मल्हार अध्याय 3 अनुमान और कल्पना से

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
अपने समूह में मिलकर चर्चा कीजिए — (क) कल्पना कीजिए कि चाँदनी, हवा और मेघ केवल एक पौधे पर बरसते हैं। बाकी पौधे इन सबके बिना कैसे दिखेंगे और उनके जीवन पर इसका क्या प्रभाव होगा?
उत्तर

यदि प्रकृति भेदभाव करने लगे तो केवल एक पौधा हरा-भरा रहेगा और शेष सारे पौधे मुरझा जाएँगे।

बाकी पौधे कैसे दिखेंगे —

  • पत्ते पीले पड़कर सूखने और झड़ने लगेंगे; टहनियाँ भूरी और भंगुर हो जाएँगी।
  • न कोई कली फूटेगी, न फूल खिलेंगे, न फल लगेंगे।
  • जड़ें सूखी मिट्टी में सिकुड़ जाएँगी और पौधे झुककर गिर पड़ेंगे।

उनके जीवन पर प्रभाव —

किसके बिनाक्या होगा
मेघ (वर्षा) के बिनाजल न मिलने से पौधा भोजन नहीं बना पाएगा और सूख जाएगा।
हवा के बिनासाँस लेने और भोजन बनाने की क्रिया रुक जाएगी; परागण न होने से बीज नहीं बनेंगे।
चाँदनी और चाँद के बिनारात-दिन का चक्र बिगड़ जाएगा; फूलों का खिलना-मुरझाना अस्त-व्यस्त हो जाएगा।

इसका असर केवल पौधों तक नहीं रुकेगा। तितलियाँ और भौंरे भूखे रह जाएँगे, पक्षियों के घोंसले उजड़ जाएँगे, और अंत में मनुष्य को भी अनाज, फल और छाया नहीं मिलेगी।

इससे कविता का क्या संबंध है: कविता की नींव ही यह है कि प्रकृति सबको बराबर देती है। यह कल्पना उलटी दिशा से वही बात सिद्ध करती है — यदि देना बराबर न हो, तो फिर किसी के अच्छे-बुरे होने का दोष उसका अपना नहीं रह जाएगा, परिस्थिति का हो जाएगा।
नमूना उत्तर (एक वाक्य में): “सूरज, पानी और हवा किसी एक की जागीर नहीं हैं; ये सबके हैं — तभी तो हर पौधे को अपने ढंग से बढ़ने का पूरा अवसर मिलता है।”
प्र2.
(ख) यदि सभी पौधे एक जैसे होते तो दुनिया कैसी लगती?
उत्तर

यदि सभी पौधे एक जैसे होते तो दुनिया देखने में नीरस और उबाऊ लगती, और जीवन के लिए बहुत कठिन भी हो जाती।

  • सुंदरता समाप्त हो जाती — न गुलाब का लाल रंग, न गेंदे का पीला, न चंपा की महक। हर ओर एक ही आकार, एक ही रंग।
  • भोजन की विविधता चली जाती — गेहूँ, चावल, आम, नीबू, हल्दी, तुलसी — सब एक ही चीज़ में बदल जाते। स्वाद और पोषण दोनों घट जाते।
  • औषधियाँ न मिलतीं — नीम, गिलोय, अश्वगंधा जैसे अलग-अलग गुण वाले पौधे न होते तो अनेक रोगों का इलाज ही न होता।
  • पर्यावरण असुरक्षित हो जाता — कोई एक रोग या कीड़ा फैलता तो सारे पौधे एक साथ नष्ट हो जाते, क्योंकि सबकी कमज़ोरी एक ही होती।
  • जीव-जंतु भी घट जाते — हर तितली, भौंरे और पक्षी का भोजन और घर अलग-अलग पौधों से जुड़ा है।
असली बात: जिसे हम ‘अंतर’ कहकर कभी-कभी बुरा मान लेते हैं, वही अंतर संसार को सुंदर और सुरक्षित बनाता है। यही बात मनुष्यों पर भी लागू होती है — सब एक जैसा सोचने लगें तो न कोई नया विचार आए, न कोई नई खोज हो।
प्र3.
(ग) यदि काँटे न होते और हर पौधा केवल फूलों से भरा होता तो क्या होता?
उत्तर

पहली नज़र में यह बात सुंदर लगती है, पर सोचने पर पता चलता है कि इसमें कई हानियाँ भी हैं।

अच्छा क्या होताकठिनाई क्या होती
हर ओर रंग और सुगंध होती; फूल तोड़ते समय किसी की उँगली न छिदती।पौधों की रक्षा समाप्त हो जाती — बकरी, ऊँट और अन्य पशु सारे पौधे चर जाते।
बगीचों और खेतों में काम करना आसान हो जाता।रेगिस्तान के नागफनी जैसे पौधे जीवित ही न रह पाते, क्योंकि उनके काँटे ही पानी बचाने और धूप से बचने का साधन हैं।
बच्चे बेखटके पौधों के बीच खेल सकते।बेर, बबूल, करौंदा और नीबू जैसे उपयोगी पेड़ बिना सुरक्षा के जल्दी नष्ट हो जाते।

