मल्हार अध्याय 9 झरोखे से

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
कविता में पक्षियों के ‘सीमा-हीन गगन में उड़ने’ की बात कही गई है। पक्षियों का आकाश में उड़ना उद्देश्यपूर्ण है। पक्षियों की उड़ान से जुड़ी एक रोचक जानकारी आगे दी गई है। इसे पढ़कर आप पक्षियों की उड़ान से जुड़े कुछ नए तथ्यों को जान पाएँगे। [पाठ — ‘पक्षियों की प्रवास यात्राएँ’, पक्षी-जगत, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, दिल्ली]
उत्तर

‘पक्षियों की प्रवास यात्राएँ’ नामक यह गद्यांश पक्षी-जगत (राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, दिल्ली) से लिया गया है। इसका मूल विषय है — प्रवास, यानी पक्षियों का मौसम के अनुसार एक जगह से दूसरी जगह जाना और फिर लौट आना।

गद्यांश से मिले मुख्य तथ्य:

बातगद्यांश क्या बताता है
कब और कहाँ से कहाँहर साल शरद ऋतु और जाड़ों की शुरुआत में एशिया, यूरोप और अमरीका के उत्तरी भागों से अनेक पक्षी गरम देशों में आ जाते हैं; वसंत और गरमियों में फिर उत्तर लौट जाते हैं।
समय की पाबंदीवे समय के इतने पक्के होते हैं कि उनके आने-जाने के एक-एक दिन की ठीक गणना की जा सकती है। केवल प्रतिकूल मौसम में ही देर होती है।
छोटी दूरी का प्रवासकुछ पक्षी थोड़ी ही दूर जाते हैं। रहन-सहन के कष्ट या भोजन कम पड़ने पर होने वाला यह आवागमन मुख्यतः उत्तर भारत में दिखता है, जहाँ मौसम भिन्न-भिन्न और तीव्र होते हैं।
ऊँचाई का प्रवासजो पक्षी गरमियाँ ऊँचे पहाड़ों पर बिताते हैं, वे जाड़ों में निचली पहाड़ियों, तराई या मैदानों में उतर आते हैं। भारत में यह बहुत होता है, क्योंकि गंगा के मैदान के बराबर ही विशाल हिमालय है।
रास्ते के कष्टइन “छोटे-छोटे वीर यात्रियों” को जंगल, मैदान और समुद्र पार करने पड़ते हैं। भयंकर तूफ़ान उन्हें मार्ग से भटका देते हैं, आँधियाँ समुद्र की ओर धकेल देती हैं और रात में नगर का तीव्र प्रकाश उन्हें भटका देता है।
यात्रा की शैलीकुछ पक्षी रुक-रुक कर चलते हैं ताकि थकान न हो; कुछ बिना रुके, बिना खाए, लगातार बहुत लंबी यात्रा पूरी कर लेते हैं। कुछ केवल दिन में उड़ते हैं, कुछ दिन-रात दोनों; पर अधिकतर सूर्यास्त के बाद आगे बढ़ते हैं।
दल बनाकर उड़नापक्षी प्रायः दल बनाकर उड़ते हैं। सारस और हंस आकाश में ‘वी’ (V) की आकृति में उड़ते हैं। अबाबील, चकदिल, फुदकी, समुद्रतटीय पक्षी और जलपक्षी दलों में इकट्ठे होते हैं, और हर दल में एक ही प्रकार के पक्षी होते हैं।
कविता से जोड़िए: कविता कहती है “जहाँ चाहते, जाते हैं!” — पर यह गद्यांश बताता है कि उनका जाना मनमाना नहीं, उद्देश्यपूर्ण है। वे भोजन और अनुकूल मौसम की खोज में हज़ारों किलोमीटर उड़ते हैं। स्वतंत्रता का अर्थ आवारगी नहीं, बल्कि अपने उद्देश्य की ओर बिना रुकावट बढ़ना है — यही दोनों पाठों का साझा संदेश है।
‘वी’ आकार क्यों: आगे उड़ने वाला पक्षी हवा को चीरता है और पीछे वालों को कम ज़ोर लगाना पड़ता है। थकने पर आगे वाला पीछे चला जाता है और दूसरा उसकी जगह ले लेता है — यह भी “सब मिल-जुलकर” का ही एक सुंदर उदाहरण है।
भारत में देखिए: हर जाड़े में साइबेरिया से सारस और बत्तखें भरतपुर (केवलादेव), चिल्का झील, सांभर झील और नल सरोवर तक पहुँचती हैं। पास की किसी झील पर जाड़ों में जाइए — प्रवासी पक्षी आपको स्वयं दिख जाएँगे।
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