अन्वेषण अध्याय 3 महत्वपूर्ण प्रश्न

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
भारतीय जलवायु को कौन-कौन से तत्व विविध बनाते हैं?
उत्तर

विश्व की लगभग हर प्रकार की जलवायु भारत में एक साथ मिलती है, क्योंकि जलवायु बनाने वाले पाँचों कारक भारत में बहुत अधिक बदलते हैं — अक्षांश, ऊँचाई, समुद्र से निकटता, पवनें और स्थलाकृति।

कारकभारत में कितना बदलता हैपरिणाम
अक्षांशभूमध्य रेखा के निकट निकोबार द्वीपसमूह से लेकर सुदूर उत्तर के लद्दाख तककन्याकुमारी और निकोबार लगभग पूरे वर्ष गर्म; श्रीनगर और लेह ठंडे
ऊँचाईसमुद्र तल से लेकर कई किलोमीटर ऊँचे हिमालयी शिखरों तकशिखरों पर अल्पाइन, नीचे समशीतोष्ण पर्वतीय स्थल और उनसे नीचे तप्त मैदान
समुद्र से निकटताबहुत लंबी तटरेखा, पर साथ ही तट से बहुत दूर स्थित स्थान भीमुंबई का हल्का 32°C–18°C बनाम नागपुर का चरम 44°C–10°C
पवनेंअरब से आने वाली गर्म शुष्क पवनें, हिमालय पार से ठंडी पवनें, समुद्र से नम मानसूनी पवनेंउत्तर-पश्चिम में ताप लहर, गिरिपाद में शीत लहर, तटों पर भारी मानसूनी वर्षा
स्थलाकृतिपर्वत, पठार, मैदान और समतल मरुस्थलहिमालय मध्य एशिया की ठंड से बचाता है; पश्चिमी घाट मानसून से वर्षा निचोड़ लेता है

इसी का परिणाम है पृष्ठ 48 की सूची — एक ही देश में सात प्रकार की जलवायु:

  • अल्पाइन — हिमालय पर्वत : अत्यधिक ठंडी, बर्फीली शीत ऋतु और शीतल ग्रीष्म।
  • समशीतोष्ण — हिमालय के निचले तथा अन्य पहाड़ी क्षेत्र : कम ठंडी सर्दियाँ, बहुत गर्म न होने वाली गर्मियाँ। यहीं पर्वतीय पर्यटन स्थल हैं।
  • उपोष्ण कटिबंधीय — उत्तरी मैदान : अत्यधिक गर्म ग्रीष्म, ठंडी शीत ऋतु। यहीं भारत का अधिकांश गेहूँ उगता है।
  • शुष्क — पश्चिम में थार मरुस्थल : अत्यधिक गर्म दिन, ठंडी रातें, बहुत कम वर्षा।
  • उष्णकटिबंधीय आर्द्र — पश्चिमी तटीय पट्टी : भारी मानसूनी वर्षा, चावल और मसालों के अनुकूल।
  • अर्ध-शुष्क — मध्य दक्कन पठार : गर्म ग्रीष्म, हल्की सर्दी, सामान्य वर्षा।
  • उष्णकटिबंधीय — पूर्वी भारत एवं दक्षिणी प्रायद्वीप : हल्की सर्दी तथा मानसूनी पवनों द्वारा नियंत्रित अलग-अलग आर्द्र और शुष्क अवधियाँ।
ऐसा क्यों होता है: जलवायु किसी एक कारक से नहीं बनती। ऊटी और कोयंबटूर लगभग एक ही अक्षांश पर हैं, फिर भी ऊँचाई के कारण ऊटी लगभग 15°C ठंडा है। मुंबई और नागपुर भी एक ही अक्षांश पर हैं, फिर भी समुद्र न होने से नागपुर का ताप परिसर 34°C तक पहुँच जाता है। पाँचों में से कोई एक कारक बदलिए और जलवायु बदल जाएगी — और भारत में यात्रा करते ही ये पाँचों बदलते जाते हैं।
प्र2.
मानसून क्या है? यह कैसे बनता हैं?
उत्तर

