अन्वेषण अध्याय 10 पाठ्य प्रश्न

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
हम यह कैसे सुनिश्चित करें कि प्रत्येक वयस्क नागरिक को मतदान का अधिकार मिले?
उत्तर

सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार को संविधान में ही लिखकर, और उसके चारों ओर एक निर्वाचन तंत्र खड़ा करके।

  • संविधान ऐसा निर्वाचन तंत्र निर्धारित करता है “जिससे देश के प्रत्येक पात्र नागरिक को मतदान का अवसर सुनिश्चित हो सके।” यह अधिकार किसी सत्ताधारी की कृपा पर निर्भर नहीं है।
  • एकमात्र शर्त है वयस्कता और नागरिकता — जाति, लिंग, धर्म, धन, संपत्ति या शिक्षा नहीं।
  • चुनाव एक स्वतंत्र संस्था कराती है, ताकि सत्ता में बैठा दल चुनाव को अपने पक्ष में न चला सके।
  • चूँकि राष्ट्र का अध्यक्ष निर्वाचित होता है और सरकारें निर्वाचित प्रतिनिधियों से बनती हैं, इसलिए मत ही वह साधन है जिससे लोग “अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करते हैं और उन्हें जवाबदेह रखते हैं।”
ऐसा क्यों: जो अधिकार केवल वचन हो, वह वापस लिया जा सकता है; जो अधिकार संविधान में लिखा हो, उसकी रक्षा न्यायालय में की जा सकती है। संविधान निर्माताओं का लक्ष्य यही अंतर था।
प्र2.
हम यह कैसे सुनिश्चित करें कि कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका की शक्तियाँ अलग-अलग रखी जाएँ?
उत्तर

शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत से, जिसके पीछे संतुलन और नियंत्रण की व्यवस्था है — दोनों संविधान में लिखे हैं।

अंगअपना कार्यदूसरों पर नियंत्रण
विधायिकाकानून बनाती हैकार्यपालिका से प्रश्न पूछती है, बहस करती है; उसके प्रस्ताव स्वीकार या अस्वीकार करती है
कार्यपालिकाकानूनों को लागू करती है; प्रधानमंत्री इसके प्रमुख हैंविधायिका के प्रति उत्तरदायी और न्यायालयों के निर्णयों से बाध्य
न्यायपालिकातय करती है कि कानून का उल्लंघन हुआ या नहीं और क्या दंड दिया जाएयह सुनिश्चित करती है कि बनाए गए सभी कानून संविधान के अनुरूप हों

संविधान “सरकार के प्रत्येक अंग की भूमिका, कार्य, उत्तरदायित्व और जवाबदेही की व्यवस्था को स्पष्ट रूप से परिभाषित करता है”, जिससे कोई अंग चुपचाप दूसरे का कार्य अपने हाथ में न ले सके।

क्या आप जानते हैं? स्वतंत्र न्यायपालिका की अवधारणा — ऐसी अदालत जो तत्कालीन सरकार के बनाए कानून को भी रद्द कर सके — संविधान निर्माताओं ने अमेरिका के संविधान का अध्ययन करने के बाद भारत के लिए अपनाई थी।
प्र3.
हम प्रत्येक व्यक्ति के मौलिक अधिकारों के सम्मान की गारंटी कैसे करें?
उत्तर

मौलिक अधिकारों को न्यायालय में माँगे जाने योग्य बनाकर। अध्याय यह अंतर स्पष्ट करता है — नीति-निर्देशक तत्व लक्ष्य हैं, जबकि “मूल अधिकार वे प्रतिज्ञाएँ हैं, जिन्हें निभाना अनिवार्य है। यदि आपके साथ केवल आपकी पहचान के कारण कोई अनुचित व्यवहार करता है, तो आप न्यायालय की सहायता ले सकते हैं।”

