मल्हार अध्याय 3 सोच-विचार के लिए

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
कविता को एक बार पुन: ध्यान से पढ़िए, पता लगाइए और लिखिए— (क) कविता में ऐसी कौन-कौन सी समानताओं का उल्लेख किया गया है जो सभी पौधों पर समान रूप से लागू होती हैं?
उत्तर

कविता की पहली आठ पंक्तियों में चार समानताएँ गिनाई गई हैं, और ये चारों हर पौधे पर एक जैसी लागू होती हैं —

क्रमसमानताकविता की पंक्ति
1जन्म एक ही स्थान पर होता है“हैं जनम लेते जगह में एक ही”
2पालन-पोषण एक ही पौधा करता है“एक ही पौधा उन्हें है पालता”
3चाँद की चाँदनी सब पर एक-सी पड़ती है“रात में उन पर चमकता चाँद भी, एक ही सी चाँदनी है डालता”
4वर्षा और हवा सब पर एक-सी बरसती-बहती है“मेह उन पर है बरसता एक सा, एक सी उन पर हवायें हैं बही”

यानी जन्मस्थान, पालने वाला, चाँदनी, वर्षा और हवा — ये सब प्रकृति की देन हैं और प्रकृति इन्हें बाँटते समय किसी में भेद नहीं करती।

कवि ने ये समानताएँ पहले क्यों गिनाईं: यदि पहले यह सिद्ध न किया जाए कि दोनों को सब कुछ बराबर मिला, तो बाद में यह कहना बेकार हो जाता कि अंतर उनके अपने ढंग का है। पहले समानता, फिर अंतर — यही इस कविता की तर्क-रचना है।
प्र2.
(ख) आपको फूल और काँटे के स्वभाव में मुख्य रूप से कौन-सा अंतर दिखाई दिया?
उत्तर

मुख्य अंतर यह है कि काँटा दूसरों को कष्ट देता है और फूल दूसरों को सुख देता है। एक का स्वभाव छीनने और चुभने का है, दूसरे का देने और खिलाने का।

किसके साथकाँटा क्या करता हैफूल क्या करता है
मनुष्यउँगलियाँ छेदता है, अच्छे वस्त्र फाड़ देता हैसुगंध और रंग से मन प्रसन्न करता है
तितलीपंख कतर देता हैगोद में ले लेता है
भौंराकाला शरीर बेध देता हैअपना अनूठा रस पिलाता है
कलीउसका जी खिला देता है
लोगों की दृष्टि मेंसबकी आँख में खटकता हैदेवता के सिर पर शोभा पाता है
ध्यान देने की बात: कवि ने दोनों के लिए वही तीन पात्र चुने — तितली, भौंरा और देखने वाले लोग। एक ही स्थिति में दो अलग व्यवहार दिखाने से अंतर बहुत तीखा उभर आता है। यही अच्छी कविता की कला है।
प्र3.
(ग) कविता में मुख्य रूप से कौन-सी बात कही गई है? उसे पहचानिए, समझिए और अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर

मुख्य बात — मनुष्य की पहचान और सम्मान उसके कुल से नहीं, उसके गुणों और कर्मों से होता है।

अपने शब्दों में — कवि हरिऔध जी एक पौधे का उदाहरण लेते हैं जिस पर फूल भी है और काँटा भी। दोनों का जन्म एक जगह हुआ, दोनों को एक ही पौधे ने पाला, दोनों पर एक-सी चाँदनी पड़ी और एक-सा पानी बरसा। फिर भी काँटा चुभता है और फूल महकता है। इसका कारण उनकी जड़ नहीं, उनका स्वभाव है। इसीलिए अंत में कवि पूछता है कि जब किसी व्यक्ति में स्वयं बड़प्पन ही न हो, तो उसके ख़ानदान का बड़ा नाम उसके किस काम आएगा। सच्चा बड़प्पन दूसरों के काम आने में है, ऊँचे कुल में जन्म लेने भर में नहीं।

कुल एक ही → चाँदनी, मेह, हवा एक-से
पर ढंग अलग → काँटा चुभा, फूल महका
इसलिए → सम्मान कुल का नहीं, कर्म का फल है
एक पंक्ति में: “जन्म से कोई बड़ा नहीं होता, कर्म से बड़ा बनता है।”
प्र4.
(घ) “किस तरह कुल की बड़ाई काम दे, जो किसी में हो बड़प्पन की कसर।” उदाहरण देकर समझाइए।
उत्तर

