अन्वेषण अध्याय 4 आइए पता लगाएँ

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
एक विकसित समाज अपने आप को विभिन्न समूहों में क्यों विभाजित करता है? ऐसा क्यों होता हैं, इसके संभावित कारणों पर विचार करें।
उत्तर

क्योंकि जब समाज बड़ा और जटिल हो जाता है तो कोई एक व्यक्ति सब कुछ नहीं कर सकता। कार्य को समूहों में बाँटना ही वह उपाय है जिससे विशाल समाज अपने सारे काम करा पाता है। इसके अनेक संभावित कारण हैं —

  • कौशल की विशिष्टता। धातुकर्म, बुनाई, मृद्भांड-कला, स्थापत्य, लेखा तथा चिकित्सा — इनमें से प्रत्येक को सीखने में वर्षों लगते हैं। एक समूह किसी कौशल में दक्ष होकर सबकी पूर्ति करे, यह प्रत्येक परिवार द्वारा सब कुछ सीखने से कहीं अधिक कुशल व्यवस्था है।
  • ज्ञान का हस्तांतरण। विद्यालयों और मुद्रित पुस्तकों से पहले शिल्प घर पर माता-पिता से सीखा जाता था। इस प्रकार कौशल और परिवार एक-दूसरे से जुड़ गए, पीढ़ी-दर-पीढ़ी — अध्याय जाति के विषय में ठीक यही कहता है।
  • राज्य की आवश्यकताएँ। शासन, प्रशासन, रक्षा, नगर-नियोजन तथा धार्मिक अनुष्ठान — इन सबके लिए पूर्णकालिक लोग चाहिए। नगर अंशकालिक अधिकारियों से नहीं चलता।
  • अन्न का अधिशेष इसे संभव बनाता है। जब कृषक अपनी आवश्यकता से अधिक उपजाते हैं, तभी अन्य समूह बिना खेती किए जीवित रह सकते हैं।
  • व्यापार एवं विनिमय। भिन्न-भिन्न वस्तुएँ बनाने वाले समूहों को परस्पर विनिमय करना ही पड़ता है, जिससे विभाजन स्थायी और परस्पर आश्रित बनता है।
  • पहचान एवं अपनापन। समूह लोगों को रीति-रिवाज, उत्सव, विवाह तथा भोजन के नियम और कठिन समय में सहारा देता है — अध्याय की उप-जातियाँ इसी का उदाहरण हैं।
दूसरा पक्ष, जिसे अध्याय स्पष्ट कहता है: एक आदर्श समाज में ये सभी समूह एक-दूसरे के पूरक होते और समरसता से कार्य करते। परंतु अधिकांशतः ये विभाजन असमानताओं को भी जन्म देते हैं — कुछ समूह दूसरों की तुलना में अधिक संपत्ति, शक्ति या प्रभाव प्राप्त कर लेते हैं। ‘समानता’ ऐसा आदर्श है जिसकी कल्पना मानव ने प्रायः की है, परंतु शायद ही कोई समाज इसे पूरी तरह प्राप्त कर सका हो।
क्या आप जानते हैं? अध्याय यह भी बताता है कि प्रारंभिक काल में यह व्यवस्था लचीली थी — लंबे अकाल या प्राकृतिक आपदा में कृषक समुदाय नगर की ओर पलायन कर अन्य व्यवसाय अपना लेते थे, और कुछ ब्राह्मण व्यापार या सैनिक कार्यों में भी प्रवृत्त हो जाते थे। कठोरता बहुत बाद में आई, विशेषतः ब्रिटिश शासनकाल में।
प्र2.
आप प्रथम सहस्राब्दी सा.सं.पू. के एक विकसित समाज में ऐसे और कौन-कौन से व्यवसायों की कल्पना कर सकते हैं?
उत्तर

अध्याय स्वयं शासन, प्रशासन, धर्म, शिक्षा, व्यापार, नगर-नियोजन, कृषि, शिल्प तथा कला गिनाता है। नीचे और भी अनेक व्यवसाय हैं, जिन्हें विषय के अनुसार समूहबद्ध किया गया है ताकि याद रखने में सरलता हो।

जीवन का क्षेत्रसंभावित व्यवसायअध्याय में प्रमाण
भोजनकृषक, गोपालक, गड़रिया, मछुआरा, माली, रसोइया, तेली, अन्न-व्यापारीकौटिल्य के आदर्श राज्य में कृषियोग्य क्षेत्र तथा “गोधन संपन्न चारागाह”
धातु एवं पाषाणलोहार, लौह-गलक, ताम्रकार, स्वर्णकार, पाषाण-शिल्पी, मणिकार, शंख-शिल्पीचित्र 4.5 साँची का लौह-कार्यशाला पैनल; चित्र 4.9 कोडुमनाल का शंख एवं रत्न उद्योग
नगर-निर्माणराजमिस्त्री, ईंट बनाने वाला, बढ़ई, प्राचीर व परिखा निर्माता, पथ-निर्माता, कूप खोदने वालाप्रत्येक राजधानी में प्राचीरें व परिखाएँ; चित्र 4.7 शिशुपालगढ़
दैनिक शिल्पकुम्हार, बुनकर, रंगरेज, दर्जी, चर्मकार, टोकरी बुनने वाला, नापित, मालाकारहड़प्पा के विशिष्ट शिल्पकार-समूहों की वह सूची जिसे अध्याय स्मरण कराता है
व्यापार एवं मुद्राव्यापारी, सार्थवाह, नाविक, गाड़ीवान, मुद्रा-परिवर्तक, सिक्के आहत करने वाला कारीगर, तौलने वालाआहत सिक्के (चित्र 4.6); उत्तरापथ एवं दक्षिणापथ
राज्य एवं रक्षाराजा, मंत्री, कर-संग्राहक, लेखक, न्यायाधीश, गुप्तचर, सैनिक, सारथी, गजपाल, द्वारपालराजा कर संग्रह, विधि-व्यवस्था एवं सेना का संचालन करता था; सँकरे द्वारों पर प्रहरी
ज्ञान एवं आस्थापुरोहित, आचार्य, ग्रंथ-पाठक, बौद्ध व जैन भिक्षु-भिक्षुणी, वैद्य, ज्योतिर्विदविद्वान, भिक्षु व भिक्षुणियाँ भारतवर्ष में यात्रा कर शिक्षाओं का प्रसार करते थे
कलाएँमूर्तिकार, चित्रकार, वादक, नर्तक, कथावाचक, हस्तिदंत-शिल्पी“भारतीय कला का भी नवीनीकरण हुआ, जो आगे साम्राज्य काल में पुष्पित-पल्लवित हुआ”
यह करके देखें: तालिका में से कोई एक व्यवसाय चुनिए और 500 सा.सं.पू. के राजगृह में उस व्यक्ति के एक दिन पर चार पंक्तियाँ लिखिए — वह क्या बनाता है, कौन खरीदता है, बदले में उसे क्या मिलता है और वह नगर के किस द्वार से आता-जाता है।
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