इस गारंटी के तीन भाग हैं —

  • अधिकार संविधान में लिखे हैं — समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14, कानून के समक्ष समानता), स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 21, जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा), शोषण के विरुद्ध अधिकार, शिक्षा का अधिकार (अनुच्छेद 21-ए);
  • अधिकार छिनने पर स्वतंत्र न्यायपालिका का द्वार खुला है, जिसके शीर्ष पर उच्चतम न्यायालय है;
  • न्यायपालिका किसी भी कानून को संविधान की कसौटी पर परख सकती है, इसलिए मौलिक अधिकार का हनन करने वाला कानून टिक नहीं सकता।
ऐसा क्यों: अधिकार उतना ही सशक्त होता है जितना उसके पीछे का उपाय। हर व्यक्ति को न्यायालय जाने की क्षमता देकर संविधान एक सुंदर वाक्य को उस साधन में बदल देता है, जिसे विद्यार्थी, किसान या श्रमिक भी वास्तव में काम में ला सके।
प्र4.
यदि हमें संविधान में संशोधन करना हो, तो क्या प्रक्रिया होनी चाहिए?
उत्तर

जानबूझकर बनाई गई एक सावधानीपूर्ण और सार्वजनिक प्रक्रिया — इतनी सरल कि संविधान बढ़ सके, और इतनी कठिन कि उसे यूँ ही न बदला जा सके।

परिवर्तन (संशोधन) प्रस्तावित होता है
→ स्वीकार होने से पहले संसद में गहन चर्चा और विचार-विमर्श
कुछ मामलों में राज्यों की विधान सभाओं में भी चर्चा
अनेक बार आम जनता से भी राय ली जाती है
→ कुछ संशोधन जन आंदोलनों से प्रारंभ होते हैं
→ तभी वह संशोधन संविधान का भाग बनता है

अध्याय में दो संशोधन इस प्रक्रिया को दिखाते हैं — भाग 4-ए मूल कर्तव्य (1976) और 73वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1992, जिससे पंचायती राज व्यवस्था संविधान में आई।

सुझाव: सरकार प्रस्तावित कानूनों या नियमों में परिवर्तन पर नागरिकों से सुझाव भी माँगती है — पृष्ठ 224 पर इसका वास्तविक उदाहरण है, जिसमें सुझाव भेजने की आरंभ और अंतिम तिथि दोनों दी गई हैं।
प्र5.
केंद्र और राज्य सरकारों के बीच क्या संबंध होना चाहिए? आदि।
उत्तर

ऐसा संबंध जिसमें दायित्व बँटे हुए हों पर तालमेल बना रहे, और यह बँटवारा लिखित हो, ताकि किसी स्तर को अनुमान न लगाना पड़े।

  • भारत में सरकार की त्रि-स्तरीय व्यवस्था है — केंद्र, राज्य और स्थानीय (पंचायती राज व्यवस्था)।
  • कुछ कार्य और दायित्व केंद्र सरकार के लिए आरक्षित हैं, जबकि अन्य कार्य राज्य सरकार को सौंपे गए हैं
  • संविधान “इन बिंदुओं को व्यापक रूप से निर्धारित करता है” और प्रत्येक के लिए भूमिका, कार्य, उत्तरदायित्व तथा जवाबदेही परिभाषित करता है।
  • दोनों स्तर एक ही संविधान से बँधे हैं, और उनके बीच विवाद न्यायपालिका तय कर सकती है।
ऐसा क्यों: भारत बहुत बड़ा और बहुत विविध है। रक्षा और विदेश नीति जैसे विषय राष्ट्रीय स्तर पर ही सार्थक हैं; विद्यालय, स्थानीय सड़कें, जल-आपूर्ति और स्वच्छता लोगों के निकट रहकर ही ठीक से चल सकती हैं। बँटवारा लिखित होने से दोनों एक-दूसरे के काम में टकराते नहीं — और तीसरा स्तर जोड़कर गाँव या नगर को अपने स्थानीय विषय स्वयं तय करने का अवसर मिलता है।
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