मल्हार अध्याय 5 बहाने

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) कहानी में बच्चे ने बीमारी का बहाना बनाया ताकि उसे स्कूल न जाना पड़े। क्या आपने कभी किसी कारण से बहाना बनाया है? यदि हाँ, तो उसके बारे में बताइए। उस समय आपके मन में कौन-कौन से भाव आ-जा रहे थे? आप कैसा अनुभव कर रहे थे?
उत्तर

यह आपका अपना अनुभव है। उत्तर में तीन बातें आनी चाहिए — क्या बहाना बनाया, क्यों बनाया, और उस समय मन में क्या-क्या चल रहा था

बहाना बनाते समय आने वाले भाव (क्रम से):

  1. डर — पकड़े जाने का।
  2. घबराहट — दिल का तेज धड़कना, आँख न मिला पाना।
  3. थोड़ी राहत — जब बात मान ली जाती है।
  4. बेचैनी — बार-बार यही सोचना कि कहीं झूठ खुल न जाए।
  5. ग्लानि / पछतावा — जब वही व्यक्ति आप पर भरोसा करके आपकी देखभाल करने लगे।
नमूना उत्तर: “एक बार मुझसे गणित का काम पूरा नहीं हुआ था। मैंने शिक्षक से कह दिया कि मेरी कॉपी घर पर रह गई। कहते समय मेरा गला सूख गया और मैं उनकी आँखों में देख ही नहीं पाया। उन्होंने बिना कुछ पूछे कह दिया, ‘कोई बात नहीं, कल दिखा देना।’ उसी क्षण मुझे राहत भी हुई और शर्म भी। पूरा दिन मेरा मन पढ़ाई में नहीं लगा — मुझे लगता रहा कि कहीं वे कॉपी माँग न लें। शाम को घर आकर मैंने पहले वही काम पूरा किया और अगले दिन सच बता दिया। सच बताने के बाद जो हल्कापन लगा, वह मुझे आज भी याद है।”
ध्यान दीजिए: झूठ एक बार बोलने से खत्म नहीं होता — उसे बचाने के लिए दिनभर सतर्क रहना पड़ता है। कहानी का बच्चा भी दिनभर सतर्क रहा; बाहर आहट होते ही “फिर से लेट गया।” यही थकान बहाने की असली कीमत है।
प्र2.
(ख) आमतौर पर बनाए जाने वाले बहानों की एक सूची बनाइए।
उत्तर

आमतौर पर सुने-सुनाए जाने वाले बहाने कुछ इस तरह के होते हैं —

कहाँआमतौर पर बनाए जाने वाले बहाने
विद्यालय में“कॉपी घर पर रह गई।” • “मेरी तबियत ठीक नहीं थी।” • “कल बिजली नहीं थी।” • “मुझे यह काम मिला ही नहीं था।” • “बस छूट गई थी, इसलिए देर हो गई।” • “मेरे छोटे भाई ने कॉपी फाड़ दी।”
घर में“मैंने तो अभी-अभी पढ़ना शुरू ही किया था।” • “वह काम मैंने कर दिया था, आपने देखा नहीं।” • “यह मैंने नहीं तोड़ा।” • “थोड़ी देर और, बस पाँच मिनट।” • “सिर में दर्द हो रहा है।”
मित्रों से“मैंने तुम्हारा संदेश देखा ही नहीं।” • “मैं आने ही वाला था, तभी काम आ गया।” • “मुझे तो पता ही नहीं था।”
एक बात नोटिस कीजिए: लगभग हर बहाना एक ही ढाँचे का होता है — “गलती मेरी नहीं, हालात की है।” बहाना असल में जिम्मेदारी किसी और पर डालने का तरीका है। और सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला बहाना वही है जो इस कहानी में है — तबियत खराब होना।
प्र3.
(ग) बहाने क्यों बनाने पड़ते हैं? बहाने न बनाने पड़ें, इसके लिए हम क्या-क्या कर सकते हैं?
उत्तर

बहाने क्यों बनाने पड़ते हैं:

  • डाँट या सजा का डर — यही सबसे बड़ा कारण है। कहानी का बच्चा भी सोचता है — “स्कूल जाता तो जरूर सजा मिलती।”
  • काम समय पर पूरा न होना — टालमटोल (आलस) से काम इकट्ठा हो जाता है।
  • शर्मिंदगी से बचना — यह मानना कठिन लगता है कि “मुझसे नहीं हुआ” या “मुझे समझ नहीं आया।”
  • मन न होना — कोई काम उबाऊ लगे तो उससे बचने का रास्ता ढूँढ़ा जाता है।
  • भरोसे की कमी — जब लगे कि सच बोलने पर कोई सुनेगा नहीं।

ताकि बहाने न बनाने पड़ें — क्या करें:

  1. रोज का काम रोज कीजिए। स्कूल से लौटकर पहले वही काम निपटाइए जो सबसे भारी लगे।
  2. छोटी-सी योजना बनाइए — गृहकार्य की एक सूची लिखकर पूरा होने पर निशान लगाइए।
  3. न समझ आए तो पूछिए — शिक्षक, माता-पिता या मित्र से। ज्यादातर बहाने ‘समझ न आने’ से शुरू होते हैं।
  4. सच बोलिए, समय रहते — “काम नहीं हो पाया, कल तक कर दूँगा” कहने पर आमतौर पर मौका मिल ही जाता है।
  5. अपनी दिनचर्या बाँधिए — पढ़ाई, खेल और सोने का समय तय हो तो काम पिछड़ता ही नहीं।
  6. बड़े क्या करें — बच्चों को इतना भरोसा दें कि वे सच बोल सकें। जहाँ डर कम होता है, वहाँ बहाने अपने आप कम हो जाते हैं।
कहानी का प्रमाण: बच्चे ने बहाना बनाकर एक दिन बचाना चाहा था, पर उसे मिला — भूख, ऊब, अकेलापन और दुगुना होमवर्क। यानी बहाना काम को टालता है, मिटाता नहीं।
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