प्र1.
नीचे कविता की कुछ पंक्तियाँ और उनसे संबंधित प्रश्न दिए गए हैं। कविता पढ़ने के बाद अपनी समझ के आधार पर प्रश्नों के उत्तर दीजिए। (क) “सब मिल-जुलकर रहते हैं वे, सब मिल-जुलकर खाते हैं” पक्षियों के आपसी सहयोग की यह भावना हमारे लिए किस प्रकार उपयोगी है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
पक्षियों की यह भावना हमें सिखाती है कि साथ रहने और बाँटकर खाने से जीवन आसान भी होता है और सुंदर भी। वन में खंजन, कपोत, चातक, कोकिल, काक, हंस और शुक — सब अलग-अलग जाति के पक्षी हैं, फिर भी वे ‘हिलमिल’ कर रहते हैं। यही बात मनुष्यों के समाज पर लागू होती है।
यह भावना हमारे लिए इन तरीक़ों से उपयोगी है —
- बड़ा काम आसान हो जाता है — खेत की कटाई, बाढ़ में बचाव, गाँव की सफ़ाई या विद्यालय का वार्षिकोत्सव — मिलकर करने पर हर काम हल्का लगता है।
- किसी को भूखा नहीं रहना पड़ता — ‘मिल-जुलकर खाते हैं’ का अर्थ है, जिसके पास है वह उसके साथ बाँटता है जिसके पास नहीं है। लंगर, सहभोज और मध्याह्न भोजन इसी भावना के रूप हैं।
- झगड़े घट जाते हैं — जहाँ बाँटने की आदत होती है, वहाँ छीना-झपटी की ज़रूरत ही नहीं पड़ती।
- भेदभाव मिटता है — जाति, धर्म, भाषा या अमीरी-ग़रीबी के भेद तभी टिकते हैं जब लोग अलग-अलग बैठते-खाते हैं।
- सुरक्षा मिलती है — झुंड में रहने वाले पक्षी एक-दूसरे को ख़तरे की सूचना देते हैं; वैसे ही मिलकर रहने वाले मुहल्ले में लोग एक-दूसरे का ध्यान रखते हैं।
क्यों: ‘सब’ शब्द दो बार आया है — रहने में भी और खाने में भी। कवि यह जताना चाहता है कि सहयोग केवल त्योहार के दिन का दिखावा नहीं, रोज़ के जीवन का ढंग होना चाहिए।
अपने आस-पास देखिए: मध्याह्न भोजन में सब बच्चों का एक साथ बैठकर खाना, बाढ़ के समय गाँव का सामूहिक रसोईघर, या मुहल्ले के लोगों का मिलकर तालाब की सफ़ाई करना — ये सब “सब मिल-जुलकर” के ही आधुनिक उदाहरण हैं।