प्र1.
कहानी को एक बार पुन: पढ़कर पता लगाइए— (क) बच्चे के सामने क्या समस्या थी? उसने उस समस्या का क्या समाधान निकाला?
उत्तर
समस्या: उस दिन बच्चे का स्कूल जाने का मन नहीं था और उसने गृहकार्य भी नहीं किया था। स्कूल जाता तो सजा मिलना तय था — “स्कूल जाता तो जरूर सजा मिलती।”
उसका निकाला हुआ समाधान: उसने बीमार पड़ने का बहाना बनाया —
- रजाई से निकला ही नहीं और कहा, “मैं आज बीमार हूँ।”
- तीन शिकायतें एक साथ गिना दीं — “मेरे सिर में दर्द हो रहा है। पेट भी दुख रहा है और मुझे बुखार भी है।”
- खुद को सच्चा साबित करने के लिए चाल भी चली — “थर्मामीटर लगाकर देखिए” (उसे पता था कि घर में कोई देखने वाला नहीं है)।
- नानाजी के आने पर कराहकर बोला — “बुखार आ गया।”
क्या यह समाधान चला? बिलकुल नहीं। इसका नतीजा हुआ — कड़वी पुड़िया, काढ़े जैसी चाय, दिनभर की ऊब, अकेलापन और भूख। और गृहकार्य फिर भी बचा रहा, बल्कि बढ़ गया।
असली समाधान क्या होता: सच बोलकर मदद माँगना — “काम नहीं हुआ है, थोड़ी मदद कीजिए।” समस्या का हल समस्या से भागने में नहीं, उसका सामना करने में है। कहानी के अंत में बच्चा खुद यही समझता है।