इस पंक्ति का अर्थ है — जिस व्यक्ति में स्वयं बड़प्पन की कमी हो, उसके ख़ानदान का बड़ा नाम उसके किसी काम नहीं आता।
उदाहरण 1 — कविता के भीतर से: काँटे का कुल तो वही है जो फूल का। उसी पौधे पर, उसी जड़ से वह भी निकला है। पर उसका स्वभाव चुभने का है, इसलिए लोग उसे तोड़कर फेंक देते हैं। पौधे का बड़ा नाम काँटे को सम्मान नहीं दिला सका।
उदाहरण 2 — हमारे आसपास से: मान लीजिए किसी गाँव के प्रसिद्ध वैद्य जी के दो पोते हैं। एक पोता लोगों की सेवा करता है, बीमारों को दवा पहुँचाता है — गाँव उसे उसके अपने नाम से जानता है। दूसरा पोता किसी की मदद नहीं करता, झगड़ता रहता है — लोग उसके सामने चुप रहते हैं पर पीछे कहते हैं, “दादा कितने भले थे!” यहाँ दादा की प्रतिष्ठा दूसरे पोते के काम नहीं आई।
उदाहरण 3 — इतिहास से: महर्षि वाल्मीकि और महाकवि कालिदास किसी बड़े कुल की प्रसिद्धि लेकर नहीं जन्मे थे, पर अपने कर्म से अमर हो गए। दूसरी ओर बड़े राजवंशों के अनेक उत्तराधिकारी अपने बुरे आचरण के कारण इतिहास में निंदा के पात्र बने।
क्यों काम नहीं आती कुल की बड़ाई: कुल का नाम एक उधार लिया हुआ सम्मान है — वह दूसरों के कर्मों से बना है। जिस दिन आपका अपना आचरण उसके विरुद्ध जाता है, उसी दिन वह उधार लौटाना पड़ता है। इसीलिए कवि ने ‘कसर’ शब्द चुना — कमी की भरपाई बाहर से नहीं हो सकती, वह भीतर से ही भरनी पड़ती है।