यह व्यक्तिगत एवं चिंतनपरक प्रश्न है, अतः इसका उत्तर कोई बना-बनाया नहीं दे सकता। नीचे बताया गया है कि अपना उत्तर कैसे बनाएँ, और साथ में एक नमूना भी दिया गया है।
अच्छे उत्तर में चार बातें होनी चाहिए:
- एक वास्तविक घटना, संक्षेप में और शालीनता से। किसी का नाम न लिखिए — ‘एक सहपाठी’, ‘एक पड़ोसी’ लिखिए।
- असमानता का स्वरूप — संपत्ति, लिंग, भाषा, क्षेत्र, दिव्यांगता, परिवार का व्यवसाय या नया-नया आना।
- समानता पर आपका मत, कारणों सहित — केवल भावना नहीं।
- एक पहल या व्यक्ति जिसे आपने वास्तव में देखा या पढ़ा हो और जिसने असमानता घटाई हो।
नमूना उत्तर:
वर्ष के बीच में हमारी कक्षा में आया एक विद्यार्थी घर पर दूसरी भाषा बोलता था और जब वह पढ़कर सुनाता तो कुछ बच्चे हँस देते। दो सप्ताह तक उसने कक्षा में उत्तर देना ही छोड़ दिया। हमारी अध्यापिका ने पढ़ने के अभ्यास के लिए हर विद्यार्थी की एक जोड़ी बनाई और उससे कहा कि वह कक्षा को अपनी भाषा के दस शब्द सिखाए। महीने के अंत तक वही हमारा उच्चारण सुधार रहा था। यह भाषा तथा ‘बाहरी’ होने की असमानता थी, और कक्षा के नियम बदलने मात्र से वह कम हो गई।
हाँ, समाज में समानता आवश्यक है — तीन कारणों से। यह न्यायसंगत है: कोई अपना परिवार, भाषा या जन्मस्थान चुनकर नहीं आता, अतः इनके आधार पर किसी को ऊँचा-नीचा नहीं माना जा सकता। यह उपयोगी है: यही अध्याय दिखाता है कि जिस समाज में हर समूह के कौशल का सम्मान और उपयोग होता है वह सशक्त होता है, और जहाँ प्रतिभा केवल जन्म के कारण व्यर्थ जाती है वह दुर्बल। और यह संविधान का आदेश है: भारत का संविधान विधि के समक्ष समता देता है तथा धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध करता है।
असमानता घटाने वाली पहलें — विद्यालयों में मध्याह्न भोजन तथा निःशुल्क पाठ्यपुस्तकें; निर्धन परिवारों के विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्तियाँ; दिव्यांगजनों के लिए रैंप, बड़े अक्षरों वाली पुस्तकें एवं सांकेतिक भाषा; पंचायतों में महिलाओं के लिए आरक्षित स्थान; डॉ. भीमराव आंबेडकर का समता हेतु कार्य तथा उससे निकले संवैधानिक प्रावधान; और अपने ही विद्यालय में वह व्यवस्था जहाँ बच्चे केवल क्रमांक से बैठाए जाते हैं।