

LMN OPQ 40°40°56° 56°52°52°
N और O से जाती बैंगनी बिंदुदार रेखाएँ LM और PQ के समांतर हैं। ये ∠MNO को 40° + 56° में और ∠NOP को 56° + 52° में बाँट देती हैं।
N पर
∠LMN = 40° तथा LM ∥ (N वाली बिंदुदार रेखा)
NM और बिंदुदार रेखा के बीच कोण = 40° (एकांतर कोण)
∠MNO = 96°
बिंदुदार रेखा और NO के बीच कोण = 96° – 40° = 56°

O पर
N वाली बिंदुदार रेखा ∥ O वाली बिंदुदार रेखा
ON और O वाली बिंदुदार रेखा के बीच कोण = 56° (एकांतर कोण)

∠OPQ = 52° तथा PQ ∥ (O वाली बिंदुदार रेखा)
O वाली बिंदुदार रेखा और OP के बीच कोण = 52° (एकांतर कोण)

∠NOP = 56° + 52° = 108°
ऐसा क्यों होता है: L–M–N–O–P–Q का टेढ़ा-मेढ़ा रास्ता बार-बार दिशा बदलता है और सभी कोणों को जोड़ने वाली कोई एक तिर्यक रेखा नहीं है। समांतर सहायक रेखाएँ खींचने से हर कोने को एक ही संदर्भ दिशा मिल जाती है, जिससे प्रत्येक कोण ऐसे टुकड़ों में बँट जाता है जो एक कोने से दूसरे कोने तक पहुँचाए जा सकते हैं।
संकेत: "कोने से होकर समांतर रेखा खींचो" वाली यह युक्ति समांतर रेखाओं के बीच के टेढ़े-मेढ़े रास्तों के लिए मानक तरीका है। इसका अभ्यास कीजिए — यह आगे के अध्यायों में फिर मिलेगी।
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