यहाँ आपको चित्रात्मक भाषा का अभ्यास करना है — यानी ऐसा लिखना कि पढ़ने वाले की आँखों के सामने आपकी कक्षा बन जाए।
अच्छे वर्णन में ये बातें होनी चाहिए:
- जो दिखता है — दीवारों का रंग, खिड़कियाँ, बोर्ड, बेंचें, चार्ट, अलमारी, बाहर का दृश्य।
- जो सुनाई देता है — पंखे की घरघराहट, चॉक की खटखट, बच्चों की खुसुर-फुसुर, घंटी।
- जो महसूस होता है — खिड़की से आती हवा, धूप का टुकड़ा, नई किताबों की गंध।
- छोटी-छोटी खास चीजें — कोने वाली टूटी बेंच, बोर्ड के ऊपर लगा सुविचार, गमला, दीवार-पत्रिका।
हमारी कक्षा ऊपर वाली मंजिल पर, बरामदे के आखिरी छोर पर है। दरवाजा खोलते ही हल्के नीले रंग की दीवारें और सामने चौड़ा हरा बोर्ड दिखाई देता है, जिस पर आज की तारीख अब भी लिखी है। बोर्ड के ऊपर एक सुविचार टँगा है, जिसे हर सोमवार को बदल दिया जाता है। तीन कतारों में लकड़ी की बेंचें लगी हैं — तीसरी कतार की दूसरी बेंच मेरी है, जिस पर किसी ने बहुत पहले एक छोटा-सा फूल खोद रखा है।
बाईं ओर की बड़ी खिड़कियों से गुलमोहर का पेड़ झाँकता है और दोपहर में धूप का एक चौकोर टुकड़ा फर्श पर आकर बैठ जाता है। पंखे धीमी घरघराहट के साथ घूमते रहते हैं। पीछे की दीवार पर हमारी दीवार-पत्रिका है — उसमें कविताएँ, चित्र और पिछली प्रदर्शनी की तस्वीरें लगी हैं। कोने में पानी की सुराही और एक गमला रखा है, जिसमें मनी प्लांट धीरे-धीरे बढ़ रहा है।
जब शिक्षक आते हैं तो चॉक की खटखट और कॉपियों के पन्ने पलटने की आवाज ही बचती है — बाकी एकदम शांति।