प्र1.
ध्यान दीजिए कि अधिकांश महाजनपद गंगा के मैदानी भाग में केंद्रित थे। इसके अनेक कारण हो सकते हैं, जैसे – गंगा के उर्वर मैदान जिसके कारण कृषि कार्यों का विकास संभव हुआ, समीपवर्ती पहाड़ियों में लौह की उपलब्धता (जिसका आगे ‘लौह’ शीर्षक में वर्णन है) और नवीन वाणिज्यिक पथों का विकास एवं विस्तार।
उत्तर
पहले मानचित्र (चित्र 4.3) पर गिनिए। सोलह महाजनपदों में से अधिकांश गंगा के मैदान में या उसके किनारे स्थित हैं — कुरू, पांचाल, शूरसेन, कोसल, काशी, वत्स, मल्ल, वृज्जि, मगध तथा अंग। केवल कंबोज और गांधार उत्तर-पश्चिम में, मत्स्य, चेदि तथा अवंति पश्चिम-मध्य भारत में, और अश्मक सुदूर दक्षिण में गोदावरी के निकट है।
अब पुस्तक द्वारा दिए गए तीनों कारण, और प्रत्येक कैसे कार्य करता है —
| कारण | इससे राज्य कैसे पनपा |
|---|---|
| गंगा के उर्वर मैदान | समतल भूमि, गहरी जलोढ़ मिट्टी और पर्याप्त जल से अन्न का अधिशेष उत्पन्न होता है। यह अधिशेष उन लोगों का पोषण करता है जो कृषक नहीं हैं — सैनिक, शिल्पकार, व्यापारी, पुरोहित, अधिकारी — और नगर इन्हीं से बनता है। |
| पहाड़ियों में लौह अयस्क | मैदान से लगी पहाड़ियों (दक्षिण बिहार, झारखंड, विंध्य के किनारे) में लौह अयस्क उपलब्ध था। लोहे की कुल्हाड़ी से वन साफ हुए, लोहे के हल से भारी मिट्टी जुती और लोहे के हथियारों से रक्षा हुई। |
| नवीन वाणिज्यिक पथ | गंगा और उसकी सहायक नदियाँ स्वाभाविक राजमार्ग हैं; उत्तरापथ भी इसी मैदान से होकर जाता था। वस्तुएँ, सिक्के और विचार सरलता से चलते रहे, अतः मार्ग पर बसी बस्तियाँ समृद्ध होकर नगर बन गईं। |
ये तीनों साथ मिलकर ही काम करते हैं: अकेला कोई कारण पर्याप्त नहीं। लोहे के बिना उर्वर मिट्टी से केवल छोटे खेत बनते; व्यापार के बिना लोहे से संपत्ति नहीं आती; अन्न के अधिशेष के बिना व्यापार करने योग्य नगर ही नहीं बनते। गंगा के मैदान में तीनों एक साथ उपलब्ध थे — इसीलिए सर्वाधिक शक्तिशाली राज्य मगध और कोसल वहीं विकसित हुए।
यह करके देखें: अपनी ओर से एक चौथा कारण जोड़िए। नदियों ने सस्ता परिवहन और पेयजल भी दिया, और मैदान में निर्माण हेतु काष्ठ तथा मिट्टी भी सुलभ थी। इतिहासकार की भाँति अपने कारण के पक्ष में प्रमाण भी दीजिए।