गणित प्रकाश अध्याय 8 पाठ्य प्रश्न

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
12 ÷ 4 क्या है? यह आप पहले से ही जानते हैं। परंतु क्या इस समस्या को गुणन समस्या के रूप में पुनः व्यक्त किया जा सकता है? 4 को किससे गुणा किया जाए कि 12 प्राप्त हो?
उत्तर

12 ÷ 4 = 3, और यही तथ्य उलट कर भी लिखा जा सकता है।

12 ÷ 4 = 3
अर्थात   4 × ? = 12
4 × 3 = 12 ✔
यह क्यों महत्वपूर्ण है: हर विभाजन वस्तुत: “लुप्त गुणनखंड” का प्रश्न है। ÷ को × में बदल लेने से भिन्नों का विभाजन बिना कोई नई विधि गढ़े हो जाता है।
प्र2.
1 ÷ 23 क्या है?
उत्तर

प्रश्न यह बनाइए — 23 को किससे गुणा करें कि 1 मिले?

2/3 × ? = 1
2/3 को उलट दीजिए: 2/3 × 3/2 = 6/6 = 1 ✔
अत: 1 ÷ 2/3 = 3/2
संकेत: 32 को 23 का व्युत्क्रम कहते हैं। कोई भी भिन्न अपने व्युत्क्रम से गुणा करने पर सदैव 1 देती है।
प्र3.
आइए, एक अन्य समस्या हल करें — 3 ÷ 23। यह 23 × ? = 3 के समान है। क्या आप उत्तर ज्ञात कर सकते हैं?
उत्तर

हम जानते हैं कि 23 को 1 कैसे बनाया जाए — अब उसे तिगुना कर दीजिए।

2/3 × 3/2 = 1
2/3 × (3/2 × 3) = 3
अत: 3 ÷ 2/3 = 3/2 × 3
= 9/2 = 4 1/2
उत्तर 3 से बड़ा क्यों है: आप पूछ रहे हैं कि 3 में कितने दो-तिहाई समाते हैं। हर टुकड़ा 1 से छोटा है, इसलिए 3 से अधिक टुकड़े समाएँगे — साढ़े चार।
प्र4.
15 ÷ 12 क्या है?
उत्तर

गुणन के रूप में लिखिए और भाजक के व्युत्क्रम का उपयोग कीजिए।

1/2 × ? = 1/5
1/2 × 2 = 1, अत: 1/2 × (2 × 1/5) = 1/5
1/5 ÷ 1/2 = 2 × 1/5
= 2/5
स्वयं जाँचिए: 25 × 12 = 210 = 15
प्र5.
23 ÷ 35 क्या होगा?
उत्तर

भाजक 35 का व्युत्क्रम 53 है।

3/5 × ? = 2/3
3/5 × 5/3 = 1, अत: 3/5 × (5/3 × 2/3) = 2/3
2/3 ÷ 3/5 = 5/3 × 2/3
= 10/9 = 1 1/9
स्वयं जाँचिए: 109 × 35 = 3045 = 23
प्र6.
उपरोक्त विभाजन की प्रत्येक समस्या में हमने उत्तर कैसे पाया इसका अवलोकन कीजिए। दो भिन्नों का विभाजन कैसे किया जाता है क्या इसके लिए हम एक नियम बना सकते हैं?
उत्तर

हाँ — हर बार दो चरण।

  1. भाजक का व्युत्क्रम ज्ञात कीजिए (भिन्न को उलट दीजिए)।
  2. भाज्य को उस व्युत्क्रम से गुणा कीजिए।
ab ÷ cd = ab × dc = (a × d)/(b × c)
विभाजनभाजक का व्युत्क्रमभागफल
1 ÷ 2/33/23/2
3 ÷ 2/33/29/2
1/5 ÷ 1/22/12/5
2/3 ÷ 3/55/310/9
क्या आप जानते हैं? यह नियम सामान्य रूप में सर्वप्रथम ब्रह्मगुप्त ने ब्रह्मस्फुट-सिद्धांत (628 सामान्य संवत्) में बताया था, और भास्कर द्वितीय ने लीलावती (1150 सामान्य संवत्) में इसे व्युत्क्रम की धारणा से स्पष्ट किया।
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