मल्हार अध्याय 5 लेखन के अनोखे तरीके

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
1. ऐसा लगा मानो हमें देखकर सुधाकर काका खुश हो गए।
उत्तर

कहानी में यह बात इस तरह लिखी गई है —

“हमें देखकर सुधाकर काका जैसे खुश हो गए।”

अंतर कहाँ है: ‘ऐसा लगा मानो’ जैसे लंबे वाक्यांश की जगह लेखक ने केवल एक छोटा-सा शब्द ‘जैसे’ रख दिया। इससे वाक्य छोटा, सहज और बोलचाल जैसा हो गया — और उसका अर्थ जरा भी नहीं बदला। यह शब्द यह भी बताता है कि बच्चा पूरी तरह निश्चित नहीं था; काका बहुत बीमार थे, फिर भी उनके चेहरे पर हल्की खुशी दिखी।
प्र2.
2. खिड़कियाँ बहुत बड़ी थीं और उनके बाहर हरे पेड़ हवा से हिल रहे थे।
उत्तर

कहानी में यह बात इस तरह लिखी गई है —

“बड़ी-बड़ी खिड़कियों के पास हरे-हरे पेड़ झूम रहे थे।”

तीन बदलाव देखिए:
  • ‘बहुत बड़ी’ → ‘बड़ी-बड़ी’ और ‘हरे’ → ‘हरे-हरे’ — शब्द को दोहराने से आकार और रंग दोनों बढ़ जाते हैं। ऐसे दोहरे शब्दों को पुनरुक्त शब्द कहते हैं।
  • ‘हिल रहे थे’ → ‘झूम रहे थे’ — ‘हिलना’ केवल गति बताता है, ‘झूमना’ में खुशी भी है। पेड़ों को इंसान की तरह झूमते दिखाना मानवीकरण कहलाता है।
  • लंबा वाक्य टूटकर एक छोटी, बहती हुई पंक्ति बन गया।
प्र3.
3. वहाँ केवल लोगों के फुसफुसाने की आवाजें आ रही थीं।
उत्तर

कहानी में यह बात इस तरह लिखी गई है —

“सिर्फ लोगों के धीरे-धीरे बातचीत करने की धीमी-धीमी गुनगुन।”

खूबी: ‘आवाजें’ जैसा सादा शब्द हटाकर लेखक ने ‘गुनगुन’ रखा — यह शब्द अपनी ध्वनि से ही वैसी आवाज सुना देता है, जैसा वह बताना चाहता है। ऐसे शब्दों को अनुकरणात्मक (ध्वन्यात्मक) शब्द कहते हैं, जैसे — खटर-पटर, सरसराहट, कटर-कटर। साथ में ‘धीरे-धीरे’ और ‘धीमी-धीमी’ की जोड़ी से वहाँ की शांति और गहरी हो जाती है।
और भी ध्यान दीजिए: यहाँ पूरा वाक्य क्रिया के बिना है — ‘थीं’ या ‘आ रही थीं’ कहीं नहीं। ऐसे अधूरे-से वाक्य पढ़ने में चित्र की तरह ठहर जाते हैं।
प्र4.
4. फुसफुसाने की आवाजों के सिवा वहाँ कोई आवाज नहीं थी।
उत्तर

कहानी में यह बात इस तरह लिखी गई है —

“बाकी एकदम शांति।”

खूबी: पूरे तेरह शब्दों की बात लेखक ने केवल तीन शब्दों में कह दी। इससे पहले वह लिख चुका है — “न ट्रैफिक का शोरगुल, न धूल, न मच्छर-मक्खी…।” इसलिए अब लंबी बात दोहराने की जरूरत नहीं रही। छोटा वाक्य पढ़ते ही मन में वैसा ही ठहराव आ जाता है, जैसा अस्पताल में था — यानी वाक्य की लंबाई भी अर्थ पैदा करती है।
प्र5.
5. बीमार लोगों के बहुत मजे होते हैं।
उत्तर

कहानी में यह बात इस तरह लिखी गई है —

“क्या ठाठ हैं बीमारों के भी।”

खूबी: तीन चीजें बदलीं —
  • ‘मजे’ → ‘ठाठ’ — ‘ठाठ’ में केवल मजा नहीं, शान और ऐश्वर्य भी है; बीमार के लिए ऐसा शब्द चौंकाता है।
  • सीधा वाक्य → विस्मय-वाक्य — ‘क्या…!’ से लगने लगता है कि बच्चा उसी क्षण मन-ही-मन बोल रहा है।
  • ‘भी’ शब्द — यही असली मजा है। ‘भी’ का अर्थ है: “और तो और, बीमारों तक के ठाठ हैं!” इसी एक अक्षर से पूरी पंक्ति में व्यंग्य आ जाता है।
प्र6.
6. मैं झूठमूठ बीमार पड़ जाता हूँ।
उत्तर

कहानी में यह बात इस तरह लिखी गई है —

“चलो बीमार पड़ जाते हैं।”

खूबी: लेखक ने ‘झूठमूठ’ शब्द लिखा ही नहीं — फिर भी झूठ पूरी तरह समझ आ जाता है। ‘चलो’ शब्द ऐसा है जो किसी मनचाहे काम के लिए बोला जाता है — “चलो खेलते हैं”, “चलो घूम आते हैं”। इसी शब्द के कारण बीमारी एक चुना हुआ काम लगने लगती है, और यहीं से हास्य पैदा होता है।
निचोड़: इन छहों उदाहरणों से एक ही बात सीखने को मिलती है — कम शब्दों में, सही शब्द चुनकर लिखना ही लेखन को सुंदर बनाता है। लंबा लिखना आसान है; छोटा और सटीक लिखना कठिन।
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