अन्वेषण अध्याय 10 पाठ्य प्रश्न

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
हमें किस प्रकार की सरकार चाहिए?
उत्तर

भारत ने संसदीय शासन प्रणाली वाला लोकतांत्रिक गणराज्य चुना।

  • लोकतांत्रिक — लोगों के पास समान राजनीतिक अधिकार होते हैं, वे अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करते हैं और उन्हें जवाबदेह रखते हैं; सरकार कुछ मूलभूत नियमों के अनुसार चलाई जाती है।
  • गणराज्य — राष्ट्र का अध्यक्ष निर्वाचित होता है, न कि वंशानुगत।
  • संसदीय — प्रधानमंत्री की अगुवाई वाली कार्यपालिका विधायिका से ही बनती है और उसी के प्रति उत्तरदायी होती है।
  • तीन अंग और शक्तियों का पृथक्करण — विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका, तथा इनके बीच संतुलन और नियंत्रण।
  • त्रि-स्तरीय व्यवस्था — केंद्र, राज्य और स्थानीय (पंचायती राज), प्रत्येक के अपने कार्य और दायित्व।
यही चुनाव क्यों: भारत ने अभी-अभी ऐसे शासन से मुक्ति पाई थी जिसे उसने चुना नहीं था। वंशानुगत या गैर-जवाबदेह सरकार वही दोहराती जिसके विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम लड़ा गया था। जिस गणराज्य में सर्वोच्च पद भी चुनाव से भरा जाता हो, वह औपनिवेशिक शासन का सीधा विलोम है।
प्र2.
कौन-से नियम और सिद्धांत हमारा मार्गदर्शन करेंगे?
उत्तर

वही सिद्धांत चुने गए जिन पर स्वतंत्रता आंदोलन चला था और जिन्हें भारत की अपनी विरासत लंबे समय से सँजोए हुए थी। अध्याय इन्हें इस प्रकार गिनाता है — सभी के लिए समानता और न्याय, स्वतंत्रता, बंधुत्व तथा भारत की सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण

फिर इन्हें संविधान में तीन स्तरों पर लिखा गया —

स्तरवह क्या करता हैउदाहरण
उद्देशिकामार्गदर्शक मूल्यों को एक अनुच्छेद में रख देती हैन्याय, स्वतंत्रता, समानता, बंधुता
मौलिक अधिकारमूल्यों को ऐसी प्रतिज्ञाओं में बदलते हैं जिनके लिए न्यायालय जाया जा सकेअनुच्छेद 14 — कानून के समक्ष समानता
नीति-निर्देशक तत्वमूल्यों को उन लक्ष्यों में बदलते हैं जिनकी दिशा में सरकार को बढ़ना चाहिएअनुच्छेद 47 — पोषण, जीवन स्तर और सार्वजनिक स्वास्थ्य

कुछ सिद्धांत भारत की अपनी संस्कृति से आए — मत वैभिन्य की स्वीकृति, प्रकृति को पवित्र मानना, ज्ञान की खोज, महिलाओं के प्रति सम्मान, वसुधैव कुटुम्बकम् और सर्वे भवन्तु सुखिनः। शासन में जनता के कर्तव्यों पर पुराना बल मौलिक कर्तव्यों के रूप में लौटता है।

प्र3.
मतदान का अधिकार किसे मिलना चाहिए?
उत्तर

प्रत्येक वयस्क नागरिक को — इसे सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार कहते हैं।

अध्याय बताता है कि संविधान निर्माताओं के सामने एक ‘कैसे’ वाला प्रश्न यही था — “हम यह कैसे सुनिश्चित करें कि प्रत्येक वयस्क नागरिक को मतदान का अधिकार मिले?” उनका उत्तर था ऐसा निर्वाचन तंत्र, “जिससे देश के प्रत्येक पात्र नागरिक को मतदान का अवसर सुनिश्चित हो सके।”

अर्थात् मताधिकार इन बातों पर निर्भर नहीं है —

  • जाति, धर्म, समुदाय या लिंग;
  • किसी के पास कितनी संपत्ति या धन है;
  • कोई पढ़ना-लिखना जानता है या नहीं;
  • वह भारत के किस भाग में रहता है।
यह क्यों महत्वपूर्ण है: अनेक पुराने लोकतंत्रों में मताधिकार पहले भू-स्वामियों को, फिर शिक्षित पुरुषों को और बहुत बाद में महिलाओं को मिला। भारत ने यह अधिकार पहले ही चुनाव से हर वयस्क को दिया। यदि सभी नागरिक कानून के समक्ष समान हैं, तो उनके मतों का मूल्य अलग-अलग रखना निरर्थक होगा।
प्र4.
विवादों का समाधान कैसे किया जाएगा?
उत्तर

स्वतंत्र न्यायपालिका के माध्यम से, जिसकी कसौटी संविधान और कानून हो — न कि बल, और न सरकार की अपनी पसंद।

विवाद उत्पन्न होता है (नागरिकों के बीच, या नागरिक और राज्य के बीच)
→ मामला न्यायालय में जाता है
→ न्यायाधीश तय करते हैं कि किसी कानून का उल्लंघन हुआ या नहीं और क्या दंड दिया जाए
→ यदि विवाद स्वयं किसी कानून पर है, तो न्यायपालिका देखती है कि वह कानून संविधान के अनुरूप है या नहीं
→ देश का उच्चतम न्यायालय संविधान की रक्षा करता है

दो बातें इसे संभव बनाती हैं। पहली, न्यायपालिका सरकार के तीन अलग अंगों में से एक है, इसलिए वह कार्यपालिका या विधायिका के विरुद्ध भी निर्णय दे सकती है। दूसरी, स्वतंत्र न्यायपालिका की अवधारणा संविधान निर्माताओं ने अमेरिका के संविधान से ली थी।

स्वयं जाँचिए: 2004 का ध्वज-प्रकरण इसका वास्तविक उदाहरण है — एक नागरिक ने जिस नियम को गलत माना, उसे न्यायालय में चुनौती दी और उच्चतम न्यायालय ने उससे सहमति जताई। यही है बल के बजाय कानून से सुलझा विवाद।
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