प्र1.
दूसरी सहस्राब्दी सा.सं.पू. के अंत से उत्तर और मध्य भारत के कुछ भागों में जनपदों का उदय हुआ। ये छोटे राज्य थे जिनका शासक एक राजा होता था, जो वरिष्ठजनों की परिषद से परामर्श लेकर निर्णय करता था।
उत्तर
इस बिंदु को चार चरणों में खोलिए।
- कब: द्वितीय सहस्राब्दी सा.सं.पू. के उत्तरार्ध में, अर्थात 1000 सा.सं.पू. से कुछ शताब्दी पूर्व, उत्तर भारत की क्षेत्रीय संस्कृतियाँ धीरे-धीरे स्वयं को पुनर्संगठित करने लगीं।
- कैसे बने: लोग कुलों अथवा वंशों के रूप में संगठित हुए, जो संभवतः समान भाषा एवं सांस्कृतिक परंपराएँ साझा करते थे, और प्रत्येक कुल एक नियत भूभाग से जुड़ गया।
- नाम का अर्थ: संस्कृत में जनपद का अर्थ है — “जहाँ ‘जन’ ने अपने पद (पग या चरण) रखे हों”, अर्थात जहाँ लोग निवास करने लगे। शब्द स्वयं उस क्षण को अंकित करता है जब घूमता हुआ समूह बसा हुआ जन बन गया।
- शासन कैसे चलता था: शीर्ष पर राजा, परंतु अकेला नहीं। प्रत्येक जनपद में सभा या समिति होती थी — प्रायः वरिष्ठजनों की परिषद — जिसमें कुल से संबंधित विषयों पर विचार-विमर्श होता था, और राजा से अपेक्षा थी कि वह मंत्रियों-प्रशासकों के साथ-साथ इस परिषद से भी परामर्श ले।
यही वास्तविक ‘नवारंभ’ क्यों है: हड़प्पा के पतन के बाद लगभग एक सहस्राब्दी तक भारत में न राज्य था, न नगर। जनपद वह क्षण है जब राज्य लौटता है — छोटा, कुल-आधारित, और परामर्श की उस परंपरा को साथ लिए जिसे आगे चलकर महाजनपदों ने और विकसित किया।