मल्हार अध्याय 1 निर्णय करें

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
“राहुल, तू निर्णय कर इसका–” नीचे कुछ स्थितियाँ दी गई हैं। बताइए कि इन स्थितियों में आप क्या करेंगे? 1. खेलते समय आप देखते हैं कि एक मित्र ने भूल से एक नियम तोड़ा है।
उत्तर

मैं खेल रोककर शांति से उसे बता दूँगा कि यह नियम इस तरह होता है — क्योंकि उसने जान-बूझकर नहीं, भूल से तोड़ा है।

  • पहले यह देखूँगा कि सचमुच नियम टूटा है या मुझे भ्रम हुआ;
  • सबके सामने चिल्लाकर या ताना देकर नहीं, बल्कि पास जाकर कहूँगा — “यार, यह चाल नियम के विरुद्ध है, फिर से कर लो”;
  • यदि विवाद हो तो दोनों टीमों के साथ मिलकर नियम एक बार दोहरा लेंगे;
  • खेल फिर से उसी जगह से शुरू करेंगे।
क्यों: भूल और बेईमानी दो अलग बातें हैं। भूल पर दंड नहीं, सुधार चाहिए। और नियम की याद दिलाना दोस्ती तोड़ना नहीं, खेल को बचाना है।
प्र2.
2. एक सहपाठी को कक्षा में दूसरों द्वारा चिढ़ाया जा रहा है।
उत्तर

मैं चुप नहीं रहूँगा। जो चिढ़ाते समय चुपचाप देखता रहता है, वह भी अनजाने में चिढ़ाने वालों का साथ दे देता है।

  • चिढ़ाने वालों से दृढ़ता से कहूँगा — “बस करो, इसे बुरा लग रहा है।”
  • उस सहपाठी के पास जाकर बैठूँगा, उससे बात करूँगा और उसे अपने समूह में शामिल करूँगा;
  • यदि बात न रुके तो शिक्षक को बताऊँगा — यह चुगली नहीं, सहायता है;
  • बाद में उस साथी से अकेले में पूछूँगा कि वह ठीक है या नहीं।
कविता से जोड़िए: बालक राहुल कहता है — “कोई निरपराध को मारे, तो क्यों अन्य उसे न उबारे?” चिढ़ाया जा रहा सहपाठी भी निरपराध है, और उसे ‘उबारना’ हमारा काम है।
प्र3.
3. एक समूह परियोजना के बीच एक सहपाठी अपने भाग का कार्य नहीं कर रहा है।
उत्तर

पहले कारण पूछूँगा, फिर हल निकालूँगा — शिकायत सबसे आख़िरी कदम होगा।

  1. अकेले में पूछूँगा — “कोई परेशानी है क्या? समझ नहीं आ रहा या समय नहीं मिल पा रहा?”
  2. यदि काम कठिन लग रहा है तो उसका भाग छोटा-छोटा बाँट दूँगा या किसी और के साथ जोड़ दूँगा;
  3. समूह में काम की एक सूची और तारीख़ बना लेंगे, ताकि सबको अपना हिस्सा साफ़ दिखे;
  4. फिर भी वह न करे तो पूरी बात शिक्षक को बताऊँगा — पर उसे नीचा दिखाने के लिए नहीं, परियोजना पूरी करने के लिए।
ध्यान रखिए: उसका काम चुपचाप स्वयं कर देना सबसे आसान लगता है, पर इससे न परियोजना का उद्देश्य पूरा होता है और न वह सीख पाता है।
प्र4.
4. आपके दो मित्रों के बीच एक छोटी-सी बात पर तर्क-वितर्क हो रहा है।
उत्तर

मैं बीच-बचाव करूँगा, पर किसी एक का पक्ष लेकर नहीं।

  • दोनों को अलग-अलग पूरी बात कहने दूँगा — बिना बीच में टोके;
  • फिर दोनों की बात दोहराकर पूछूँगा — “तुम्हारा मतलब यही है न?” अक्सर आधा झगड़ा ग़लतफ़हमी का होता है;
  • याद दिलाऊँगा कि बात कितनी छोटी है और दोस्ती कितनी बड़ी;
  • ज़रूरत हो तो कोई बीच का रास्ता सुझाऊँगा और दोनों को एक काम में साथ लगा दूँगा।
कविता से जोड़िए: “उभय आग्रही थे स्वविषय में” — दोनों अपनी-अपनी बात पर अड़ जाएँ तो झगड़ा बढ़ता ही है। कहानी में हल तब निकला जब मामला किसी तीसरे निष्पक्ष के सामने रखा गया।
प्र5.
5. एक सहपाठी को कुछ ऐसा करने के लिए अनुचित रूप से दंडित किया जा रहा है जिसे उसने नहीं किया।
उत्तर

