मल्हार अध्याय 4 झरोखे से और साझी समझ

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
‘पानी रे पानी’ और ‘पाल के किनारे रखा इतिहास’ में आपको कौन-कौन सी बातें समान लगीं? उनके विषय में अपने सहपाठियों के साथ चर्चा कीजिए।
उत्तर

दोनों रचनाएँ अनुपम मिश्र की ही हैं और दोनों का विषय एक है — तालाब और पानी को सँभालने की समाज की परंपरा। समानताएँ इस प्रकार हैं —

समान बात‘पानी रे पानी’ में‘पाल के किनारे रखा इतिहास’ में
तालाब ही केंद्र में हैतालाब और झील “धरती की गुल्लक में पानी भरने का काम करते हैं।”पूरा किस्सा ही चार तालाबों का है — बूढ़ा सागर, सरमन सागर, कौंराई सागर और कुंडम सागर।
पानी सबसे बड़ी संपत्ति हैवर्षा को “रुपयों से भी कई गुना कीमती” कहा गया है।राजा पारस और सोना दोनों लौटा देता है और कहता है — “जाओ इससे अच्छे-अच्छे काम करते जाना, तालाब बनाते जाना।” यानी सोने से बड़ा काम तालाब है।
काम समाज करता है, अकेला आदमी नहीं“अपने आस-पास के जलस्रोतों की, तालाबों की और नदियों आदि की रखवाली अच्छे ढंग से करनी पड़ेगी।”“जिस किसी ने भी तालाब बनाया, वह महाराज या महात्मा ही कहलाया” — राजा, रानी, गृहस्थ, साधु सब बनाते रहे।
जो जमा किया जाए, वही आगे काम आता हैगुल्लक का रूपक — बरसात में जमा करो, साल भर निकालो।तालाब बनाने वाले चले गए, पर तालाब आज भी हैं और आज भी काम आते हैं।
सरल, किस्सा सुनाने वाली भाषाबातचीत की भाषा — “लो, सब तरफ पानी ही बहने लगता है।”कहानी की भाषा — पारस, दराँती, चार भाई और उनकी बेटी का किस्सा।
आज के लिए चेतावनी“इस बड़ी गलती की सजा अब हम सबको मिल रही है।”“इतिहास ने सरमन, बुढ़ान, कौंराई और कूड़न को याद नहीं रखा, लेकिन इन लोगों ने तालाब बनाए और इतिहास को उनके किनारे पर रख दिया था।”
दोनों का साझा संदेश: पानी का इंतजाम कोई नया आविष्कार नहीं है — हमारा समाज सैकड़ों साल से तालाब बनाकर यह करता आया है। पहला पाठ बताता है कि हम वह समझ भूल गए; दूसरा पाठ याद दिलाता है कि वह समझ थी और आज भी हजारों तालाबों के रूप में हमारे सामने खड़ी है।
चर्चा के लिए एक प्रश्न: ‘पानी रे पानी’ में हमने तालाब पाटकर उन पर बाजार और सिनेमा बना दिए; ‘पाल के किनारे रखा इतिहास’ में लोग तालाब बनाकर समाज के प्रति कृतज्ञता जताते थे। इन दोनों के बीच क्या बदल गया — साधन या सोच?
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