अन्वेषण अध्याय 10 महत्वपूर्ण प्रश्न

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
संविधान क्या है और इसकी आवश्यकता क्यों होती है?
उत्तर

संविधान वह प्रलेख है, जो किसी देश के मूल सिद्धांतों और कानूनों को स्पष्ट रूप से निर्धारित करता है। अध्याय इसे देश के लिए नियम-पुस्तिका कहता है।

अध्याय के अनुसार संविधान निम्नलिखित बातें निर्धारित करता है —

  • सरकार के तीन अंगों — विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका — की संरचना, भूमिकाएँ और उत्तरदायित्व;
  • इन तीनों अंगों के मध्य संतुलन और नियंत्रण की व्यवस्था, जिससे निष्पक्षता, उत्तरदायित्व और जवाबदेही सुनिश्चित हो;
  • नागरिकों के अधिकारों और कर्तव्यों का उल्लेख;
  • राष्ट्र के दीर्घकालिक लक्ष्यों और आकांक्षाओं की रूपरेखा।

भारतीय संविधान सहित विश्व के अनेक संविधान उन आदर्शों और मूल्यों को भी दर्शाते हैं जिनके प्रति देश प्रतिबद्ध है — सभी के लिए समानता और न्याय, बंधुत्व, विविधता में एकता और स्वतंत्रता। वास्तव में यही मूल्य संविधान के कानूनों की नींव बनते हैं।

आवश्यकता क्यों — अध्याय के कबड्डी मैच को याद कीजिए। विवाद केवल इसलिए शांति से सुलझा क्योंकि रेफरी के पास एक नियम-पुस्तिका थी, जिसे दोनों कप्तान पहले से स्वीकार कर चुके थे। देश तो कबड्डी के मैदान से कहीं बड़ा और कहीं अधिक विविध है —

संविधान के बिनासंविधान के साथ
जो सबसे शक्तिशाली हो, वही निर्णय करेशक्ति उन लिखित नियमों से सीमित, जिन्हें सबने स्वीकारा है
कानून बनाने या बदलने की कोई तय प्रक्रिया नहींकानून बनाने, लागू करने और परखने की स्पष्ट प्रक्रिया
अधिकार शासकों की इच्छा पर निर्भरअधिकारों की गारंटी, जिनके लिए न्यायालय जाया जा सकता है
हर विवाद झगड़े में बदल जाएविवादों का निपटारा स्वतंत्र न्यायपालिका द्वारा
ऐसा क्यों: संविधान केवल नियमों की सूची नहीं है। चूँकि वह पहले से लिखा हुआ है और सबने उसे स्वीकारा है, इसलिए कोई भी खेल के बीच में अपने लाभ के लिए नियम नहीं बदल सकता। यही बात सरकार को जनता के प्रति जवाबदेह बनाती है।
प्र2.
भारतीय संविधान का निर्माण किस प्रकार हुआ?
उत्तर

इसकी रचना संविधान सभा ने लगभग तीन वर्षों की अवधि में की।

1946 — स्वशासन के महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर ढूँढ़ने के लिए संविधान सभा का गठन
9 दिसंबर 1946 — सभा गठित; सदस्य प्रांतीय विधायिकाओं द्वारा चुने गए, जो स्वयं जनता द्वारा निर्वाचित थीं
प्रारंभ में 389 सदस्य → विभाजन के बाद 299; इनमें 15 महिलाएँ
डॉ. राजेंद्र प्रसाद — संविधान सभा के अध्यक्ष
डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकरप्रारूप समिति के अध्यक्ष, जिसने प्रारंभिक मसौदा तैयार किया
26 नवंबर 1949 — कार्य पूर्ण, संविधान अंगीकृत
26 जनवरी 1950 — संविधान लागू हुआ; इसीलिए यह दिन गणतंत्र दिवस है

सदस्य जानबूझकर भारत के विभिन्न क्षेत्रों, व्यवसायों और सामाजिक वर्गों से लिए गए थे, ताकि प्रलेख पूरे देश की आवाज बने। प्रक्रिया के आरंभ में डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा ने कामना की थी कि सभा की कार्यवाही “केवल विवेक, जन-कल्याण और सच्ची देशभक्ति से ही नहीं, बल्कि ज्ञान, सहिष्णुता, न्याय और सभी के प्रति निष्पक्षता से भी युक्त हो।”

क्या आप जानते हैं? अंतिम पाठ हस्तलिपि में सुलेखक प्रेम बिहारी नारायण रायजादा ने लिखा और नंदलाल बोस तथा उनके सहयोगियों ने पृष्ठों को ऐतिहासिक दृश्यों से सजाया। मूल प्रति संसद में हीलियम से भरे काँच के डिब्बे में रखी है, क्योंकि हीलियम कागज या स्याही से कोई अभिक्रिया नहीं करती।
प्र3.
हमारे स्वाधीनता संग्राम और सभ्यता की विरासत ने संविधान को कैसे प्रभावित किया?
उत्तर

दोनों का प्रभाव सीधा पड़ा, क्योंकि संविधान लिखने वाले अनेक लोग स्वयं स्वतंत्रता संग्राम में सम्मिलित रहे थे और इसी सभ्यतागत विरासत में पले-बढ़े थे।

