प्र1.
(क) इस कहानी में अनेक रोचक घटनाएँ हैं जिन्हें पढ़कर चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। इस कहानी में किन बातों को पढ़कर आपके चेहरे पर भी मुस्कान आ गई थी? उन्हें रेखांकित कीजिए। (इन्हें रेखांकित करने के लिए आप किसी अन्य रंग का उपयोग कर सकते हैं।)
उत्तर
यह अपनी पसंद का काम है — अपनी पुस्तक में इन जैसी पंक्तियों के नीचे रंगीन पेंसिल से लकीर खींचिए। मुस्कान लाने वाली प्रमुख पंक्तियाँ ये हैं —
- “क्या ठाठ हैं बीमारों के भी। … काश! सुधाकर काका की जगह मैं होता! मैं कब बीमार पड़ूँगा!”
- “मैंने सोचा बीमार पड़ने के लिए आज का दिन बिलकुल ठीक रहेगा। चलो बीमार पड़ जाते हैं।”
- “आपको पता नहीं चल रहा। थर्मामीटर लगाकर देखिए।” — और आगे, “थर्मामीटर लगा भी लिया तो देखेगा कौन?”
- “मैं पता नहीं कब नींद में गुड़प हो गया।”
- “कोई ताजमहल तो नहीं माँग लेता।”
- “पूरी गुठली मुँह में ठूंसे। जैसे आम कभी देखे न हों। भुक्कड़ कहीं का।”
- “अक्लमन्द! और बनो बीमार।”
- “उस पूरे दिन मुझे भूखे पेट ही रहना पड़ा। सारे विकार निकल गए।”
हँसी कहाँ से आती है: ज्यादातर जगह हास्य उलटी बात से बनता है — बीमारी को कोई सौभाग्य समझना, भूख को इलाज मानना, या खुद को ही “अक्लमन्द” कहना। लेखक कहीं मजाक बनाने की कोशिश नहीं करता; स्थिति ही मजाकिया है।