इसके अलावा, यदि केवल फूल ही फूल होते तो हमें फूल की क़ीमत भी न पता चलती। काँटा है, इसीलिए फूल की कोमलता विशेष लगती है।

दूसरा पक्ष भी सुनिए: कविता काँटे को चुभने वाला बताती है, पर वनस्पति-विज्ञान बताता है कि काँटा असल में पौधे का रक्षा-कवच है। इसलिए इस प्रश्न का कोई एक ‘सही’ उत्तर नहीं है — जो उत्तर कारण के साथ दिया जाए, वही अच्छा उत्तर है।
प्र4.
(घ) कल्पना कीजिए कि एक तितली काँटे से मित्रता करना चाहती है, उनके बीच कैसा संवाद होगा?
उत्तर

ऐसे संवाद में दो बातें होनी चाहिए — तितली का डर और काँटे की सफ़ाई, और अंत में कोई ऐसी बात जिस पर दोनों सहमत हो जाएँ।

नमूना उत्तर —

कौनक्या कहता है
तितलीकाँटे भैया, नमस्ते! मैं रोज़ इस पौधे पर आती हूँ, पर आपसे कभी बात नहीं की।
काँटाबात कौन करता है मुझसे? सब कहते हैं — काँटा है, दूर रहो।
तितलीसच कहूँ तो मुझे भी डर लगता है। सुना है आप तितलियों के पंख कतर देते हैं।
काँटामैं किसी को ढूँढ़कर नहीं चुभता, बहन। मैं तो एक जगह खड़ा रहता हूँ। जो पास से टकराता है, उसे चोट लग जाती है। मेरा काम इस पौधे को बकरियों से बचाना है।
तितलीअरे! यह तो मैंने कभी सोचा ही नहीं। यानी जिस फूल का रस मैं पीती हूँ, वह आपके कारण ही बचा हुआ है?
काँटाहाँ, पर श्रेय हमेशा फूल को मिलता है। मुझे इसका दुख नहीं — बस कोई समझ ले तो अच्छा लगता है।
तितलीतो आज से हम मित्र। मैं आपसे थोड़ा दूर बैठा करूँगी, पर बात रोज़ करूँगी।
काँटायही सच्ची मित्रता है — पास आकर चोट खाने से अच्छा है, दूर रहकर एक-दूसरे को समझना।
लिखते समय ध्यान रखें: संवाद में हर पात्र की भाषा उसके स्वभाव जैसी हो — तितली की बात हल्की और चंचल, काँटे की बात संक्षिप्त और गंभीर। संवाद के आगे नाम और डैश (—) लगाना न भूलें।
प्र5.
(ङ) कल्पना कीजिए कि आपको किसी काँटे, फूल या दोनों के गुणों के साथ जीवन जीने का अवसर मिलता है। आप किसके गुणों को अपनाना चाहेंगे? कारण सहित बताइए।
उत्तर

यह आपकी अपनी राय का प्रश्न है, इसलिए तीनों में से कोई भी उत्तर सही है — शर्त यह है कि कारण स्पष्ट हो। अच्छे उत्तर में तीन बातें होनी चाहिए: (1) आपका चुनाव, (2) उस चुनाव के दो-तीन ठोस कारण, (3) एक उदाहरण।

नमूना उत्तर (दोनों के गुण चुनते हुए) — मैं दोनों के गुण अपनाना चाहूँगा/चाहूँगी। फूल से मैं यह सीखना चाहता हूँ कि दूसरों के काम आना, मीठा बोलना और बिना जताए देना कितना सुंदर होता है — जैसे फूल तितली को गोद देता है और भौंरे को रस पिलाता है। पर केवल कोमल होना पर्याप्त नहीं है। काँटे से मैं यह सीखना चाहता हूँ कि जब कोई ग़लत बात हो, तब डटकर खड़े रहना और अपनी तथा अपने साथियों की रक्षा करना भी ज़रूरी है। जैसे कक्षा में यदि कोई छोटे बच्चे को चिढ़ा रहा हो, तो चुप रहना कोमलता नहीं, कमज़ोरी है। इसलिए मैं फूल-सा स्वभाव और काँटे-सा साहस — दोनों साथ रखना चाहूँगा।

यदि आप चुनेंतो ये कारण दे सकते हैं
केवल फूलसबको सुख देना, सम्मान पाना, दूसरों के जीवन में सुगंध भरना; “सोहता सुर शीश पर”।
केवल काँटाअपनी और दूसरों की रक्षा करना, कठिन परिस्थिति में टिके रहना, सूखे में भी जीवित रहना।
दोनोंव्यवहार में कोमलता और सिद्धांत में दृढ़ता — जीवन के लिए दोनों चाहिए।
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