मल्हार अध्याय 5 चेहरों पर मुस्कान, मुँह में पानी

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) इस कहानी में अनेक रोचक घटनाएँ हैं जिन्हें पढ़कर चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। इस कहानी में किन बातों को पढ़कर आपके चेहरे पर भी मुस्कान आ गई थी? उन्हें रेखांकित कीजिए। (इन्हें रेखांकित करने के लिए आप किसी अन्य रंग का उपयोग कर सकते हैं।)
उत्तर

यह अपनी पसंद का काम है — अपनी पुस्तक में इन जैसी पंक्तियों के नीचे रंगीन पेंसिल से लकीर खींचिए। मुस्कान लाने वाली प्रमुख पंक्तियाँ ये हैं —

  • “क्या ठाठ हैं बीमारों के भी। … काश! सुधाकर काका की जगह मैं होता! मैं कब बीमार पड़ूँगा!”
  • “मैंने सोचा बीमार पड़ने के लिए आज का दिन बिलकुल ठीक रहेगा। चलो बीमार पड़ जाते हैं।
  • “आपको पता नहीं चल रहा। थर्मामीटर लगाकर देखिए।” — और आगे, “थर्मामीटर लगा भी लिया तो देखेगा कौन?”
  • “मैं पता नहीं कब नींद में गुड़प हो गया।”
  • “कोई ताजमहल तो नहीं माँग लेता।”
  • “पूरी गुठली मुँह में ठूंसे। जैसे आम कभी देखे न हों। भुक्कड़ कहीं का।
  • अक्लमन्द! और बनो बीमार।
  • “उस पूरे दिन मुझे भूखे पेट ही रहना पड़ा। सारे विकार निकल गए।
हँसी कहाँ से आती है: ज्यादातर जगह हास्य उलटी बात से बनता है — बीमारी को कोई सौभाग्य समझना, भूख को इलाज मानना, या खुद को ही “अक्लमन्द” कहना। लेखक कहीं मजाक बनाने की कोशिश नहीं करता; स्थिति ही मजाकिया है।
प्र2.
(ख) इस कहानी में किन वाक्यों को पढ़कर आपके मुँह में पानी आ गया था? उन्हें रेखांकित कीजिए।
उत्तर

खाने-पीने के वर्णन वाली ये पंक्तियाँ रेखांकित कीजिए —

  • “नानीजी ने चम्मच से धीरे-धीरे काका को साबूदाने की खीर खिलाई। काका ने बहुत स्वाद लेकर खीर खाई।”
  • गरमागरम खस्ता कचौड़ी… मावे की बर्फी… बेसन की चिक्की… गोलगप्पे। और सबसे ऊपर साबूदाने की खीर!”
  • अरहर की दाल में हींग-जीरे का बघार और ऊपर से बारीक कटा हरा धनिया और आधा चम्मच देसी घी। फिर उसमें उन्होंने नीबू निचोड़ा होगा।”
  • “हाँ, दाल-चावल, तली हुई हरी मिर्ची।”
  • “कितना मजा आता जब रिसेस में ठेले पर जाकर नमक मिर्च लगे अमरूद खाते कटर-कटर।”
  • “लेकिन मुन्नू आम चूस रहा था। आम! इस मौसम में!”
  • “जैसे गुझिया सिर्फ होली-दिवाली और पंजीरी सिर्फ पूर्णिमा के दिन ही बनाई जाती है।”
ध्यान दीजिए कि लेखक क्या करता है: वह केवल व्यंजन का नाम नहीं लिखता — साथ में उसकी खुशबू (हींग-जीरे का बघार), रूप (बारीक कटा हरा धनिया) और आवाज (कटर-कटर) भी लिखता है। इसी से पढ़ने वाले के मुँह में पानी आ जाता है। यह भी ‘चित्रात्मक भाषा’ का ही एक रूप है।
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