इस पंक्ति का अर्थ है — जिस व्यक्ति में स्वयं बड़प्पन की कमी हो, उसके ख़ानदान का बड़ा नाम उसके किसी काम नहीं आता।

उदाहरण 1 — कविता के भीतर से: काँटे का कुल तो वही है जो फूल का। उसी पौधे पर, उसी जड़ से वह भी निकला है। पर उसका स्वभाव चुभने का है, इसलिए लोग उसे तोड़कर फेंक देते हैं। पौधे का बड़ा नाम काँटे को सम्मान नहीं दिला सका।

उदाहरण 2 — हमारे आसपास से: मान लीजिए किसी गाँव के प्रसिद्ध वैद्य जी के दो पोते हैं। एक पोता लोगों की सेवा करता है, बीमारों को दवा पहुँचाता है — गाँव उसे उसके अपने नाम से जानता है। दूसरा पोता किसी की मदद नहीं करता, झगड़ता रहता है — लोग उसके सामने चुप रहते हैं पर पीछे कहते हैं, “दादा कितने भले थे!” यहाँ दादा की प्रतिष्ठा दूसरे पोते के काम नहीं आई।

उदाहरण 3 — इतिहास से: महर्षि वाल्मीकि और महाकवि कालिदास किसी बड़े कुल की प्रसिद्धि लेकर नहीं जन्मे थे, पर अपने कर्म से अमर हो गए। दूसरी ओर बड़े राजवंशों के अनेक उत्तराधिकारी अपने बुरे आचरण के कारण इतिहास में निंदा के पात्र बने।

क्यों काम नहीं आती कुल की बड़ाई: कुल का नाम एक उधार लिया हुआ सम्मान है — वह दूसरों के कर्मों से बना है। जिस दिन आपका अपना आचरण उसके विरुद्ध जाता है, उसी दिन वह उधार लौटाना पड़ता है। इसीलिए कवि ने ‘कसर’ शब्द चुना — कमी की भरपाई बाहर से नहीं हो सकती, वह भीतर से ही भरनी पड़ती है।
प्र5.
(ङ) “है खटकता एक सब की आँख में, दूसरा है सोहता सुर शीश पर।” लोग कैसे स्वभाव के व्यक्तियों की प्रशंसा करते हैं और कैसे स्वभाव वाले व्यक्तियों से दूर रहना पसंद करते हैं?
उत्तर

पंक्ति का अर्थ — एक (काँटा) सबकी आँखों में चुभता है और दूसरा (फूल) देवताओं के सिर पर चढ़कर शोभा पाता है। यही बात मनुष्यों पर भी लागू होती है।

लोग जिनकी प्रशंसा करते हैं — ‘फूल’ जैसे लोगलोग जिनसे दूर रहना चाहते हैं — ‘काँटे’ जैसे लोग
जो मीठा बोलते हैं और दूसरों की बात धैर्य से सुनते हैंजो कड़वा बोलते हैं और बात-बात पर ताना मारते हैं
जो बिना कहे मदद कर देते हैंजो सहायता माँगने पर भी टाल जाते हैं
जो दूसरों की सफलता पर प्रसन्न होते हैंजो दूसरों की सफलता से जलते हैं
जो ग़लती मान लेते हैं और क्षमा माँग लेते हैंजो अपनी ग़लती दूसरों पर डाल देते हैं
जो छोटे-बड़े सबसे समान व्यवहार करते हैंजो घमंड करते हैं और दूसरों को नीचा दिखाते हैं

संक्षेप में — लोग विनम्र, उदार, सहनशील और परोपकारी स्वभाव के व्यक्तियों की प्रशंसा करते हैं और अहंकारी, स्वार्थी, कठोर तथा ईर्ष्यालु स्वभाव वाले व्यक्तियों से दूरी बना लेते हैं।

‘खटकना’ शब्द क्यों सटीक है: जो चीज़ आँख में खटकती है, उसे हम हटा देना चाहते हैं — यह हमारी सोची-समझी योजना नहीं, स्वाभाविक प्रतिक्रिया है। कवि कहना चाहता है कि बुरे व्यवहार से बनी दूरी अपने आप बन जाती है, कोई घोषणा करके नहीं बनाता।
सोचिए: क्या कोई ‘काँटा’ बदलकर ‘फूल’ बन सकता है? स्वभाव जन्म से तय नहीं होता — अभ्यास से बदलता है। यही इस कविता की सबसे आशा भरी बात है।
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