स्रोतसंविधान को क्या दिया
स्वतंत्रता आंदोलनउसके आदर्श — सभी के लिए समानता और न्याय, स्वतंत्रता, बंधुत्व, भारत की सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण — तथा संविधान को इन आदर्शों की प्राप्ति का साधन मानना। आंदोलन के अनेक प्रमुख नेता संविधान सभा के सदस्य थे और अपने अनुभव साथ लाए।
संग्राम से मिली व्यावहारिक शिक्षा‘कैसे’ और ‘क्या’ संबंधी प्रश्नों के उत्तर — प्रत्येक वयस्क को मताधिकार कैसे मिले, कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका की शक्तियाँ अलग कैसे रहें, मौलिक अधिकारों की गारंटी कैसे हो, संशोधन की प्रक्रिया क्या हो, और केंद्र-राज्य संबंध कैसा हो।
भारत की सभ्यतागत विरासतमत वैभिन्य की स्वीकृति, प्रकृति को पवित्र मानना, ज्ञान और शिक्षा की निरंतर खोज, महिलाओं के प्रति सम्मान, तथा वसुधैव कुटुम्बकम् (संपूर्ण विश्व एक परिवार है) और सर्वे भवन्तु सुखिनः (सभी सुखी हों) जैसे आदर्श।
प्राचीन शासन व्यवस्थाएँजनपद, संघ, राजा और उनकी सभाएँ, कौटिल्य का सप्तांग, राजधर्म — इन सब में शासन में जनता की भूमिका और कर्तव्यों पर बल था। वही बल आगे चलकर मौलिक कर्तव्यों के रूप में सामने आया।
विविधता के भीतर एकताकक्षा 6 का ‘एक में अनेक’ वाला विचार — भारत के एक राष्ट्र होने की भावना — संविधान में अंतर्निहित है।

संविधान निर्माताओं ने भारतीय परंपरा “आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः” (सभी दिशाओं से शुभ विचार मेरे पास आएँ) के अनुरूप फ्रांस, अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, आयरलैंड और ऑस्ट्रेलिया के संविधानों का भी अध्ययन किया। फ्रांस से ‘स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व’, आयरलैंड से राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांत और अमेरिका से स्वतंत्र न्यायपालिका की अवधारणा ली गई।

प्र4.
भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं? सत्तर वर्ष से भी पहले लिखा गया संविधान आज भी प्रासंगिक क्यों है?
उत्तर

प्रमुख विशेषताएँ, जैसा अध्याय बताता है —

  • तीन अंग और शक्तियों का पृथक्करण — विधायिका कानून बनाती है, प्रधानमंत्री की अगुवाई में कार्यपालिका उन्हें लागू करती है, और न्यायपालिका जाँचती है कि कानून संविधान के अनुरूप हैं या नहीं।
  • प्रत्येक अंग की भूमिका, कार्य, उत्तरदायित्व और जवाबदेही की स्पष्ट परिभाषा।
  • सरकार की त्रि-स्तरीय व्यवस्था — केंद्र, राज्य और स्थानीय (पंचायती राज); कुछ कार्य केंद्र के लिए आरक्षित, कुछ राज्यों को सौंपे गए।
  • ऐसा निर्वाचन तंत्र, जिससे देश के प्रत्येक पात्र नागरिक को मतदान का अवसर मिले।
  • मौलिक अधिकार — वे प्रतिज्ञाएँ जिन्हें निभाना अनिवार्य है और जिनके लिए न्यायालय की सहायता ली जा सकती है।
  • मौलिक कर्तव्य — नागरिकों से राष्ट्र के प्रति अपेक्षित कार्य।
  • राज्य के नीति-निर्देशक तत्व — संविधान निर्माताओं का सामाजिक और आर्थिक दृष्टिकोण; वे लक्ष्य जिनकी दिशा में सरकार को बढ़ना चाहिए।
  • उद्देशिका, जिसमें मार्गदर्शक मूल्य निहित हैं — संप्रभु, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य; न्याय, स्वतंत्रता, समानता, बंधुता।

आज भी प्रासंगिक क्यों। क्योंकि इसे बढ़ने के लिए बनाया गया था। अध्याय इसे जीवंत प्रलेख कहता है —

नई आवश्यकता उत्पन्न होती है → परिवर्तन (संशोधन) प्रस्तावित होता है
संसद में गहन चर्चा होती है (कुछ मामलों में राज्यों की विधान सभाओं में भी)
→ अनेक बार आम जनता से राय ली जाती है
→ कुछ परिवर्तन जन आंदोलनों से भी प्रारंभ होते हैं
संविधान बदले बिना अद्यतन हो जाता है

अध्याय के तीन उदाहरण इसे दिखाते हैं — मूल कर्तव्य (भाग 4-ए) 1976 में जोड़े गए; पंचायती राज व्यवस्था 73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 से जुड़ी; और 2004 में उच्चतम न्यायालय ने माना कि घर पर तिरंगा फहराना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का भाग है।

ऐसा क्यों: उद्देशिका के मूल्य — न्याय, स्वतंत्रता, समानता, बंधुता — पुराने नहीं पड़ते। बदलती है वह परिस्थिति जिसमें उन्हें लागू करना होता है। संविधान ने मूल्यों को दृढ़ता से तय किया और ब्योरों को संशोधनीय छोड़ दिया — इसीलिए वह 1950 की तरह आज भी उपयोगी है।
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