यह सीधे-सीधे अन्याय है, इसलिए मैं निडर होकर सच बताऊँगा — जैसे माँ ने कहा था, “कह दे निर्भय, जय हो जिसका।”

  • विनम्रता से शिक्षक से कहूँगा — “क्षमा कीजिए, मैंने देखा था, यह काम इसने नहीं किया।”
  • जो सचमुच हुआ था, वह पूरा और सच-सच बताऊँगा — बिना किसी को बचाए और बिना किसी को फँसाए;
  • यदि और साथी गवाह हों तो उन्हें भी बोलने के लिए कहूँगा;
  • बाद में उस सहपाठी के पास जाकर उसका मन हल्का करूँगा।
क्यों ज़रूरी है: निरपराध को दंड मिलना दोहरा नुकसान है — बेकसूर को पीड़ा मिलती है और असली दोषी बच जाता है। सच कहने में थोड़ी हिम्मत लगती है, पर यही राहुल वाला काम है।
प्र6.
6. एक सहपाठी प्रतियोगिता में हार जाने पर उदास है।
उत्तर

मैं उसके पास जाकर बैठूँगा। इस समय उसे उपदेश नहीं, साथ चाहिए।

  • “कोई बात नहीं” कहकर उसकी बात टालूँगा नहीं — पहले उसे बोलने दूँगा;
  • उसने जो अच्छा किया, वह विशेष रूप से बताऊँगा — “तुम्हारा तीसरा उत्तर तो सबसे अच्छा था”;
  • याद दिलाऊँगा कि इस बार भाग लेना ही बड़ी बात थी, और अगली बार का अभ्यास हम साथ करेंगे;
  • थोड़ी देर बाद उसे खेल या किसी और काम में साथ ले लूँगा, ताकि मन बदले।
क्या न करें: “मैंने तो पहले ही कहा था”, “तुमने मेहनत ही नहीं की” — ऐसे वाक्य हारे हुए मन को और तोड़ते हैं।
प्र7.
7. कक्षा में चर्चा के बीच एक सहपाठी संकोच कर रहा है और बोलने का अवसर नहीं पा रहा है।
उत्तर

मैं उसे अवसर दिलाऊँगा — क्योंकि चर्चा तभी अच्छी होती है जब सब बोलें।

  • अपनी बात छोटी रखकर कहूँगा — “मुझे लगता है इस पर रोहन कुछ कहना चाह रहा है”;
  • उसने पहले जो अच्छा विचार बताया हो, उसका नाम लेकर उल्लेख करूँगा, इससे उसका आत्मविश्वास बढ़ेगा;
  • यदि वह संकोच में हो तो पहले छोटे समूह में उसकी बात सुनूँगा, फिर पूरी कक्षा के सामने कहने को कहूँगा;
  • वह बोले तो बीच में न टोकूँ और ध्यान से सुनूँ।
क्यों: बहुत बार सबसे अच्छा विचार उसी के पास होता है जो सबसे कम बोलता है। उसे अवसर देना भी एक तरह का न्याय है।
प्र8.
8. सहपाठी किसी विषय में संघर्ष कर रहा है और आपसे सहायता माँगता है।
उत्तर

मैं सहायता अवश्य करूँगा, पर इस तरह कि वह स्वयं करना सीख जाए — केवल उत्तर लिखवा देना सहायता नहीं है।

  1. पहले पूछूँगा कि कठिनाई ठीक कहाँ है — पूरा अध्याय या कोई एक बिंदु;
  2. उस बिंदु को सरल भाषा और उदाहरण से समझाऊँगा;
  3. फिर एक प्रश्न उसे स्वयं करने दूँगा और केवल जाँचूँगा;
  4. अपने पास जो नोट्स या तरीका है, वह साझा करूँगा;
  5. यदि विषय मुझे भी कठिन लगे तो हम दोनों मिलकर शिक्षक से पूछेंगे।
याद रखिए: सहायता माँगना कमज़ोरी नहीं है। जो मित्र आपसे पूछता है, वह आप पर भरोसा करता है — उसका मज़ाक कभी न बनाइए।
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