मल्हार अध्याय 4 सोच-विचार के लिए

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
लेख को एक बार पुन: पढ़िए और निम्नलिखित के विषय में पता लगाकर लिखिए। (क) पाठ में धरती को एक बहुत बड़ी गुल्लक क्यों कहा गया है?
उत्तर

धरती को गुल्लक इसलिए कहा गया है क्योंकि दोनों का काम एक जैसा है — थोड़ा-थोड़ा जमा करना और जरूरत पड़ने पर काम आना।

गुल्लकधरती
मिट्टी की बनी होती है।“मिट्टी की बनी इस विशाल गुल्लक…”
उसमें एक-एक रुपया, सिक्के और नोट जमा होते जाते हैं।उसमें वर्षा का पानी बूँद-बूँद करके जमा होता जाता है।
जमा करने का रास्ता ऊपर बनी दरार है।जमा करने का रास्ता तालाब और झीलें हैं — “वे धरती की गुल्लक में पानी भरने का काम करते हैं।”
जमा पैसा दिखता नहीं, पर रहता है।“पानी का यह खजाना हमें दिखता नहीं” — यानी भूजल भंडार।
जरूरत पड़ने पर बचत काम आती है।बरसात बीत जाने के बाद पूरे साल घर, खेत और पाठशाला के लिए पानी उसी से मिलता है।
यह कौन-सा अलंकार है: धरती पर गुल्लक का आरोप किया गया है, यानी धरती को सीधे गुल्लक कह दिया गया है — यह रूपक है। यदि कहा जाता “धरती गुल्लक के समान है”, तो उपमा होती।
चेतावनी भी इसी रूपक में है: गुल्लक तभी काम आती है जब उसमें डालते रहें। हम डालना भूल गए और ऊपर से उसे पाट भी दिया — इसीलिए वह खाली पड़ी है।
प्र2.
(ख) जल-चक्र की प्रक्रिया कैसे पूरी होती है?
उत्तर

जल-चक्र इस प्रकार पूरा होता है —

1. सूरज की गर्मी से समुद्र का पानी भाप बनकर ऊपर उठता है।
2. ऊपर जाकर यह भाप ठंडी होकर बादल बन जाती है।
3. हवा बादलों को धरती की ओर ले आती है।
4. बादल बरसते हैं — बरसात की बूँदें धरती पर गिरती हैं।
5. यही पानी बहकर नदी बनता है और नदी के किनारे बसे गाँव-शहर उसका उपयोग करते हैं।
6. नदी अपने चारों तरफ का पानी लेकर फिर उसी समुद्र में जा मिलती है।
यात्रा वहीं लौट आई जहाँ से चली थी — जल-चक्र पूरा हो जाता है।
सूरज बादल भाप ऊपर उठती है वर्षा पहाड़ नदी समुद्र गाँव
जल-चक्र — सूरज की गर्मी से समुद्र का पानी भाप बनता है, भाप बादल बनकर बरसती है, वर्षा का पानी नदी बनकर बहता है और नदी फिर समुद्र में मिल जाती है।
चक्र क्यों कहते हैं: क्योंकि इसका न कोई पहला सिरा है, न आखिरी। पानी नष्ट नहीं होता, बस अपना रूप बदलता रहता है — पानी से भाप, भाप से बादल, बादल से फिर पानी।
प्र3.
(ग) यदि सारी नदियाँ, झीलें और तालाब सूख जाएँ तो क्या होगा?
उत्तर

यदि सारी नदियाँ, झीलें और तालाब सूख जाएँ तो जीवन की पूरी व्यवस्था लड़खड़ा जाएगी। इसका असर एक साथ कई तरफ पड़ेगा —

  • भूजल भरना बंद हो जाएगा। तालाब और झील ही वर्षा के पानी को रोककर उसे जमीन में उतारते हैं। ये न रहें तो धरती की गुल्लक खाली रह जाएगी और कुएँ, हैंडपंप तथा नल सूख जाएँगे।
  • पीने का पानी संकट में पड़ जाएगा। पाठ में लिखा है कि शहरों में तो पानी बिकने लगा है — पानी और महँगा हो जाएगा और गरीब सबसे पहले पिसेगा।
  • खेती चौपट हो जाएगी। सिंचाई का पानी न मिलने से फसल सूख जाएगी, अनाज घटेगा और अकाल जैसी हालत बन जाएगी।
  • पशु-पक्षी और पेड़-पौधे मरने लगेंगे। जलचर जीव तो पहले ही दिन खत्म हो जाएँगे; जंगल सूखेंगे तो वर्षा और भी घटेगी।
  • लोग गाँव छोड़ने लगेंगे। पानी की तलाश में पलायन बढ़ेगा और पानी को लेकर “तू-तू, मैं-मैं” जैसे झगड़े बड़े विवादों में बदल जाएँगे।
असल में यह हो चुका है: पाठ यही तो बता रहा है कि तालाब पाटने के बाद “गर्मी के दिनों में हमारे नल सूख जाते हैं।” यानी यह कोई दूर की कल्पना नहीं, कई इलाकों की आज की सच्चाई है।
याद रखने वाली बात: पानी सूखने पर सबसे पहले वह चीज छिनती है जो सबसे जरूरी है — पीने का पानी। इसीलिए कहा गया है — “बिन पानी सब सून।”
प्र4.
(घ) पाठ में पानी को रुपयों से भी कई गुना मूल्यवान क्यों बताया गया है?
उत्तर

पाठ की पंक्ति है — “तब रुपयों से भी कई गुना कीमती इस वर्षा को हमें इस बड़ी गुल्लक में जमा कर लेना चाहिए।” पानी को रुपयों से कीमती इन कारणों से कहा गया है —

  • पानी के बिना जीवन नहीं है, रुपये के बिना है। रुपया न हो तो काम कठिन होगा, पर पानी न हो तो मनुष्य, पशु, फसल — कोई नहीं बचेगा।
  • रुपये से पानी हमेशा नहीं खरीदा जा सकता। पाठ बताता है कि शहरों में पानी बिकने लगा है, फिर भी “भयानक कष्ट” बना हुआ है। जब स्रोत ही सूख जाए तो जेब में पैसा होते हुए भी पानी नहीं मिलता।
  • पानी बनाया नहीं जा सकता। रुपया कमाया जा सकता है, पर वर्षा प्रकृति देती है — वह हमारे बस में नहीं। जो चीज दोबारा बनाई न जा सके, वह सबसे कीमती होती है।
  • यह पूँजी मुफ्त में मिलती है और मुफ्त में बह जाती है। गुल्लक में डालने के लिए रुपया कमाना पड़ता है, पर वर्षा का पानी आसमान से बिना माँगे आता है — उसे न सँभालना दोहरी नासमझी है।
रुपया → कमाया जा सकता है, फिर से जमा किया जा सकता है
पानी → न बनाया जा सकता है, न उसका कोई विकल्प है
इसीलिए वर्षा की एक-एक बूँद रुपये से कई गुना कीमती है।
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