क्योंकि संविधान को पूरे भारत के लिए काम करना था, और किसी क्षेत्र का जीवन वही व्यक्ति बता सकता है जो उसे जानता हो। अध्याय बताता है कि सदस्य “भारत के विभिन्न क्षेत्रों, व्यवसायों और सामाजिक वर्गों का प्रतिनिधित्व करते थे” और 299 सदस्यों में 15 महिलाएँ थीं।
विविध सभा क्यों आवश्यक थी — चार कारण —
- किसी क्षेत्र की आवश्यकता छूटती नहीं। पहाड़ी राज्य, तटीय जिला, मरुभूमि और घनी बस्ती वाला नगर — सबकी समस्याएँ एक जैसी नहीं होतीं। हर क्षेत्र के सदस्य नियम बनते समय ही अपनी बात रख सके।
- कोई वर्ग अधिकारों से बाहर नहीं रहा। जब समानता और भेदभाव-निषेध के उपबंध लिखे जा रहे थे, तब महिलाएँ, किसान, श्रमिक, वकील, शिक्षक और लंबे समय से उपेक्षित समुदायों के लोग उसी कक्ष में उपस्थित थे।
- प्रलेख स्वीकार्य बना। जिस नियम-पुस्तिका को बनाने में लोग सम्मिलित रहे हों, उसे वे मानते हैं। किसी सीमित समूह का लिखा संविधान ‘एक वर्ग का कानून’ कहलाता।
- निर्णय बेहतर हुए। भिन्न दृष्टिकोण एक-दूसरे को परखते हैं। डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कहा था कि लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए “दूसरे के विचारों का सम्मान” तथा “लचीलेपन और समन्वय” की आवश्यकता है — इसके लिए भिन्न विचारों का उपस्थित होना पहली शर्त है।