गणित प्रकाश अध्याय 7 पाठ्य प्रश्न

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
किसी त्रिभुज के कोणों के योग के बारे में हम क्या कह सकते हैं? (एक त्रिभुज ABC पर विचार कीजिए तथा A से होकर BC के समांतर एक रेखा की रचना कीजिए।)
उत्तर

यह योग सदैव 180° होता है — हर त्रिभुज के लिए, चाहे वह बड़ा हो या छोटा, पतला हो या चौड़ा।

X Y B C A ∠B ∠C ∠XAB ∠YAC ∠A
A पर बना ऋजु कोण ∠XAB, ∠A तथा ∠YAC में बँटा है — जो ∠B, ∠A एवं ∠C की प्रतियाँ हैं।
XY ∥ BC → ∠B = ∠XAB तथा ∠C = ∠YAC (एकांतर कोण)
अत: ∠A + ∠B + ∠C = ∠A + ∠XAB + ∠YAC
= 180°, क्योंकि ये तीनों मिलकर एक ऋजु कोण बनाते हैं

यह परिणाम त्रिभुजों के कोण योग का गुण कहलाता है।

ऐसा क्यों होता है: पूरी चतुराई ऊपरी शीर्ष से होकर आधार के समांतर एक रेखा खींचने में है। इससे ∠B और ∠C ऊपर उठकर ∠A के दोनों ओर आ जाते हैं, जहाँ तीनों एक ही सरल रेखा पर पड़े होते हैं। यह विचार यूनानी गणितज्ञ यूक्लिड की प्रसिद्ध पुस्तक 'दी एलिमेंट्स' में मिलता है; उनका जीवन-काल लगभग 300 सामान्य संवत् था।
प्र2.
इस कोण योग गुण के सत्यापन की एक सुविधाजनक विधि है। इस विधि में एक कागज के त्रिभुजाकार कटआउटों को मोड़ा जाता है। क्या आप देख रहे हैं कि यह विधि किस प्रकार दर्शाती है कि इस त्रिभुज में कोणों का योग 180° है?
उत्तर

हाँ — तीनों कोनों को भीतर की ओर मोड़िए, वे आधार पर एक कतार में आ जाते हैं।

  1. कागज़ का कोई भी त्रिभुज ΔABC काटिए और तीनों कोणों को अलग-अलग रंग से चिह्नित कीजिए।
  2. ऊपरी शीर्ष A को इस प्रकार नीचे मोड़िए कि वह ठीक आधार BC पर आ जाए।
  3. अब B वाला कोना भीतर मोड़कर उसी बिंदु तक लाइए, और यही C वाले कोने के साथ भी कीजिए।
  4. तीनों रंगीन कोने अब BC की सीधी कोर पर एक साथ बैठ जाते हैं — न कोई रिक्ति, न कोई अतिव्यापन।
तीन कोण एक सरल रेखा पर सटीक बैठ गए
ऋजु कोण = 180°
अत: ∠A + ∠B + ∠C = 180°
ऐसा क्यों होता है: पहला मोड़ वास्तव में उपपत्ति वाली समांतर रेखा ही है — वह मोड़ का चिह्न BC के समांतर होता है। मोड़ने से छपी हुई उपपत्ति हाथ में पकड़ी जा सकने वाली वस्तु बन जाती है, इसीलिए वह इतनी जल्दी विश्वास दिला देती है।
प्रयास करें: एक बहुत अधिक कोण वाले त्रिभुज तथा एक समकोण त्रिभुज से भी यही कीजिए। कोने फिर भी सीधी कोर पर ठीक बैठेंगे।
प्र3.
यदि ∠A = 50° और ∠B = 60° है तो ∠ACD ज्ञात कीजिए।
उत्तर

∠ACD = 110°।

B C D A 60° 50° 110° बहिष्कोण
BC को D तक बढ़ाया गया है; ∠ACD शीर्ष C पर बना बहिष्कोण है।
कोण योग गुण द्वारा —
50° + 60° + ∠ACB = 180°
110° + ∠ACB = 180°
अत: ∠ACB = 70°

∠ACB और ∠ACD मिलकर एक ऋजु कोण बनाते हैं
∠ACD = 180° – 70°
= 110°
संकेत: किसी भुजा को बढ़ाने पर उसके तथा दूसरी भुजा के बीच बना कोण बहिष्कोण कहलाता है। हर त्रिभुज में ऐसे छह बहिष्कोण होते हैं, प्रत्येक शीर्ष पर दो।
प्र4.
∠A और ∠B के विभिन्न मापों के लिए बहिष्कोण ज्ञात कीजिए। क्या आप बहिष्कोण और इन दोनों कोणों के बीच कोई संबंध देखते हैं? (संकेत— कोण योग गुण द्वारा हमें ∠A + ∠B + ∠ACB = 180° प्राप्त है।) हमें ∠ACD + ∠ACB = 180° भी प्राप्त है, क्योंकि ये ऋजु कोण बनाते हैं। यह क्या दर्शाता है?
उत्तर

बहिष्कोण सदैव दोनों सम्मुख अंत:कोणों के योग के बराबर होता है।

∠A∠B∠ACB∠ACD∠A + ∠B
50°60°70°110°110°
40°80°60°120°120°
90°30°60°120°120°
35°35°110°70°70°

दोनों संकेत मिलकर इसे एक ही पंक्ति में सिद्ध कर देते हैं —

∠A + ∠B + ∠ACB = 180° … (कोण योग गुण)
∠ACD + ∠ACB = 180° … (ऋजु कोण)
दोनों के दाहिने पक्ष 180° हैं, अत: बाएँ पक्ष बराबर हैं —
∠A + ∠B + ∠ACB = ∠ACD + ∠ACB
दोनों ओर से ∠ACB हटाइए —
∠ACD = ∠A + ∠B
ऐसा क्यों होता है: दोनों व्यंजक एक ही 180° का वर्णन करते हैं — एक बार त्रिभुज के भीतर से और एक बार सरल रेखा के अनुदिश। ∠ACB दोनों में उभयनिष्ठ है, अत: उसे हटाते ही बहिष्कोण का गुण बच जाता है: त्रिभुज का बहिष्कोण अपने दोनों दूरस्थ अंत:कोणों के योग के बराबर होता है।
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