‘मानसून’ शब्द अरबी भाषा के शब्द ‘मौसिम’ से आया है, जिसका अर्थ है ऋतु। शाब्दिक रूप से यह हिंद महासागर, ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीका और दक्षिण एशिया सहित आस-पास के क्षेत्रों में चलने वाली मौसमी पवनों के लिए प्रयुक्त होता है। चूँकि ये पवनें वर्षा लाती हैं, इसलिए सामान्य बोलचाल में मानसून का अर्थ मौसमी वर्षा से लिया जाता है।

यह कैसे बनता है — इसका आधार एक साधारण तथ्य है : भूमि समुद्र की तुलना में शीघ्रता से गर्म या ठंडी होती है।

ग्रीष्म ऋतु ठंडा महासागर उच्च दाब तप्त भूभाग — निम्न दाब समुद्र से नम पवनें → वर्षा दक्षिण-पश्चिम मानसून शीत ऋतु गर्म महासागर निम्न दाब ठंडा भूभाग — उच्च दाब भूमि से शुष्क पवनें → कम वर्षा उत्तर-पूर्व मानसून
चित्र 3.9 के आधार पर मानसून का उलटाव। पवन सदैव उच्च दाब से निम्न दाब की ओर बहती है — तीर बस इसी अंतर का अनुसरण करते हैं।
  1. ग्रीष्म ऋतु। एशियाई भूभाग गर्म होकर उस पर एक शक्तिशाली निम्न-दबाव क्षेत्र बना देता है। चूँकि पवन सदैव उच्च दाब से निम्न दाब की ओर बहती है, इसलिए पवनें ठंडे, उच्च दाब वाले महासागर से गर्म भूभाग की ओर खिंच आती हैं। ये समुद्री पवनें नमी लाती हैं, जो गर्म भूभाग पर संघनित होकर भारी वर्षा करती है।
  2. शीत ऋतु। प्रतिरूप उलट जाता है। स्थलभाग समुद्र से शीघ्र ठंडा होता है, इसलिए अब भूमि पर उच्च दाब और अपेक्षाकृत गर्म समुद्र पर निम्न दाब होता है। पवनें भूमि से समुद्र की ओर चलती हैं और एशिया के अधिकांश भाग में शुष्क परिस्थितियाँ बन जाती हैं।

भारत में ग्रीष्मकालीन या दक्षिण-पश्चिम मानसून की वर्षा सामान्यतया जून की शुरुआत में दक्षिणी सिरे से प्रवेश करती है और जुलाई के मध्य तक संपूर्ण उपमहाद्वीप पर फैल जाती है। पश्चिमी घाट एक प्राकृतिक अवरोध का काम करता है — उसके पश्चिमी ढलानों पर बहुत अधिक वर्षा होती है, जबकि पूर्व में दक्कन पठार पर कम और प्रायः अंतरालों के साथ। शीत ऋतु में पवनें भूभाग से समुद्र की ओर चलती हैं; इनका एक भाग बंगाल की खाड़ी से गुजरते हुए नमी ग्रहण कर पूर्वी और दक्षिणी भारत के कुछ भागों में वर्षा करता है — यही उत्तर-पूर्व मानसून है।

प्र3.
जलवायु का समाज, संस्कृति और आर्थिक स्थिति पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर

हमारे जीवन का जलवायु से गहन संबंध है और हम इस पर निर्भर हैं। अध्याय इसे तीन स्तरों पर दिखाता है।

