मल्हार अध्याय 10 मधुर ध्वनियाँ

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
“अधर सुधा रस मुरली राजति, उर वैजंती माल॥ क्षुद्र घंटिका कटितट सोभित, नूपुर शब्द रसाल॥” इन पंक्तियों में तीन ऐसी वस्तुओं के नाम आए हैं, जिनसे मधुर ध्वनियाँ उत्पन्न होती हैं। उन वस्तुओं के नाम पहचानिए और उनके नीचे रेखा खींचिए।
उत्तर

वे तीन वस्तुएँ हैं — मुरली, क्षुद्र घंटिका और नूपुर। पुस्तक में इन्हीं तीन शब्दों के नीचे रेखा खींचिए।

वस्तुक्या हैकैसी ध्वनिपद का प्रमाण
मुरलीबाँसुरी — बाँस का फूँककर बजने वाला वाद्यसुरीली, लंबी तान“अधर सुधा रस मुरली राजति” — होंठों से अमृत जैसा रस बरसाती है
क्षुद्र घंटिकाकमर में बँधी छोटी-छोटी घंटियाँछन-छन, हिलने पर बजने वालीक्षुद्र घंटिका कटितट सोभित”
नूपुरपैरों का घुँघरूदार गहना, पायलरुनझुन — मीठी, चलने पर बजने वालीनूपुर शब्द रसाल” — ‘शब्द’ यानी आवाज़, ‘रसाल’ यानी मीठी
‘वैजंती माल’ क्यों नहीं: माला भी श्रीकृष्ण पर सजी है, पर वह बजती नहीं — उससे कोई ध्वनि नहीं निकलती। इसलिए वह इन तीन में नहीं गिनी जाएगी।
ध्यान दीजिए: मीरा ने केवल श्रीकृष्ण का चित्र नहीं खींचा, उनकी आवाज़ भी सुना दी है — मुरली की तान, घंटियों की छनक और नूपुर की रुनझुन। इसीलिए यह पद पढ़ते हुए दृश्य के साथ संगीत भी सुनाई देने लगता है।
प्र2.
आगे मधुर ध्वनियाँ उत्पन्न करने वाले कुछ वाद्ययंत्रों के विषय में पहेलियाँ दी गई हैं। इन्हें पहचानकर सही चित्रों के साथ रेखा खींचकर मिलाइए— (1) हवा से बोलती है, सुर में गीत सुनाती है, होठों से छू जाए, तो मन को लुभाती है। (2) दो साथियों का जोड़ा, हाथों से है बजता, ताल मिलाए ताल से, हर संगत में सजता। (3) शाहों में शामिल होती, फूँकों से संगीत सुनाती, सुख के सारे काम सजाती, दुख में भी ये साथ निभाती। (4) तारों में छिपा संगीत, माँ सरस्वती का गहना, छेड़े जब अँगुलियाँ, बहे रागों का झरना। (5) दो हाथों से बजती है ये, ताल से थिरकें पैर, हर उत्सव की है ये साथी, लटक गले ये करती सैर। (6) नागिन-सी लहराती है जो, बड़ी खास आवाज है जिसकी, तीन, चीन, रंगीन, हीन से मिली-जुली पहचान है इसकी। (7) सौ तारों का जादू, डंडियों से जो गाए, कश्मीर की वादियों जैसा मधुर संगीत लाए। (8) छोटा-सा यंत्र है, हाथों से बजता जाए, घर-मंदिर का साथी, झंकार से मन बहलाए।
उत्तर

आठों पहेलियों के उत्तर और उनसे जुड़े चित्र —

पहेलीउत्तरपहचान का सूत्रप्रकार
1. हवा से बोलती है… होठों से छू जाएबाँसुरीफूँक (हवा) से बजती है और होंठों से लगाई जाती हैसुषिर (फूँक वाला)
2. दो साथियों का जोड़ा… हर संगत में सजतातबलातबला-डग्गा की जोड़ी; हर गायन-नृत्य की संगत में रहता हैअवनद्ध (चमड़े वाला)
3. शाहों में शामिल होती, फूँकों से संगीत सुनातीशहनाईराज-दरबारों और मंगल अवसरों (विवाह) पर बजती है; फूँक से बजती हैसुषिर
4. तारों में छिपा संगीत, माँ सरस्वती का गहनावीणामाँ सरस्वती के हाथ में वीणा ही रहती है; तार अँगुलियों से छेड़े जाते हैंतत (तार वाला)
5. दो हाथों से बजती… लटक गले ये करती सैरढोलकदोनों सिरों पर चमड़ा, दोनों हाथों से बजती; गले में लटकाकर चलते-चलते भी बजाई जाती हैअवनद्ध
6. नागिन-सी लहराती… तीन, चीन, रंगीन, हीनबीनसपेरे की बीन; ‘तीन, चीन, रंगीन, हीन’ — इन सबसे तुक मिलाने वाला शब्द बीन ही हैसुषिर
7. सौ तारों का जादू, डंडियों से जो गाए… कश्मीरसंतूरलगभग सौ तार, दो छोटी लकड़ी की डंडियों (कलम) से बजता, कश्मीर का प्रसिद्ध वाद्यतत
8. छोटा-सा यंत्र… घर-मंदिर का साथी, झंकारमजीराधातु की दो छोटी कटोरियाँ, भजन-कीर्तन में ताल देती हैंघन (ठोस धातु वाला)
चित्रों से मिलाने का तरीका: पुस्तक के चित्र इसी क्रम में नहीं हैं। पहले वाद्य का प्रकार देखिए — बाँसुरी और शहनाई फूँक से बजते हैं (लंबी नली), तबला और ढोलक पर चमड़ा मढ़ा है, वीणा और संतूर में तार दिखेंगे, मजीरा दो छोटी कटोरियों जैसा है और बीन में एक तूँबा (लौकी जैसा गोल भाग) साफ़ दिखता है।
पद से जोड़िए: पहेली (1) की बाँसुरी वही ‘मुरली’ है जो पहले पद में श्रीकृष्ण के अधरों पर सजी है, और (8) का मजीरा वही वाद्य है जिसे लेकर मीरा जैसे संत भजन गाते थे।
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