प्र1.
“मीरा के प्रभु संतन सुखदाई” / “मीरा के प्रभु गिरधरनागर” — इन दोनों पंक्तियों पर ध्यान दीजिए। इन पंक्तियों में मीरा ने अपने नाम का उल्लेख किया है। मीरा के समय के अनेक कवि अपनी रचना के अंत में अपने नाम को सम्मिलित कर दिया करते थे। आज भी कुछ कवि अपना नाम कविता में जोड़ देते हैं। आप ध्यान देंगे तो इस कविता में आपको ऐसी अनेक विशेषताएँ दिखाई देंगी। (जैसे— कविता में छोटी-छोटी पंक्तियाँ हैं। श्रीकृष्ण के लिए अलग-अलग नामों का प्रयोग किया गया है आदि।) (क) इस पाठ को एक बार फिर से पढ़िए और अपने-अपने समूह में मिलकर इस पाठ की विशेषताओं की सूची बनाइए।
उत्तर
ध्यान से पढ़ने पर इस पाठ की ये विशेषताएँ मिलती हैं —
| विशेषता | पाठ से उदाहरण |
|---|---|
| अंत में कवयित्री का नाम (छाप/भणिता) | “मीरा के प्रभु संतन सुखदाई”, “मीरा के प्रभु गिरधरनागर” |
| छोटी-छोटी पंक्तियाँ — हर पद पाँच पंक्तियों का | दोनों पद पाँच-पाँच पंक्तियों के हैं |
| श्रीकृष्ण के लिए अनेक नाम | नंदलाल, गोपाल, हरि, गिरधरनागर, प्रभु |
| गाए जाने योग्य लय — हर पंक्ति के अंत में एक ही तुक | पहले पद में — नंदलाल, विशाल, माल, रसाल, गोपाल; दूसरे पद में — सावन की, भावन की, आवन की, लावन की, सोहावन की, गावन की |
| टेक (स्थायी) पंक्ति — जो बार-बार दोहराई जा सकती है | “बसो मेरे नैनन में नंदलाल”, “बरसे बदरिया सावन की” |
| ब्रज-राजस्थानी मिश्रित भाषा | नैनन, मूरति, साँवरि, सोभित, बदरिया, मनवा, आवन, दिश, मेहा |
| अनुप्रास — एक ही वर्ण की आवृत्ति | “बरसे बदरिया”, “मोहनि मूरति”, “साँवरि सूरति”, “दामिन दम” |
| पुनरुक्ति | “नन्हीं नन्हीं”, “सावन की, सावन की”, “उमड़ घुमड़” |
| ऊपर से नीचे की ओर रूप-वर्णन | सूरत → नैन → अधर → उर → कटितट → नूपुर |
| सीधी प्रार्थना, बीच में कोई कथा नहीं | “बसो मेरे नैनन में…” — पहली ही पंक्ति में निवेदन |
| दृश्य और ध्वनि दोनों का चित्रण | दृश्य — साँवरि सूरति, दामिन; ध्वनि — मुरली, नूपुर शब्द, भनक |
जानने योग्य: रचना के अंत में कवि द्वारा अपना नाम जोड़ने को छाप या भणिता कहते हैं। कबीर ‘कहत कबीर’, सूरदास ‘सूरदास प्रभु’ और तुलसीदास ‘तुलसीदास’ लिखते थे। उस समय रचनाएँ छपती नहीं थीं, गाकर आगे बढ़ती थीं — नाम जुड़ा रहने से यह पता चलता रहता था कि पद किसका है।