मल्हार अध्याय 5 खोजबीन

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
कहानी में से वे वाक्य ढूँढ़कर लिखिए जिनसे पता चलता है कि— (क) कहानी में सर्दी के मौसम की घटनाएँ बताई गई हैं।
उत्तर

ये वाक्य सर्दी का मौसम बताते हैं —

  • “सब पर एक जैसी सफेद चादर और लाल कंबल।”
  • “मैं रजाई से निकला ही नहीं।”
  • “मैं रजाई में पड़ा-पड़ा घर में चल रही गतिविधियों का अनुमान लगाता रहा।”
  • “न चाहते हुए भी मुझे कड़वी पुड़िया खानी पड़ी और काढ़े जैसी चाय पीनी पड़ी।”
  • “जब रहा नहीं गया तो मैं रजाई फेंककर खड़ा हो गया।”
  • “लेकिन मुन्नू आम चूस रहा था। आम! इस मौसम में! जरूर बंबई वाले चाचाजी ने भेजे होंगे।”
सबसे पक्का सबूत कौन-सा: रजाई और कंबल तो सीधे सर्दी बताते ही हैं, पर सबसे चतुर संकेत आम वाला है — बच्चा खुद चौंकता है “आम! इस मौसम में!” यानी यह आम का मौसम नहीं है। आम गरमियों का फल है, इसलिए यह सर्दी का समय ही होगा। इसी कारण आम बाहर से मँगवाने पड़े।
प्र2.
(ख) बच्चे को बहाना बनाने के परिणाम का आभास हो गया।
उत्तर

ये वाक्य बताते हैं कि उसे अपनी करनी का नतीजा समझ आ गया —

  • “क्या मुसीबत है! पड़े रहो! आखिर कब तक कोई पड़ा रह सकता है? इससे तो स्कूल चला जाता तो ही ठीक रहता। सजा मिलती तो मिल जाती।”
  • “हे भगवान! यह तो अच्छी खासी बोरियत हो गई। पूरा दिन कोई कैसे लेटा रहे?”
  • अक्लमन्द! और बनो बीमार। और आज दिया गया होमवर्क! किससे कॉपी माँगोगे? मैं रुआँसा हो गया।”
  • “उस पूरे दिन मुझे भूखे पेट ही रहना पड़ा। सारे विकार निकल गए।”
  • इसके बाद स्कूल से छुट्टी मारने के लिए मैंने बीमारी का बहाना कभी नहीं बनाया।
ध्यान दीजिए: “अक्लमन्द! और बनो बीमार।” वाक्य में वह खुद को ही ताना मार रहा है। इसी को आत्म-व्यंग्य कहते हैं — और यही पछतावे का सबसे साफ प्रमाण है।
प्र3.
(ग) बच्चे को खाना-पीना बहुत प्रिय है।
उत्तर

पूरी कहानी में खाने का जिक्र बार-बार आता है। ये वाक्य उसका खाने-पीने का शौक दिखाते हैं —

  • “ठाठ से साफ-सुथरे बिस्तर पर लेटे रहो और साबूदाने की खीर खाते रहो!
  • “गरमागरम खस्ता कचौड़ी… मावे की बर्फी… बेसन की चिक्की… गोलगप्पे। और सबसे ऊपर साबूदाने की खीर!”
  • “खुशबू तो दाल-चावल की आ रही है। अरहर की दाल में हींग-जीरे का बघार और ऊपर से बारीक कटा हरा धनिया और आधा चम्मच देसी घी।”
  • “कितना मजा आता जब रिसेस में ठेले पर जाकर नमक मिर्च लगे अमरूद खाते कटर-कटर।
  • “जब रहा नहीं गया तो मैं रजाई फेंककर खड़ा हो गया। दबे पाँव दरवाजे तक गया और चुपके से झाँककर देखा।”
  • “पूछते तो मैं साबूदाने की खीर ही तो माँगता।”
भाषा की खूबी: लेखक केवल “उसे खाना पसंद था” नहीं लिखता — वह व्यंजनों के नाम, उनकी खुशबू और आवाज (“कटर-कटर”) तक लिख देता है। इसी से पढ़ते-पढ़ते हमारे मुँह में भी पानी आ जाता है।
प्र4.
(घ) बच्चे को स्कूल जाना अच्छा लगता है।
उत्तर

यह बात कहानी में सीधे नहीं कही गई, पर इन वाक्यों से साफ झलकती है —

  • इससे तो स्कूल चला जाता तो ही ठीक रहता। सजा मिलती तो मिल जाती। कितना मजा आता जब रिसेस में ठेले पर जाकर नमक मिर्च लगे अमरूद खाते कटर-कटर।”
  • “कुछ देर इधर-उधर की, स्कूल की, दोस्तों की बातें सोचता रहा…
  • “और आज दिया गया होमवर्क! किससे कॉपी माँगोगे? मैं रुआँसा हो गया।”
  • “इसके बाद स्कूल से छुट्टी मारने के लिए मैंने बीमारी का बहाना कभी नहीं बनाया।”
कैसे पता चलता है: जो बच्चा घर में अकेला पड़ा हो और दिनभर स्कूल और दोस्तों की ही बातें सोचे, उसे स्कूल नापसंद नहीं हो सकता। उसे नापसंद केवल एक बात थी — बिना गृहकार्य के जाकर सजा पाना। ऊब का दिन झेलने के बाद उसे स्कूल की कीमत समझ आ गई।
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