स्तरजलवायु का प्रभावअध्याय के उदाहरण
संस्कृतित्योहार, रीति-रिवाज, संगीत और भोजन ऋतुओं तथा कृषि-वर्ष के साथ चलते हैंवसंत पंचमी, शरद पूर्णिमा; बिहू, पोंगल, ओणम, बैसाखी, लोहड़ी, छठ पूजा, मकर संक्रांति, गुडी पड़वा, हेमिस, लोसुंग, अवि शीतकालीन महोत्सव (चित्र 3.11); राग मेघमल्हार और अमृतवर्षिणी
अर्थव्यवस्थाकृषि तथा वे उद्योग जो जल और पूर्वानुमानित मौसम पर निर्भर हैंउपोष्ण उत्तरी मैदानों में गेहूँ; उष्ण आर्द्र पश्चिमी तट पर चावल और मसाले; ‘मानसून फेलियर’ से फसल की हानि
समाजलोग कहाँ रह सकते हैं, क्या काम करते हैं और कब पलायन को विवश होते हैंजल की तलाश में लंबी दूरी तय करते लोग (सामान्यतः महिलाएँ); कृषि श्रमिकों का नगरों की ओर पलायन; अनाज, सब्जियों और फलों का महँगा होना और मुद्रास्फीति का बढ़ना

दैनिक जीवन भी जलवायु के अनुसार चलता है — हम जो फसलें उगाते हैं, भोजन करते हैं और वस्त्र पहनते हैं, सब मौसम के साथ बदलता है। भारत में सबसे मोटे कपड़े अल्पाइन हिमालय में पहने जाते हैं, और शुष्क थार के लोगों ने जल संग्रह करने और बचाने के अनोखे उपाय विकसित किए हैं।

मानसून फेलियर इतना दूर तक क्यों असर करता है: वह खेत पर नहीं रुकता। कम वर्षा → कम उपज → भूमिहीन श्रमिकों को कम काम → नगरों की ओर पलायन → बाजार में कम अनाज → सबके लिए महँगाई, उन परिवारों के लिए भी जिन्होंने कभी खेती नहीं की। इसी शृंखला के कारण अध्याय कहता है कि विश्व भर में जलवायु और सामाजिक-आर्थिक स्थितियाँ आपस में जुड़ी हैं।
प्र4.
जलवायु की समझ हमें प्राकृतिक आपदा के लिए तैयार रहने में किस प्रकार सहायता करती है?
उत्तर

क्योंकि अधिकांश जलवायुजन्य आपदाएँ प्रकार, स्थान और ऋतु की दृष्टि से पूर्वानुमेय हैं, भले ही उनकी सटीक तिथि न पता हो। जलवायु की समझ अचानक आए संकट को एक ऐसी घटना में बदल देती है जिसके लिए तैयारी की जा सके।

आपदाजलवायु की समझ क्या बताती हैतब हम क्या कर सकते हैं
चक्रवातप्रतिवर्ष भारतीय तटरेखा, विशेषकर पूर्वी तट, पर आते हैं और समुद्र के निम्न दाब क्षेत्रों में बनते हैंभारतीय मौसम विज्ञान विभाग उनके बनने, विकास और प्रभावित क्षेत्र की पूर्व सूचना देता है; एन.डी.आर.एफ. समय रहते लोगों को हटाता है
बाढ़प्रायः मानसून में आती है; उत्तर प्रदेश, बिहार, केरल, आंध्र प्रदेश और असम विशेष रूप से संवेदनशील हैंतटबंध और चेतावनी तंत्र, नालियों की सफाई, जलमार्गों पर निर्माण की रोक
हिमनदीय विस्फोटहिमनदों के तेजी से पिघलने या कई दिनों की भारी वर्षा के बाद होता हैहिमनदीय झीलों की निगरानी, नदी घाटियों में निर्माण पर नियंत्रण, तीर्थयात्रा मार्गों की सावधान योजना
भूस्खलनपहाड़ी क्षेत्रों में मानसून के दौरान होते हैं और वनों की कटाई से बढ़ते हैंस्वीकृत विधियों से निर्माण, ढलानों पर वृक्षारोपण, अत्यधिक भवन-निर्माण पर रोक
दावानलशुष्क परिस्थितियों, सूखे और तेज हवाओं से फैलते हैं — इसलिए जोखिम के महीने ज्ञात हैंशुष्क ऋतु से पहले अग्नि-रेखाएँ और निगरानी मीनारें, लापरवाही के विरुद्ध चेतावनी

