प्र1.
साप्ताहिक बाजार में देर रात को सब्जियाँ दिन की तुलना में सस्ती हो जाती हैं। आपके विचार में ऐसा क्यों होता है?
उत्तर
क्योंकि देर रात तक विक्रेता के सामने “सस्ता बेचूँ या महँगा” का प्रश्न नहीं रहता — प्रश्न होता है “सस्ता बेचूँ या सब गँवा दूँ”।
सब्जियाँ शीघ्र सड़ने वाली हैं — पालक और टमाटर रात भर ठेले पर नहीं टिकेंगे
+ साप्ताहिक बाजार उठ जाता है; रखने के लिए कोई दुकान नहीं
+ बचा माल घर ले जाने में खर्च है और कल उसका मूल्य और घट जाएगा
→ शून्य से अधिक कोई भी कीमत फेंक देने से बेहतर है
→ विक्रेता कीमत घटा देता है
+ साप्ताहिक बाजार उठ जाता है; रखने के लिए कोई दुकान नहीं
+ बचा माल घर ले जाने में खर्च है और कल उसका मूल्य और घट जाएगा
→ शून्य से अधिक कोई भी कीमत फेंक देने से बेहतर है
→ विक्रेता कीमत घटा देता है
दो बातें और इसी दिशा में धकेलती हैं —
- क्रेता कम बचे हैं। भीड़ छँटने के साथ माँग गिर जाती है, और बचे हुए विक्रेता उन थोड़े ग्राहकों के लिए कड़ी होड़ करते हैं।
- माल भी अब सबसे अच्छा नहीं रहा। सबसे ताजी गड्डियाँ सुबह के क्रेता ले जा चुके; जो बचा है वह मुरझाया हुआ है और उसका मूल्य कम है।
ऐसा क्यों होता है: यह माँग और आपूर्ति का सबसे तीखा रूप है। देर रात ठेले पर पड़ी आपूर्ति को संगृहीत नहीं किया जा सकता और माँग जा चुकी है। जब आपूर्ति प्रतीक्षा न कर सके और माँग बची न हो, तो केवल कीमत ही हिल सकती है।
सुझाव: ध्यान दीजिए कि इस छूट की कीमत क्रेता भी चुकाता है — ताजगी में। देर रात का सस्ता सौदा उसी रात पकाना पड़ता है।