मल्हार अध्याय 5 आपकी बात

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) बच्चे ने अस्पताल के वातावरण का विस्तार से सुंदर वर्णन किया है। इसी प्रकार आप अपनी कक्षा का वर्णन कीजिए।
उत्तर

यहाँ आपको चित्रात्मक भाषा का अभ्यास करना है — यानी ऐसा लिखना कि पढ़ने वाले की आँखों के सामने आपकी कक्षा बन जाए।

अच्छे वर्णन में ये बातें होनी चाहिए:

  • जो दिखता है — दीवारों का रंग, खिड़कियाँ, बोर्ड, बेंचें, चार्ट, अलमारी, बाहर का दृश्य।
  • जो सुनाई देता है — पंखे की घरघराहट, चॉक की खटखट, बच्चों की खुसुर-फुसुर, घंटी।
  • जो महसूस होता है — खिड़की से आती हवा, धूप का टुकड़ा, नई किताबों की गंध।
  • छोटी-छोटी खास चीजें — कोने वाली टूटी बेंच, बोर्ड के ऊपर लगा सुविचार, गमला, दीवार-पत्रिका।
नमूना उत्तर:
हमारी कक्षा ऊपर वाली मंजिल पर, बरामदे के आखिरी छोर पर है। दरवाजा खोलते ही हल्के नीले रंग की दीवारें और सामने चौड़ा हरा बोर्ड दिखाई देता है, जिस पर आज की तारीख अब भी लिखी है। बोर्ड के ऊपर एक सुविचार टँगा है, जिसे हर सोमवार को बदल दिया जाता है। तीन कतारों में लकड़ी की बेंचें लगी हैं — तीसरी कतार की दूसरी बेंच मेरी है, जिस पर किसी ने बहुत पहले एक छोटा-सा फूल खोद रखा है।
बाईं ओर की बड़ी खिड़कियों से गुलमोहर का पेड़ झाँकता है और दोपहर में धूप का एक चौकोर टुकड़ा फर्श पर आकर बैठ जाता है। पंखे धीमी घरघराहट के साथ घूमते रहते हैं। पीछे की दीवार पर हमारी दीवार-पत्रिका है — उसमें कविताएँ, चित्र और पिछली प्रदर्शनी की तस्वीरें लगी हैं। कोने में पानी की सुराही और एक गमला रखा है, जिसमें मनी प्लांट धीरे-धीरे बढ़ रहा है।
जब शिक्षक आते हैं तो चॉक की खटखट और कॉपियों के पन्ने पलटने की आवाज ही बचती है — बाकी एकदम शांति।
तरकीब: पहले पूरी कक्षा को एक नजर में बताइए, फिर एक-एक कोने पर जाइए, और अंत में एक ऐसी बात लिखिए जो सिर्फ आपकी कक्षा में हो। ऐसा अंत वर्णन को यादगार बना देता है।
प्र2.
(ख) कहानी में बच्चे को घर में अकेले दिन भर लेटे रहना पड़ा था। क्या आप कभी कहीं अकेले रहे हैं? उस समय आपको कैसा लग रहा था? आपने क्या-क्या किया था?
उत्तर

यह आपका अपना अनुभव है, इसलिए उत्तर सबका अलग होगा। अच्छे उत्तर में तीन बातें आनी चाहिए — कब और कहाँ अकेले थे, कैसा लगा (मन के भाव), और क्या-क्या किया

अकेलेपन में आने वाले भाव: शुरू में आजादी और मजा — “आज कोई टोकने वाला नहीं!”; फिर ऊब; फिर हल्की घबराहट या हर आहट पर चौंकना; और अंत में घर वालों के लौटने का इंतजार।