अध्याय एक बड़ी बात भी जोड़ता है — जलवायु परिवर्तन और आपदा के कारणों के बीच के संबंध को समझना अधिक पर्यावरण-अनुकूल आचरणों तथा समुदायों में लचीलेपन एवं अनुकूलन के निर्माण की आवश्यकता का समर्थन करता है।

क्या आप जानते हैं? राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (एन.डी.आर.एफ.) प्राकृतिक और मानव-निर्मित दोनों प्रकार की आपदाओं के लिए प्रशिक्षित है, और उसकी बटालियनें भारत में 12 अलग-अलग स्थानों पर रखी गई हैं, ताकि सहायता कहीं भी बहुत दूर न पड़े।
प्र5.
जलवायु परिवर्तन क्या है? इसके परिणाम क्या-क्या होते हैं?
उत्तर

जलवायु परिवर्तन का तात्पर्य है जलवायु में महत्वपूर्ण एवं दीर्घकालिक परिवर्तन — तापमान, वर्षा और मौसम की घटनाओं में बदलाव। यह संपूर्ण पृथ्वी पर या केवल क्षेत्रीय स्तर पर भी हो सकता है।

कारण। पिछली सहस्राब्दियों में प्राकृतिक प्रक्रियाएँ इसे प्रेरित करती थीं, किंतु 19वीं शताब्दी के बाद से यह मुख्यतः मानवीय गतिविधियों से प्रेरित है :

  • जीवाश्म ईंधन का जलना — कोयला, पेट्रोलियम तेल और प्राकृतिक गैस;
  • वनों की कटाई;
  • पर्यावरण के लिए हानिकारक औद्योगिक उत्पादन;
  • अत्यधिक या अनावश्यक खपत के प्रतिरूप।

इनसे भारी मात्रा में हरितगृह गैसें निकलती हैं। प्राकृतिक हरितगृह प्रभाव ही पृथ्वी को जीवन के लिए पर्याप्त गर्म रखता है; समस्या यह है कि उद्योग, परिवहन और कृषि ने कुछ ही शताब्दियों में इन गैसों की भारी मात्रा छोड़ दी, जिससे अतिरिक्त गर्मी रुक गई और तेजी से वैश्विक तापन हो रहा है।

परिणाम :

  • मौसम और तापमान की चरम स्थितियाँ, जिनके प्राकृतिक और मानवीय दोनों जगत पर गंभीर परिणाम होते हैं।
  • जलवायु प्रतिरूपों का बाधित होना, जिन पर हजारों वर्षों से पेड़-पौधों, जानवरों और मानव समाजों ने स्वयं को अनुकूलित किया था।
  • अधिक और अधिक भयंकर आपदाएँ — चक्रवात, बाढ़, हिमनदीय विस्फोट, दावानल।
  • अर्थव्यवस्था को हानि। 2025 के आरंभ में भारत का औसत तापमान सामान्य से 1 से 3 डिग्री सेल्सियस अधिक था, जिससे सर्दी बहुत कम और हल्की रही — इसका असर कृषि उत्पादन तथा अनेक लघु उद्योगों पर पड़ा।

क्या किया जा रहा है। भारत सहित विश्व भर की सरकारें न्यूनीकरण के उपायों को बढ़ावा देती हैं — हरितगृह गैसों के उत्सर्जन में कटौती, वृक्षारोपण, नवीकरणीय ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता में सुधार और सतत जीवन-शैली। अध्याय कठिनाई भी स्पष्ट कहता है : ये प्रयास प्रायः आर्थिक विकास और उपभोग की बढ़ती आकांक्षाओं से टकराते हैं।

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