मल्हार अध्याय 1 आपकी बात

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) “सुन, उपवन में बड़े सबेरे, / तात भ्रमण करते थे तेरे,” — आप या आपके परिजन भ्रमण के लिए कहाँ-कहाँ जाते हैं? और क्यों?
उत्तर

यह आपके अपने अनुभव का प्रश्न है। उत्तर में स्थान और कारण दोनों लिखिए।

अच्छे उत्तर में क्या होना चाहिए:

  • जगह का नाम (पार्क, नदी का किनारा, खेत, छत, विद्यालय का मैदान, मंदिर या गुरुद्वारे का रास्ता);
  • कब जाते हैं — सबेरे, शाम, रविवार को;
  • किसके साथ जाते हैं;
  • क्यों जाते हैं — स्वास्थ्य, ताज़ी हवा, बातचीत, पक्षी देखना, मन का हल्का होना।
नमूना उत्तर: मेरे दादाजी हर सबेरे मुहल्ले के पार्क में टहलने जाते हैं और छुट्टी वाले दिन मुझे भी साथ ले जाते हैं। हम सूरज निकलने से पहले पहुँच जाते हैं, जब घास पर ओस की बूँदें चमक रही होती हैं — ठीक वैसे ही जैसे कविता में “झलमल कर हिम-बिंदु झिले थे”। वहाँ हम पीपल के पेड़ के नीचे बैठकर तोतों और गिलहरियों को देखते हैं। दादाजी कहते हैं कि सबेरे की हवा दवा से भी अच्छी होती है। गर्मियों की छुट्टियों में हम गाँव जाते हैं, जहाँ नहर के किनारे-किनारे बहुत दूर तक चलते हैं। मुझे भ्रमण इसलिए अच्छा लगता है क्योंकि उस समय घर की भाग-दौड़ नहीं होती और दादाजी से खूब बातें हो जाती हैं।
प्र2.
(ख) इस पाठ में एक माँ अपने पुत्र को कहानी सुना रही है। आप किस-किस से कहानी सुनते हैं या थे? आप किसको और कौन-सी कहानी सुनाते हैं?
उत्तर

इसमें दो बातें अलग-अलग बताइए — (1) आप किससे सुनते हैं और (2) आप किसे सुनाते हैं

अच्छे उत्तर में क्या होना चाहिए:

  • सुनाने वालों के नाम/रिश्ते — दादी, नानी, माँ, पिता, बड़ी बहन, शिक्षक, पड़ोसी;
  • किस प्रकार की कहानियाँ — लोककथाएँ, पंचतंत्र, अकबर-बीरबल, भूत-प्रेत की, अपने परिवार की सच्ची कहानियाँ;
  • आप किसे सुनाते हैं — छोटे भाई-बहन, मित्र, कक्षा;
  • कोई एक कहानी का नाम और उसमें आपको जो अच्छा लगता है।
नमूना उत्तर: सबसे अधिक कहानियाँ मैंने अपनी दादी से सुनी हैं। रात को खाना खाने के बाद वे चारपाई पर बैठकर पंचतंत्र की कहानियाँ सुनाती हैं — “एकता में बल”, “चतुर खरगोश और शेर” जैसी। मेरी माँ हमें अपने बचपन की सच्ची कहानियाँ सुनाती हैं कि वे कैसे नदी पार करके स्कूल जाती थीं। विद्यालय में हमारे हिंदी शिक्षक कभी-कभी बीरबल की कहानियाँ सुनाते हैं।

मैं अपनी छोटी बहन को सोते समय कहानी सुनाता हूँ। उसे “प्यासा कौआ” और “खरगोश और कछुआ” सबसे प्रिय हैं, पर सबसे अधिक बार मैंने उसे यही कहानी सुनाई है — घायल हंस और उसे बचाने वाले राजकुमार की। अंत में मैं भी माँ की तरह रुककर उससे पूछता हूँ — “अब तू बता, हंस किसका?”
प्र3.
(ग) माँ ने कहानी सुनाने के बीच में एक प्रश्न पूछ लिया था। क्या कहानी सुनाने के बीच में प्रश्न पूछना सही है? क्यों?
उत्तर

हाँ, प्रश्न पूछना सही है — बशर्ते वह कहानी की धारा तोड़े नहीं, बल्कि उसे आगे बढ़ाए।

प्रश्न पूछने से लाभकब सावधानी चाहिए
सुनने वाला जागता और सोचता रहता है — वह केवल श्रोता नहीं, भागीदार बन जाता है।यदि हर दो पंक्ति पर प्रश्न पूछा जाए तो कहानी का प्रवाह और रस टूट जाता है।
पता चल जाता है कि सुनने वाला कहानी समझ रहा है या नहीं।ऐसा प्रश्न न हो जिससे आगे की कहानी पहले ही खुल जाए।
सुनने वाले की अपनी राय बनती है — जैसे राहुल का निर्णय।प्रश्न परीक्षा जैसा न लगे, वरना डर पैदा होता है।
कहानी याद रह जाती है, क्योंकि उसमें सुनने वाले का अपना उत्तर जुड़ जाता है।सबसे अच्छा समय — जब कहानी किसी मोड़ पर आकर रुके।
कविता से प्रमाण: माँ ने प्रश्न ठीक उस जगह पूछा जहाँ कहानी अपने सबसे बड़े मोड़ पर थी — मामला न्यायालय पहुँच चुका था। उसने पूछा — “न्याय पक्ष लेता है किसका?” यदि वह स्वयं उत्तर दे देती तो राहुल केवल सुनता रह जाता; प्रश्न के कारण वह सोचने वाला बन गया और कविता का अंत उसी के शब्दों में हुआ।
प्र4.
(घ) कविता में बालक अपनी माँ से बार-बार ‘वही’ कहानी सुनने की हठ करता है। क्या आपका भी कभी कोई कहानी बार-बार सुनने का मन करता है? अगर हाँ, तो वह कौन-सी कहानी है और क्यों?
उत्तर

यह आपके अपने मन की बात है। उत्तर में कहानी का नाम, कौन सुनाता है और बार-बार क्यों अच्छी लगती है — तीनों लिखिए।

कारण ऐसे हो सकते हैं:

  • उस कहानी का कोई पात्र बहुत प्रिय है;
  • सुनाने वाले की आवाज़ और अंदाज़ अच्छा लगता है;
  • हर बार कोई नई बात समझ में आती है;
  • कहानी सुनते समय अपनापन और सुरक्षा का भाव मिलता है;
  • अंत जानते हुए भी उसे सुनने में मज़ा आता है — जैसे कोई प्रिय गीत बार-बार सुनना।
नमूना उत्तर: हाँ, मुझे भी एक कहानी बार-बार सुनने का मन करता है — दादी वाली “चिड़िया और उसके तीन बच्चों” की कहानी। मुझे उसका अंत पहले से याद है, फिर भी हर बार वही जगह आते ही मेरा दिल धड़कने लगता है जहाँ चिड़िया अपने बच्चों को बचाने के लिए बहेलिये से भिड़ जाती है। मुझे यह कहानी इसलिए भी अच्छी लगती है क्योंकि दादी हर बार उसमें एक छोटी-सी नई बात जोड़ देती हैं — कभी बहेलिये का नाम, कभी बच्चों की बातचीत। और सच कहूँ तो मुझे कहानी से ज़्यादा वह समय अच्छा लगता है जब दादी मुझे पास बिठाकर सुनाती हैं — ठीक वैसे ही जैसे राहुल को अपनी माँ के पास लेटे-लेटे कहानी सुनना अच्छा लगता था।
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