प्र1.
आपने इस पाठ में गिरिधर कविराय की कुंडलिया “बिना विचारे जो करै....।” को पढ़ा। अब आप नीचे दी गई इंटरनेट कड़ी का प्रयोग करके एक अन्य कहानी “बिना विचारे करो न काम” सुन सकते हैं— (पुस्तक में क्यू.आर. कोड दिया गया है।)
उत्तर
यह सुनने और खोजने की गतिविधि है। पुस्तक के पृष्ठ 82 पर दिए गए क्यू.आर. कोड को अपने शिक्षक या घर के बड़ों के साथ मिलकर स्कैन कीजिए और कहानी “बिना विचारे करो न काम” सुनिए।
सुनते समय ये बातें नोट कीजिए —
| क्या देखना है | अपनी कॉपी में लिखिए |
|---|---|
| पात्र कौन-कौन हैं? | नाम और उनका स्वभाव — कौन जल्दबाज़ था, कौन धैर्य रखने वाला। |
| बिना सोचे कौन-सा काम हुआ? | वह एक क्षण जिससे पूरी कहानी मुड़ गई। |
| उसका क्या परिणाम निकला? | किसे नुकसान हुआ और कैसे। |
| कहानी की सीख क्या है? | अपने शब्दों में एक वाक्य। |
| कुंडलिया से मेल | कुंडलिया की कौन-सी पंक्ति इस कहानी पर सबसे सटीक बैठती है? |
आगे बढ़कर करने योग्य काम:
- तुलना कीजिए — कहानी और कुंडलिया, दोनों एक ही बात कहती हैं। पर कहानी घटना से समझाती है और कुंडलिया केवल दो पंक्तियों में। दोनों में कौन-सा तरीका आपको अधिक असरदार लगा और क्यों — पाँच पंक्तियों में लिखिए।
- और खोजिए — गिरिधर कविराय की कुछ और प्रसिद्ध कुंडलियाँ ढूँढ़िए — जैसे “लाठी में गुन बहुत हैं सदा राखिए संग” और “सुख के मीत सबै मिलैं”। पुस्तकालय की हिंदी काव्य-संग्रह पुस्तक में ये आसानी से मिल जाएँगी।
- कहावतें जुटाइए — अपने घर और मोहल्ले के बड़ों से पूछिए कि वे “सोच-समझकर काम करने” पर कौन-सी कहावत बोलते हैं — जैसे “सौ बार सोचो, एक बार करो”, “जल्दी का काम शैतान का”, “दूध का जला छाछ भी फूँककर पीता है”। इनकी सूची कक्षा में लगाइए।
- सुनाइए — यही कहानी अपने शब्दों में छोटे भाई-बहन को सुनाइए और अंत में कुंडलिया की पंक्ति जोड़ दीजिए।
सुरक्षा का सुझाव: इंटरनेट पर कोई भी कड़ी खोलते समय बड़ों को साथ रखिए। यह भी इसी पाठ की सीख है — “बिना बिचारे” कोई लिंक मत खोलिए।