नमूना उत्तर: “पिछली गर्मियों में एक दिन माँ और भाई बाजार चले गए और मैं दो घंटे घर में अकेला रह गया। पहले तो मुझे बड़ा मजा आया — मैंने तेज आवाज में गाने लगाए और मनपसंद कार्यक्रम देखा। पर आधे घंटे बाद घर बहुत बड़ा और सुनसान लगने लगा। दरवाजे की हर आहट पर मैं चौंक जाता। फिर मैंने खुद को व्यस्त करने के लिए अपनी अलमारी ठीक की, दो चित्र बनाए और दादी को फोन करके देर तक बातें कीं। जब घंटी बजी और माँ लौटीं, तो मुझे इतनी खुशी हुई जितनी शायद ही कभी हुई हो। उस दिन मैंने सीखा कि थोड़ा अकेलापन अच्छा है, पर बहुत देर का अकेलापन भारी पड़ता है।”
कहानी से तुलना: कहानी का बच्चा भी पहले खुश था कि घर खाली है — “अब घर में मैं अकेला रह गया।” पर उसने खुद को व्यस्त नहीं किया, बस लेटा रहा। इसीलिए उसका अकेलापन ऊब और चिड़चिड़ाहट में बदल गया।
प्र3.
(ग) कहानी में आम खाने वाले मुन्नू को देखकर बच्चे को ईर्ष्या हुई थी। क्या आपको कभी किसी से या किसी को आपसे ईर्ष्या हुई है? आपने तब क्या किया था ताकि यह भावना दूर हो जाए?
उत्तर

ईर्ष्या यानी दूसरे के पास कुछ अच्छा देखकर मन में जलन होना। यह भाव लगभग सबके मन में कभी न कभी आता है — इसे मान लेना ही उसे दूर करने का पहला कदम है।

ईर्ष्या दूर करने के तरीके:

  1. अपने मन से सच कहिए — “हाँ, मुझे जलन हो रही है।” छिपाने से भाव और बढ़ता है।
  2. कारण देखिए — ज्यादातर ईर्ष्या के पीछे यह डर होता है कि “मैं पीछे रह गया।”
  3. तुलना की जगह सीख — जो अच्छा कर रहा है, उससे पूछिए कि उसने कैसे किया। प्रतिद्वंद्वी को शिक्षक बना लेना सबसे अच्छा उपाय है।
  4. अपनी अच्छी बातें गिनिए — हर व्यक्ति किसी न किसी चीज में आगे होता है।
  5. बधाई दीजिए — मन से कही गई एक बधाई ईर्ष्या को आधा कर देती है।
  6. बाँटिए — साथ खेलने या साथ खाने से जलन दोस्ती में बदल जाती है।
नमूना उत्तर: “हमारी कक्षा में हुई चित्रकला प्रतियोगिता में मेरे मित्र को पहला पुरस्कार मिला और मुझे कुछ नहीं। दो दिन तक मुझे उससे बात करने का मन ही नहीं किया। फिर मुझे लगा कि गलती उसकी नहीं है। मैंने उससे जाकर कहा — ‘तुम्हारा चित्र सचमुच बहुत अच्छा था, मुझे भी छाया देना सिखा दो।’ उसने मुझे रंग भरने का तरीका बताया। अगली बार मेरा चित्र भी चुना गया। तब समझ आया कि जलने से कुछ नहीं मिलता, सीखने से मिलता है।”
कहानी में क्या हुआ: बच्चा “जलन, गुस्से और कुढ़न में पाँव पटकता वापस बिस्तर में आ गया।” उसने अपनी ईर्ष्या का कुछ नहीं किया — इसलिए उसका दिन और भी बुरा बीता। यदि वह जाकर मुन्नू के साथ बैठ जाता, तो शायद उसे भी आम मिल जाता!
प्र4.
(घ) कहानी में नानाजी-नानीजी बच्चे का पूरा ध्यान रखने का प्रयास करते हैं। आपके घर और विद्यालय में आपका ध्यान कौन-कौन रखते हैं? कैसे?
उत्तर

यह आपका अपना उत्तर होगा। सोचिए कि आपके दिन में कौन-कौन आपके लिए कुछ करता है — कई बार हम उन्हें गिनते ही नहीं।

