प्र1.
(क) कहानी में बच्चे ने बीमारी का बहाना बनाया ताकि उसे स्कूल न जाना पड़े। क्या आपने कभी किसी कारण से बहाना बनाया है? यदि हाँ, तो उसके बारे में बताइए। उस समय आपके मन में कौन-कौन से भाव आ-जा रहे थे? आप कैसा अनुभव कर रहे थे?
उत्तर
यह आपका अपना अनुभव है। उत्तर में तीन बातें आनी चाहिए — क्या बहाना बनाया, क्यों बनाया, और उस समय मन में क्या-क्या चल रहा था।
बहाना बनाते समय आने वाले भाव (क्रम से):
- डर — पकड़े जाने का।
- घबराहट — दिल का तेज धड़कना, आँख न मिला पाना।
- थोड़ी राहत — जब बात मान ली जाती है।
- बेचैनी — बार-बार यही सोचना कि कहीं झूठ खुल न जाए।
- ग्लानि / पछतावा — जब वही व्यक्ति आप पर भरोसा करके आपकी देखभाल करने लगे।
नमूना उत्तर: “एक बार मुझसे गणित का काम पूरा नहीं हुआ था। मैंने शिक्षक से कह दिया कि मेरी कॉपी घर पर रह गई। कहते समय मेरा गला सूख गया और मैं उनकी आँखों में देख ही नहीं पाया। उन्होंने बिना कुछ पूछे कह दिया, ‘कोई बात नहीं, कल दिखा देना।’ उसी क्षण मुझे राहत भी हुई और शर्म भी। पूरा दिन मेरा मन पढ़ाई में नहीं लगा — मुझे लगता रहा कि कहीं वे कॉपी माँग न लें। शाम को घर आकर मैंने पहले वही काम पूरा किया और अगले दिन सच बता दिया। सच बताने के बाद जो हल्कापन लगा, वह मुझे आज भी याद है।”
ध्यान दीजिए: झूठ एक बार बोलने से खत्म नहीं होता — उसे बचाने के लिए दिनभर सतर्क रहना पड़ता है। कहानी का बच्चा भी दिनभर सतर्क रहा; बाहर आहट होते ही “फिर से लेट गया।” यही थकान बहाने की असली कीमत है।