प्र1.
बाजार उस मूल्य पर क्रेता और विक्रेता के मध्य विनिमय सुगम बनाता है जिस पर दोनों की सहमति हो और जो क्रेता की माँग तथा विक्रेता की आपूर्ति द्वारा निर्धारित होता है।
उत्तर
यही अध्याय का हृदय है। इसे तीन हिस्सों में खोलिए।
- विनिमय — बाजार उसे, जिसके पास वस्तु है, और उसे, जिसे वह चाहिए, आमने-सामने लाता है। बाजार न हो तो दोनों अटके रह जाते हैं।
- दोनों की सहमति वाला मूल्य — इसे कोई एक पक्ष थोप नहीं सकता। क्रेता और विक्रेता तब तक मोल-तोल करते हैं “जब तक कि वे कीमत पर परस्पर सहमत नहीं हो जाते”, और सहमति न बने तो “लेन-देन नहीं हो सकता।”
- माँग और आपूर्ति द्वारा निर्धारित — जब क्रेता और विक्रेता अनेक हों तो मूल्य वहीं ठहरता है जहाँ उपलब्ध मात्रा और चाही गई मात्रा मिल जाती हैं।
माँग = वह मात्रा जिसे उपभोक्ता किसी निश्चित समय पर किसी विशेष मूल्य पर क्रय करने को इच्छुक और सक्षम हैं
आपूर्ति = वह मात्रा जिसे विक्रेता किसी निश्चित समय पर किसी विशेष मूल्य पर विक्रय के लिए इच्छुक और सक्षम हैं
अमरूद ₹80 पर → आपूर्ति अधिक, माँग नगण्य → ठेला भरा रह गया
अमरूद ₹20 पर → माँग अधिक, आपूर्ति कम → ठेला खाली, क्रेता वंचित
अमरूद ₹40 पर → दोनों मिल गईं → बाजार साफ हो गया
आपूर्ति = वह मात्रा जिसे विक्रेता किसी निश्चित समय पर किसी विशेष मूल्य पर विक्रय के लिए इच्छुक और सक्षम हैं
अमरूद ₹80 पर → आपूर्ति अधिक, माँग नगण्य → ठेला भरा रह गया
अमरूद ₹20 पर → माँग अधिक, आपूर्ति कम → ठेला खाली, क्रेता वंचित
अमरूद ₹40 पर → दोनों मिल गईं → बाजार साफ हो गया
ऐसा क्यों होता है: मूल्य ही वह इकलौता संकेत है जिसे दोनों पक्ष देख सकते हैं। उसे बढ़ाइए तो क्रेता पीछे हटते हैं; घटाइए तो विक्रेता पीछे हटते हैं। सहमत मूल्य बस वही बिंदु है जहाँ कोई और पीछे नहीं हटना चाहता।