मल्हार अध्याय 3 मिलकर करें मिलान

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
इस कविता में ‘फूल’ और ‘काँटा’ के उदाहरण द्वारा लोगों के स्वभावों के अंतर और समानताओं की ओर संकेत किया गया है। दूसरे शब्दों में, ‘फूल’ और ‘काँटा’ प्रतीक के रूप में प्रयोग किए गए हैं। अपने साथियों के साथ मिलकर चर्चा कीजिए कि फूल और काँटा किस-किस के प्रतीक हो सकते हैं। इन्हें उपयुक्त प्रतीकों से जोड़िए— (बाईं ओर — दया, स्वार्थ, अच्छाई, सुख, सुंदरता, कोमलता, आनंद; दाईं ओर — परोपकार, प्रेम, बुराई, दुख, कठोरता, प्रसन्नता, पीड़ा)
उत्तर

पुस्तक में बीच में दो चित्र हैं — फूल और काँटा। दोनों ओर दिए गए चौदह शब्दों को इनसे रेखा खींचकर जोड़ना है। जो भाव सुख, सुंदरता और देने से जुड़े हैं वे फूल से जुड़ेंगे; जो चोट, कमी और लेने से जुड़े हैं वे काँटे से।

फूल के प्रतीककविता से आधारकाँटे के प्रतीककविता से आधार
दयातितली को गोद में लेनास्वार्थकेवल अपने लिए, किसी को कुछ नहीं देता
अच्छाई“है सदा देता कली का जी खिला”बुराई“छेद कर काँटा किसी की उँगलियाँ”
सुखभौंरे को अनूठा रस पिलानादुख“फाड़ देता है किसी का वर बसन”
सुंदरता“निराले रंग”, “सोहता सुर शीश पर”कठोरताचुभने वाला, नुकीला स्वभाव
कोमलतापंखुड़ियों की कोमलता, कोमल व्यवहारपीड़ा“भौंर का है बेध देता श्याम तन”
आनंदसुगंध से चारों ओर आनंद
परोपकारअपना रस दूसरों को देना
प्रेम“प्यार-डूबी तितलियों” का स्वागत
प्रसन्नता“कली का जी खिला” देना

संक्षेप में —

  • फूल → दया, अच्छाई, सुख, सुंदरता, कोमलता, आनंद, परोपकार, प्रेम, प्रसन्नता (कुल 9 शब्द)
  • काँटा → स्वार्थ, बुराई, दुख, कठोरता, पीड़ा (कुल 5 शब्द)
प्रतीक क्या होता है: जब कोई वस्तु अपने अलावा किसी भाव या विचार का संकेत देने लगे, तो वह प्रतीक कहलाती है। यहाँ फूल केवल फूल नहीं रह जाता — वह देने वाले, सुख बाँटने वाले स्वभाव का प्रतीक बन जाता है; और काँटा चोट पहुँचाने वाले स्वभाव का। इसी कारण कविता पौधों की न रहकर मनुष्यों की हो जाती है।
चर्चा के लिए: काँटे को हमेशा बुरा मानना ज़रूरी नहीं। वही काँटा पौधे की रक्षा भी करता है। इसलिए कोई साथी ‘रक्षा’ या ‘संघर्ष’ को भी काँटे से जोड़े तो उसका कारण सुनिए — पाठ के अंत में दिया गया वाद-विवाद इसी बात पर है।
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