प्र1.
“मैं रजाई में पड़ा-पड़ा घर में चल रही गतिविधियों का अनुमान लगाता रहा।” कहानी में बच्चे ने अनेक प्रकार के अनुमान लगाए हैं। क्या आपने कभी किसी अनदेखे व्यक्ति/वस्तु/पशु-पक्षी/स्थान आदि के विषय में अनुमान लगाए हैं? किसके बारे में? क्या? कब? विस्तार से बताइए। (संकेत — जैसे पेड़ से आने वाली आवाज सुनकर किसी प्राणी का अनुमान लगाना; कहीं दूर रहने वाले किसी संबंधी/रिश्तेदार के विषय में सुनकर उसके संबंध में अनुमान लगाना।)
उत्तर
पहले देखिए कि कहानी का बच्चा कैसे अनुमान लगाता है — वह कुछ देख नहीं रहा, केवल आवाजें सुन रहा है और उन्हीं से पूरा दृश्य बना लेता है:
| उसे क्या सुनाई/महसूस हुआ | उसने क्या अनुमान लगाया |
|---|---|
| नल और कदमों की आवाज | “अब छोटे मामा नहाकर निकले।” |
| जल्दबाजी की आहट | “अब कुसुम मौसी रोज की तरह नाश्ता छोड़कर कॉलेज बस पकड़ने भागीं।” |
| इधर-उधर खटकने की आवाज | “अब मुन्नू अपना जूता ढूँढ़ रहा है।” |
| पास के कमरे में खटर-पटर | “मुन्नू स्कूल से आ गया है। तो क्या एक बज गया?” |
| बर्तनों की आवाज और चबाने की ध्वनि | “शायद सब लोग खाना खाने बैठ रहे हैं।” |
| हींग-जीरे की खुशबू | “अरहर की दाल… फिर उसमें उन्होंने नीबू निचोड़ा होगा।” |
अब अपना अनुभव लिखिए। अच्छे उत्तर में यह होना चाहिए: किसके बारे में अनुमान लगाया, किस संकेत से लगाया, और बाद में वह सही निकला या गलत।
नमूना उत्तर: “पिछली बरसात में हमारे आँगन के अमरूद के पेड़ से रात को खटखट और पत्तों के सरसराने की आवाजें आने लगीं। मैंने अनुमान लगाया कि कोई बड़ी बिल्ली होगी, क्योंकि आवाज भारी थी और डाल हिल रही थी। सुबह देखा तो पेड़ पर आधे कुतरे हुए अमरूद पड़े थे और मुझे समझ आया कि वह कोई गिलहरी-चमगादड़ नहीं, बंदरों का झुंड था जो सुबह-सुबह फिर आ गया। मेरा अनुमान आधा सही निकला — जानवर तो था, पर वह नहीं जो मैंने सोचा।”
अनुमान कैसे लगता है: हमारे पास कुछ संकेत होते हैं — आवाज, गंध, समय, आदत — और बाकी हिस्सा हमारा अनुभव भर देता है। इसीलिए बच्चा घड़ी देखे बिना कह पाता है, “तो क्या एक बज गया?” — क्योंकि मुन्नू रोज उसी समय लौटता है। अनुमान अंदाजा है, इसलिए वह गलत भी हो सकता है।