पृष्ठ 51 पर पाँच चित्र हैं। पाँचों में एक ही बात दिखती है — पानी घर तक नहीं आ रहा, लोगों को पानी तक जाना पड़ रहा है।
| चित्र | क्या दिखता है | यह क्या बताता है |
|---|---|---|
| 1. सार्वजनिक नल पर भीड़ | बस्ती के बहुत-से स्त्री-पुरुष और बच्चे घड़े-बालटियाँ लिए एक ही नल के आसपास खड़े हैं। | पूरे मोहल्ले के लिए एक ही स्रोत — इसीलिए लंबा इंतजार और आपसी खींचतान। |
| 2. ‘पानी का टैंकर’ | टैंकर से पाइप लगाकर लोग अपने बर्तन भर रहे हैं। | जहाँ पाइपलाइन नहीं है या स्रोत सूख चुके हैं, वहाँ पानी गाड़ी से लाना पड़ता है — यह अस्थायी और महँगा उपाय है। |
| 3. तालाब/नदी से पानी भरते लोग | लोग तालाब में उतरकर घड़े भर रहे हैं, कुछ सिर पर रखकर लौट रहे हैं। | यही खुला जल स्रोत गाँवों का सहारा है, पर यह पानी बिना छाने-उबाले पीने योग्य नहीं होता। |
| 4. सूखी, दरारों भरी जमीन पर पानी ढोते स्त्री-पुरुष | स्त्री सिर पर घड़ा और पुरुष काँवर में दो बर्तन लिए फटी हुई जमीन पर चल रहे हैं। | अकाल की तस्वीर — पानी बहुत दूर से लाना पड़ता है। इसमें सबसे ज्यादा समय और श्रम स्त्रियों तथा बच्चों का लगता है। |
| 5. ‘जल रेल’ | टैंकरों के डिब्बे जोड़कर चलती एक रेलगाड़ी। | संकट इतना बड़ा हो जाता है कि पूरे शहर के लिए रेलगाड़ी से पानी भेजना पड़ता है — यह हालात की गंभीरता का सबसे बड़ा प्रमाण है। |
नमूना विवरण: इन चित्रों से पता चलता है कि हमारे देश में जल आपूर्ति की स्थिति एक जैसी नहीं है। कहीं नल से पानी आता है, कहीं एक ही सार्वजनिक नल पर पूरी बस्ती निर्भर है, कहीं तालाब ही एकमात्र सहारा है और कहीं टैंकर या जल रेल से पानी पहुँचाना पड़ता है। जहाँ भी स्थानीय स्रोत — तालाब, कुएँ और भूजल — सूख गए हैं, वहाँ लोगों का बहुत सारा समय केवल पानी जुटाने में चला जाता है। इसका सबसे अधिक बोझ स्त्रियों और बच्चों पर पड़ता है, जिससे बच्चों की पढ़ाई तक छूट जाती है। टैंकर और जल रेल संकट के समय राहत तो देते हैं, पर यह स्थायी हल नहीं है। स्थायी हल वही है जो पाठ बताता है — वर्षा के पानी को वहीं रोकना, तालाबों की रखवाली करना और भूजल भंडार को फिर से भरना।