मल्हार अध्याय 5 अभिनय

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
“बुखार आ गया।” मैंने कराहते हुए कहा।
उत्तर

कौन बोल रहा है: बहाना बनाने वाला बच्चा, रजाई में लेटे-लेटे, जब नानाजी पूछते हैं “क्या हो गया?”

अभिनय कैसे करें —

  • आवाज: बहुत धीमी और लड़खड़ाती हुई; ‘आ गया’ को खींचकर बोलिए — “बुऽखाऽर… आ गया।”
  • कराहना: बोलने से पहले हल्की-सी “उँह…” की आवाज निकालिए, यही ‘कराहते हुए’ का अर्थ है।
  • मुद्रा: लेटे हुए, माथे पर हाथ, आँखें आधी बंद, शरीर ढीला।
  • चेहरा: भौंहें सिकुड़ी हुई, पर एक क्षण के लिए आँख खोलकर देखिए कि सुनने वाले ने विश्वास किया या नहीं — इसी झलक से दर्शकों को हँसी आएगी।
टिप: यहाँ असली मजा “झूठे दर्द” में है — दर्द दिखाना जरा-सा ज्यादा हो जाए तो हास्य अपने आप बन जाता है।
प्र2.
“आपको पता नहीं चल रहा। थर्मामीटर लगाकर देखिए।” मैंने कहा।
उत्तर

प्रसंग: नानाजी माथा और नब्ज देखकर कह चुके हैं, “बुखार तो नहीं है।” अब बच्चे को अपनी बात बचानी है।

अभिनय कैसे करें —

  • आवाज: पहली पंक्ति में हल्की-सी शिकायत और जिद — “आपको पता नहीं चल रहा।” दूसरी में सलाह देने जैसा भरोसा — “थर्मामीटर लगाकर देखिए।”
  • गति: जरा जल्दी बोलिए — जो झूठ पकड़ा जाने वाला हो, उसे बचाने की जल्दी होती है।
  • मुद्रा: कोहनी के सहारे थोड़ा उठकर बैठिए, हाथ से थर्मामीटर लगाने का इशारा कीजिए, फिर तुरंत वापस लेट जाइए।
  • चेहरा: गंभीर और आश्वस्त — मानो आप ही सबसे बड़े जानकार हों।
यह संवाद खास क्यों है: बच्चे को मालूम है कि घर में कोई है ही नहीं — “थर्मामीटर लगा भी लिया तो देखेगा कौन?” यानी यह उसकी सोची-समझी चाल है। अभिनय में यह चतुराई झलकनी चाहिए।
प्र3.
“मेरे सिर में दर्द हो रहा है। पेट भी दुख रहा है और मुझे बुखार भी है।”
उत्तर

प्रसंग: सुबह नानीजी के “क्या हो गया?” पूछने पर बच्चे का उत्तर — एक साथ तीन बीमारियाँ।

अभिनय कैसे करें —

  • तीन इशारे, तीन ठहराव: “सिर में दर्द” कहते हुए माथा पकड़िए → रुकिए; “पेट भी दुख रहा है” कहते हुए पेट पर हाथ रखिए → रुकिए; “बुखार भी है” कहते हुए दोनों हाथ रजाई में समेट लीजिए।
  • चढ़ता स्वर: हर शिकायत पिछली से थोड़ी और दुखी सुनाई दे — जैसे सूची लंबी करते जा रहे हों।
  • ‘भी’ पर जोर: “पेट भी”, “बुखार भी” — यही दो शब्द बताते हैं कि वह बहाने को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहा है।
टिप: एक साथ इतनी बीमारियाँ गिनाना ही इस संवाद का हास्य है। इसे बिना हँसे, पूरी गंभीरता से बोलेंगे तो कक्षा में सबसे ज्यादा हँसी आएगी।
प्र4.
नानाजी आए। बोले, “अब कैसा है सिरदर्द?”
उत्तर

कौन बोल रहा है: नानाजी — दोपहर में दोबारा हाल पूछने आते हैं।

अभिनय कैसे करें —

  • प्रवेश: धीमे, स्थिर कदमों से मंच पर आइए; बड़े-बुजुर्ग की चाल दिखाइए — जल्दबाजी बिलकुल नहीं।
  • आवाज: भारी, शांत और थोड़ी रुखी-सी अपनत्व भरी। स्वर में न घबराहट हो, न ज्यादा दुलार।
  • मुद्रा: बिस्तर के पास झुककर, एक हाथ पीठ पर रखकर, बच्चे के माथे की ओर देखते हुए पूछिए।
  • ठहराव: “अब कैसा है…” कहकर जरा रुकिए, फिर “सिरदर्द?” — इस ठहराव से लगेगा कि वे बच्चे का चेहरा पढ़ रहे हैं।
ध्यान रखिए: नानाजी को शक हो चुका है (“बुखार तो नहीं है”), फिर भी वे देखभाल कर रहे हैं। इसलिए आवाज में डाँट नहीं, हल्की-सी जाँच का भाव होना चाहिए।
प्र5.
फिर नानाजी बोले, “आज इसे कुछ खाने को मत देना। आराम करने दो। शाम को देखेंगे।”
उत्तर

प्रसंग: नानाजी नानीजी से कह रहे हैं — यह वही आदेश है जिससे बच्चे का पूरा दिन भूखा बीतता है।

अभिनय कैसे करें —

  • दिशा: बच्चे की ओर नहीं, बगल में खड़ी नानीजी की ओर देखकर बोलिए — बात उन्हीं से हो रही है।
  • आवाज: दृढ़ और निर्णय जैसी; तीनों वाक्य छोटे-छोटे और साफ, जैसे कोई नियम बता रहा हो।
  • मुद्रा: पहला वाक्य कहते हुए हाथ से हल्का-सा मना करने का इशारा; “शाम को देखेंगे” कहते हुए मुड़कर जाने लगिए।
  • दूसरा पात्र: जो बच्चा बना है, वह इसी समय रजाई के भीतर से घबराई हुई आँखों से देखे — दर्शक तभी समझेंगे कि यह आदेश उसके लिए सजा है।
समूह के लिए सुझाव: इन पाँच संवादों को क्रम से जोड़कर एक छोटा दृश्य भी खेला जा सकता है — तीन पात्र चाहिए: बच्चा, नानाजी और नानीजी। एक कुर्सी या चादर से बिस्तर बना लीजिए, बस इतना ही मंच काफी है।
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