मल्हार अध्याय 9 सोच-विचार के लिए

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
नीचे कविता की कुछ पंक्तियाँ और उनसे संबंधित प्रश्न दिए गए हैं। कविता पढ़ने के बाद अपनी समझ के आधार पर प्रश्नों के उत्तर दीजिए। (क) “सब मिल-जुलकर रहते हैं वे, सब मिल-जुलकर खाते हैं” पक्षियों के आपसी सहयोग की यह भावना हमारे लिए किस प्रकार उपयोगी है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर

पक्षियों की यह भावना हमें सिखाती है कि साथ रहने और बाँटकर खाने से जीवन आसान भी होता है और सुंदर भी। वन में खंजन, कपोत, चातक, कोकिल, काक, हंस और शुक — सब अलग-अलग जाति के पक्षी हैं, फिर भी वे ‘हिलमिल’ कर रहते हैं। यही बात मनुष्यों के समाज पर लागू होती है।

यह भावना हमारे लिए इन तरीक़ों से उपयोगी है —

  • बड़ा काम आसान हो जाता है — खेत की कटाई, बाढ़ में बचाव, गाँव की सफ़ाई या विद्यालय का वार्षिकोत्सव — मिलकर करने पर हर काम हल्का लगता है।
  • किसी को भूखा नहीं रहना पड़ता — ‘मिल-जुलकर खाते हैं’ का अर्थ है, जिसके पास है वह उसके साथ बाँटता है जिसके पास नहीं है। लंगर, सहभोज और मध्याह्न भोजन इसी भावना के रूप हैं।
  • झगड़े घट जाते हैं — जहाँ बाँटने की आदत होती है, वहाँ छीना-झपटी की ज़रूरत ही नहीं पड़ती।
  • भेदभाव मिटता है — जाति, धर्म, भाषा या अमीरी-ग़रीबी के भेद तभी टिकते हैं जब लोग अलग-अलग बैठते-खाते हैं।
  • सुरक्षा मिलती है — झुंड में रहने वाले पक्षी एक-दूसरे को ख़तरे की सूचना देते हैं; वैसे ही मिलकर रहने वाले मुहल्ले में लोग एक-दूसरे का ध्यान रखते हैं।
क्यों: ‘सब’ शब्द दो बार आया है — रहने में भी और खाने में भी। कवि यह जताना चाहता है कि सहयोग केवल त्योहार के दिन का दिखावा नहीं, रोज़ के जीवन का ढंग होना चाहिए।
अपने आस-पास देखिए: मध्याह्न भोजन में सब बच्चों का एक साथ बैठकर खाना, बाढ़ के समय गाँव का सामूहिक रसोईघर, या मुहल्ले के लोगों का मिलकर तालाब की सफ़ाई करना — ये सब “सब मिल-जुलकर” के ही आधुनिक उदाहरण हैं।
प्र2.
(ख) “जो मिलता है, अपने श्रम से उतना भर ले लेते हैं” पक्षी अपनी आवश्यकता भर ही संचय करते हैं। मनुष्य का स्वभाव इससे भिन्न कैसे है?
उत्तर

पक्षी उतना ही लेते हैं जितने से उस दिन का पेट भर जाए; मनुष्य ज़रूरत से कहीं अधिक जोड़ता है और जोड़ता ही चला जाता है। यही दोनों के स्वभाव का मूल अंतर है।

बातपक्षीमनुष्य
कितना लेते हैं“उतना भर” — केवल आवश्यकता भरआवश्यकता से कई गुना अधिक
बचे हुए का क्या“औरों के हित उसे छोड़ वे देते हैं”भंडार में भर लेता है, कई बार सड़ जाने तक
दूसरों की कमाई“नहीं कमाई से औरों की अपना घर वे भरते हैं”कई बार दूसरों का हक़ छीनकर भी जोड़ता है
मन की दशा“लोभ नहीं… परवाह नहीं” — निश्चिंतऔर पाने की चिंता, खोने का डर
घर“आसमान ही उनका घर है” — जहाँ चाहें, वहाँएक घर होते हुए भी दूसरा, तीसरा जोड़ने की होड़
क्यों होता है ऐसा: मनुष्य के पास कल की चिंता और दूसरों से आगे निकलने की होड़ — दोनों हैं। पक्षी केवल आज में जीता है, इसलिए उसे भंडार की ज़रूरत नहीं पड़ती। कवि इसी अतिरिक्त संग्रह को आगे ‘सोने की कड़ियाँ’ कहता है।
ध्यान दीजिए: कवि संचय-मात्र का विरोध नहीं कर रहा। चींटी और गिलहरी भी संचय करती हैं। उसका विरोध लोभवश किए गए अनावश्यक संग्रह से है, जिससे दूसरों का हिस्सा छिन जाता है।
प्र3.
(ग) “हम स्वच्छंद और क्यों तुमने, डाली है बेड़ी पग में?” पक्षी को स्वच्छंद और मनुष्य को बेड़ियों में क्यों बताया गया है?
उत्तर

पक्षी स्वच्छंद इसलिए है कि उसने कभी कुछ बाँधा ही नहीं — न ज़मीन, न धन, न मन। मनुष्य बेड़ियों में इसलिए है कि उसने अपनी बेड़ी स्वयं बनाई है। पंक्ति में “तुमने डाली है” — यह क्रिया मनुष्य की अपनी है, किसी और ने उसे नहीं बाँधा।

पक्षी स्वच्छंद क्योंमनुष्य बेड़ी में क्यों
“आसमान ही उनका घर है; जहाँ चाहते, जाते हैं!” — कोई सीमा नहींघर, ज़मीन, सीमा और दीवारें बनाकर स्वयं को एक जगह बाँध लिया
“उनके मन में लोभ नहीं है” — पाने की भूख नहींधन-संपत्ति के लोभ ने उसे उसी के पीछे दौड़ता रहने पर मजबूर कर दिया
“परवाह नहीं” — खोने का डर नहींजो जोड़ा है वह छिन न जाए — यह चिंता दिन-रात साथ रहती है
“करते सब आपस में हिलमिल!” — कोई बैर नहींद्रोह-भावना, ऊँच-नीच और भेदभाव ने आपस में दीवारें खड़ी कर दीं
‘सोने की कड़ियाँ’ का रहस्य: कवि ने लोहे की नहीं, सोने की कड़ियाँ कहा है। लोहे की ज़ंजीर तो कोई तोड़ना चाहेगा, पर सोने की ज़ंजीर तो सुंदर लगती है — मनुष्य उसे गहना समझकर पहने रहता है। धन और सुविधा का बंधन ऐसा ही है: दिखता आभूषण जैसा है, है बेड़ी ही।
टिप: इस प्रश्न का उत्तर लिखते समय ‘तुमने डाली है’ पर ज़रूर लिखिए — यही पूरी कविता का सबसे तीखा शब्द है।
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