कौनकैसे ध्यान रखते हैं
माता-पितासमय पर भोजन, बीमार होने पर दवा और डॉक्टर, पढ़ाई और फीस का इंतजाम, हर बात पर हौसला।
दादा-दादी / नाना-नानीकहानियाँ सुनाना, बीमार होने पर घरेलू उपाय, धूप-छाँव और खाने-पीने की चिंता।
बड़े भाई-बहनगृहकार्य में मदद, स्कूल तक साथ जाना, अपनी चीजें बाँटना।
शिक्षकन समझ आने पर दोबारा समझाना, अनुपस्थित रहने पर पूछना, गलती सुधारना और सराहना करना।
विद्यालय के अन्य कर्मीमध्याह्न भोजन बनाना और परोसना, कक्षा और शौचालय की सफाई, पानी का प्रबंध, गेट पर सुरक्षा।
मित्रछूटा हुआ काम बताना, कॉपी देना, मन खराब होने पर साथ रहना।
नमूना उत्तर: “मेरा सबसे ज्यादा ध्यान मेरी माँ रखती हैं — वे सुबह मुझसे पहले उठकर मेरा टिफिन तैयार करती हैं और रात को मेरा बस्ता जाँचती हैं। विद्यालय में हमारी कक्षा-शिक्षिका ध्यान रखती हैं; एक दिन मैं बुखार में स्कूल चला गया था तो उन्होंने तुरंत घर सूचना भिजवाई। और भोजन बनाने वाली दीदी सबका ध्यान रखती हैं कि किसी की थाली खाली न रह जाए।”
कहानी से जोड़िए: नानाजी-नानीजी का तरीका भले सख्त लगे, पर उसमें चिंता ही थी — नानाजी ने खुद जाँच की, दवा दी और दोपहर में फिर आकर पूछा “अब कैसा है सिरदर्द?” बड़ों का ध्यान रखना हमेशा दुलार जैसा नहीं दिखता।
प्र5.
(ङ) आप अपने परिजनों और मित्रों का ध्यान कैसे रखते हैं? क्या-क्या करते हैं या क्या-क्या नहीं करते हैं ताकि उन्हें कम-से-कम परेशानी हो?
उत्तर

ध्यान रखना केवल “कुछ करना” नहीं होता — कई बार कुछ न करना भी ध्यान रखना है।

क्या-क्या करता/करती हूँक्या-क्या नहीं करता/करती
अपना कमरा, बस्ता और बर्तन खुद समेटता हूँ।घर में चीजें बिखेरकर नहीं छोड़ता।
कोई बीमार हो तो पास बैठकर पानी-दवा देता हूँ और शोर नहीं करता।बीमार व्यक्ति के पास तेज आवाज में टीवी या गाने नहीं चलाता।
घर के छोटे काम बिना कहे कर देता हूँ — सब्जी लाना, पौधों में पानी देना।हर छोटी चीज के लिए बड़ों को बार-बार नहीं टोकता।
अपना काम समय पर पूरा करता हूँ, ताकि किसी को चिंता न हो।झूठ या बहाना नहीं बनाता — इसी से सबसे ज्यादा परेशानी होती है।
मित्र का छूटा काम उसे बताता हूँ और अपनी कॉपी दे देता हूँ।किसी का मजाक नहीं उड़ाता, न ही उसकी बात दूसरों से कहता हूँ।
कहीं जाने से पहले घर पर बता देता हूँ।बिना बताए देर तक बाहर नहीं रुकता।
नमूना उत्तर: “जब पिछले महीने मेरी छोटी बहन को बुखार आया, तो मैंने दो दिन उसका काम अपने जिम्मे ले लिया — उसकी किताबें जमाईं और दोपहर में उसे कहानी सुनाई। मैं दिनभर धीरे बोलता रहा ताकि उसकी नींद न टूटे। मुझे लगता है कि सबसे बड़ा ध्यान यही है कि हम किसी के लिए मुसीबत न बनें।”
कहानी से सीख: बच्चे के एक झूठ से नानीजी को काढ़ा बनाना पड़ा, नानाजी को दिन में दो बार आना पड़ा और घरभर की दिनचर्या बिगड़ी। हमारी छोटी-सी लापरवाही दूसरों का पूरा दिन खा जाती है।
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